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दावा : सूक्ष्म प्रदूषक हटाकर पीने लायक बनाया जाएगा जल, वैज्ञानिकों ने कार्बनिक पोलिमर विकसित किया
Wed, 16 Feb 2022 06:28 AM IST
योगेश साहू
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली।
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली।
Published by: योगेश साहू
Updated Wed, 16 Feb 2022 06:28 AM IST
सार
भोपाल के आईआईएसईआर के रसायन विज्ञान विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर अभिजीत पात्रा ने बताया कि भारत में घरेलू, कृषि और औद्योगिक क्षेत्रों द्वारा सतह पर और भूजल में छोड़े गए मानव जनित अपशिष्ट के कारण जल प्रदूषण होना चिंता का मुख्य विषय है।
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प्रतीकात्मक तस्वीर।
- फोटो : istock
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विस्तार
भोपाल स्थित भारतीय विज्ञान शिक्षा व अनुसंधान संस्थान (आईआईएसईआर) के वैज्ञानिकों ने एक कार्बनिक पोलिमर विकसित किया है। यह पानी में से उच्च ध्रुवीय कार्बनिक सूक्ष्म प्रदूषकों (पीओएम) को हटाकर जल को पीने के लिए सुरक्षित बनाएगा। दावा है कि प्रयोगशाला के स्तर पर कार्बनिक प्रदूषकों को हटाने के लिए इन पोलिमर का परीक्षण किया जा चुका है।
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इन सामग्री का औद्योगिक साझेदारों के साथ बड़े पैमाने पर निर्माण करके पानी में से जहरीले ध्रुवीय कार्बनिक सूक्ष्म प्रदूषकों को हटाकर साफ किया जा सकता है। अनुसंधान अमेरिकन केमिकल सोसाइटी के एसीएस अप्लाइड मैटीरियल्स एंड इंटरफेसेस में प्रकाशित भी हुआ है।
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भोपाल के आईआईएसईआर के रसायन विज्ञान विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर अभिजीत पात्रा ने बताया कि भारत में घरेलू, कृषि और औद्योगिक क्षेत्रों द्वारा सतह पर और भूजल में छोड़े गए मानव जनित अपशिष्ट के कारण जल प्रदूषण होना चिंता का मुख्य विषय है। उन्होंने कहा कि इन अपशिष्टों में कार्बनिक और अकार्बनिक सूक्ष्म प्रदूषक होते हैं और कार्बनिक सूक्ष्म प्रदूषकों की पानी में जरा सी मौजूदगी भी मानव की सेहत के लिए और जलीय जंतुओं के लिए खतरा होती है।
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पानी को शुद्ध करने के लिए 'सोखना' प्रक्रिया अच्छी तकनीक
एसोसिएट प्रोफेसर अभिजीत पात्रा के मुताबिक, कार्बनिक सूक्ष्म प्रदूषकों से पानी को शुद्ध करने के लिए 'सोखना' नामक एक प्रक्रिया सबसे अधिक ऊर्जा कुशल तकनीकों में से एक है। उन्होंने बताया कि इस प्रक्रिया में कई अड़चनें हैं, इसलिए सोखने वाले प्रभावी सामग्री की जरूरत है जो न केवल तेजी से पानी में उच्च कार्बनिक सूक्ष्म प्रदूषकों को साफ करे, बल्कि निर्माण की साधारण तकनीकों के माध्यम से बड़े पैमाने पर उसका कृत्रिम उत्पादन भी किया जा सके। इस परियोजना का वित्तपोषण भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग ने 'सस्टेनेबल ट्रीटमेंट, रीयूज एंड मैनेजमेंट फॉर एफिशिएंट, अफोर्डेबल एंड सिनर्जिस्टिक सॉल्यूशंस फॉर वाटर' के तहत किया है।