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SC-ST Act: सोशल मीडिया में एससी-एसटी के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी की तो जाएंगे जेल, केरल हाईकोर्ट का अहम फैसला
Fri, 29 Jul 2022 11:00 AM IST
सुरेंद्र जोशी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कोच्चि
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कोच्चि
Published by: सुरेंद्र जोशी
Updated Fri, 29 Jul 2022 11:00 AM IST
सार
हाईकोर्ट ने कहा कि अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति के किसी व्यक्ति के खिलाफ ऑनलाइन माध्यम से की गई अपमानजनक टिप्पणी भी एससी/एसटी एक्ट के तहत अपराध मानी जाएगी। इसके साथ ही कोर्ट ने अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी।
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केरल हाईकोर्ट
- फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
सावधान! सोशल मीडिया में अब अनुसूचित जाति व जनजाति के लोगों के लोगों के खिलाफ अपमानजनक या अभद्र टिप्पणी करना भारी पड़ सकता है। आपने ऐसी टिप्पणियां कीं तो जेल जाना पड़ेगा।
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केरल हाईकोर्ट ने एक मामले की सुनवाई करते हुए कहा यह आदेश दिया है। हाईकोर्ट ने कहा कि यदि सोशल मीडिया में अजा-जजा वर्ग के किसी व्यक्ति के प्रति अपमानजनक टिप्पणी की तो एससी-एसटी एक्ट के प्रावधानों के अनुसार कार्रवाई की जाए।
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इस आदेश के साथ ही हाईकोर्ट ने आरोपी की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी। एक यूट्यूबर ने सोशल मीडिया में अजा-जजा के खिलाफ अपमानजक टिप्पणी करने के केस में जमानत मांगी थी। जमानत अर्जी रद्द करते हुए केरल हाईकोर्ट ने कहा कि अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति के किसी व्यक्ति के खिलाफ ऑनलाइन माध्यम से की गई अपमानजनक टिप्पणी भी एससी/एसटी एक्ट के तहत अपराध मानी जाएगी।
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याचिकाकर्ता ने एक साक्षात्कार में अजा-जजा वर्ग की एक महिला के खिलाफ कथित तौर पर अपमानजनक टिप्पणी की थी। यह साक्षात्कार बाद में सोशल मीडिया में अपलोड किया गया था। मामले में गिरफ्तारी के डर से यूट्यूबर ने हाईकोर्ट से अग्रिम जमानत मांगी थी। उसने याचिका में कहा था कि पीड़िता के साक्षात्कार के दौरान वह मौजूद नहीं थी, इसलिए उसे अजा-जजा कानून के तहत कार्रवाई से राहत दी जाए।
उसकी यह भी दलील थी कि अजा-जजा वर्ग के प्रति अपमानजनक टिप्पणी तभी मानी जाए जब वह पीड़ित व्यक्ति के समक्ष की जाए। इसका विरोध करते हुए अभियोजन पक्ष ने कहा कि पीड़ित के सामने की गई टिप्पणी को ही अपमानजनक माना जाना गलत होगा। डिजिटल मीडिया के युग में ऐसी व्याख्या कानून की नजर में गलत होगी। पीड़िता के वकील ने भी याचिका का विरोध किया और कहा कि आरोपी ने जानबूझकर और सार्वजनिक रूप से अजजा व्यक्ति का अपमान किया।
मामले से संबद्ध पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि साक्षात्कार देखने से पता चलता है कि कई जगह अपमानजनक शब्दों का उपयोग किया गया। आरोपी ने पीड़िता का 'अजा' वर्ग के रूप में जिक्र किया था, जबकि वह जानता था कि वह एक अनुसूचित जनजाति की सदस्य थी। साक्षात्कार में इस्तेमाल किए गए शब्द प्रथम दृष्टया अपमानजनक हैं और ये जानबूझकर कहे गए थे।
इंटरनेट आने के बाद बदली परिस्थिति
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि इंटरनेट आने से पहले किसी साक्षात्कार को सीमित लोग ही देख या सुन सकते थे। अब सोशल मीडिया पर अगर कोई सामग्री अपलोड की जाती है तो उसे कोई भी कभी भी देख अथवा सुन सकता है। डिजिटल युग में किसी व्यक्ति की मौजूदगी ऑनलाइन या डिजिटल रूप में मानी जाएगी। यानी जब कोई व्यक्ति सोशल मीडिया पर अपलोड कंटेंट तक पहुंच जाता है तो वह प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से वहां मौजूद माना जाएगा।