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CJI: 'लोगों की पहचान और सरकार द्वारा इसकी मान्यता, संसाधनों के इस्तेमाल के लिए बेहद जरूरी', सीजेआई का बयान
Sat, 25 Nov 2023 02:00 PM IST
नितिन गौतम
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: नितिन गौतम
Updated Sat, 25 Nov 2023 02:00 PM IST
सार
LAWASIA वकीलों, जजों, न्यायविदों और कानूनी संगठनों का क्षेत्रीय संगठन है, जो एशिया प्रशांत क्षेत्र में कानूनी प्रक्रिया की बेहतरी और हितों के लिए काम करता है।
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सीजेआई चंद्रचूड़
- फोटो : ANI
विस्तार
भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने शनिवार को 36वें लॉ एशिया सम्मेलन को वर्चुअली संबोधित करते हुए कहा कि डिजिटल युग में हम आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के कई दिलचस्प पहलुओं का सामना कर रहे हैं, जहां तकनीक का नैतिक इस्तेमाल एक बुनियादी सवाल बन गया है।
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पहचान, व्यक्ति और राज्य-स्वतंत्रता के नए रास्ते विषय पर सम्मेलन को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, पहचान और राज्य द्वारा इसकी मान्यता लोगों को मिलने वाले संसाधन और अपनी शिकायतों को व्यक्त करने और अपने अधिकारों की मांग करने की उनकी क्षमता में अहम भूमिका निभाती है। उन्होंने कहा कि एआई और हमारे व्यक्तित्व के बीच एक जटिल अंतरसंबंध है, जहां हम खुद को दार्शनिक विचारों और व्यावहारिक चुनौतियों के लिहाज से पूरी तरह से अज्ञात क्षेत्र में पाते हैं।
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सीजेआई ने सऊदी अरब की नागरिकता पाने वाली ह्यूमनोइड (मानव रोबोट) सोफिया का उदाहरण देते हुए कहा कि हमें इस बात पर विचार करना होगा कि सभी मनुष्य जो जीवित हैं, सांस लेते हैं और चलते हैं, वे अपनी पहचान के आधार पर व्यक्तित्व और नागरिकता के हकदार हों। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि हमें कई मामलों में अपने दृष्टिकोण को व्यापक बनाना होगा।
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नागरिकों की स्वतंत्रता में निहित होना चाहिए नियंत्रण
सीजेआई ने कहा कि जो लोग अपनी जाति, नस्ल, धर्म, लिंग या यौन चुनावों के कारण हाशिए पर हैं, उन्हें हमेशा पारंपरिक, उदारवादी प्रतिमान में उत्पीड़न का सामना करना पड़ेगा। ब्रिटिश दार्शनिक जॉन स्टुअर्ट मिल की 1859 में प्रकाशित लिबर्टी पर पुस्तक का हवाला देते हुए स्वतंत्रता और अधिकार के बीच ऐतिहासिक संघर्ष की चर्चा करते हुए कहा कि आखिर में नियंत्रण नागरिकों की स्वतंत्रता में निहित होना चाहिए। मिल ने इस नियंत्रण को दो तंत्रों में विभाजित किया है। पहला, नागरिकों के अधिकारों की जरूरत आधारित और दूसरा शासन पर सांविधानिक नियंत्रण आधारित। इसे भारत के संविधान में अनुसूचित जाति, जनजाति व पिछड़े वर्ग को दिए गए अधिकारों व मौलिक अधिकारों के रूप में समझा जा सकता है।
कर्म से मिलती है पहचान
स्वतंत्रता (लिबर्टी) और पहचान (आईडेंटिटी) पर चर्चा करते हुए चीफ जस्टिस ने कहा कि स्वतंत्रता के विचार को संक्षेप में व्यक्त करें, तो आपके घूंसा मारने का आपका अधिकार वहां खत्म होता है, जहां से मेरी नाक शुरू होती है। उन्होंने कहा कि स्वयं के लिए स्वतंत्रता का विकल्प चुनना असल में जीवन की धारा को बदलने की क्षमता है, जबकि, पहचान व्यक्ति के कर्म और जीवन विकल्पों से मिलती है।
राज्य की भूमिका की अनदेखी नहीं हो सकती : सीजेआई चंद्रचूड़ ने कहा कि समकालीन विद्वान इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि सामाजिक पूर्वाग्रहों और पदानुक्रमों को बनाए रखने में राज्य की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। असल में, चाहे राज्य हस्तक्षेप न करे, लेकिन स्वचालित रूप से सामाजिक और आर्थिक पूंजी वाले समुदायों को उन समुदायों पर प्रभुत्व हासिल हो जाता है, जो ऐतिहासिक रूप से हाशिए पर रहे हैं।
जाति व्यवस्था सामाजिक संरचनाओं के लिए बाधक
जाति व्यवस्था पर बात करते हुए जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि अतीत का अवशेष होने के बजाय समकालीन सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक परिदृश्य पर इसका अहम प्रभाव जारी है। विभिन्न जाति समूहों के लिए अवसरों तक पहुंच, सामाजिक स्तरीकरण व आर्थिक असमानताओं के लिहाज से यह व्यवस्था स्पष्ट रूप से मजबूत दिखती है। उन्होंने कहा कि मौजूदा दौर में जाति की गतिशीलता महज धार्मिक संबद्धताओं या ऐतिहासिक असमानता की प्रतिक्रियाओं के तौर पर नहीं है। बल्कि, स्थापित सामाजिक संरचनाओं को बाधित करने में अहम उपकरण के रूप में काम करती है।
दिव्यांगों को अलग श्रेणी के बजाय सुविधाएं देने की जरूरत
दिव्यांगों की समस्याओं पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि उन्हें अपने हक पाने के लिए पहले प्रमाण पत्र लेने होते हैं, जो अपने आप में अलग तरह की चुनौती है। उन्होंने कहा कि दिव्यांगों को अलग से एक श्रेणी के रूप में विभाजित कर उनको सुविधाएं देने के बजाय राज्य को दिव्यांग अनुकूल शिक्षा और रोजगार के अवसरों पर जोर देना चाहिए।