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Delhi Services Bill: अध्यादेश से कितना अलग दिल्ली सेवा विधेयक, AAP सरकार की शक्ति कितनी घटेगी? जानें सबकुछ
Tue, 01 Aug 2023 09:43 PM IST
शिवेंद्र तिवारी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: शिवेंद्र तिवारी
Updated Tue, 01 Aug 2023 09:43 PM IST
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दिल्ली सेवा विधेयक
- फोटो :
AMAR UJALA
विस्तार
दिल्ली सेवा विधेयक आज संसद के निचले सदन यानी लोकसभा में पेश हो गया। इसे आधिकारिक रूप से राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार (संशोधन) विधेयक, 2023 कहा गया है। हालांकि, भारी हंगामे के बीच इस पर चर्चा नहीं हो सकी। अब इस कल चर्चा होगी और सरकार इसे जल्द से जल्द पास कराने की कोशिश करेगी।इससे पहले केंद्र सरकार मई में दिल्ली सेवा अध्यादेश लेकर आई थी। इसके बाद से भाजपा और आप में ठन गई थी। अब संसद में इससे जुड़ा विधेयक आया तो तमाम विपक्षी दलों ने विरोध जताया। लिहाजा जानना जरूरी है कि दिल्ली सेवा विधेयक क्या है? इसमें पुराने कानून से अलग क्या बदलाव किए गए हैं? क्या नया जोड़ा गया है? आइये जानते हैं...
गृह मंत्री अमित
- फोटो :
ANI
पहले जानते हैं आज संसद में क्या हुआ?
दिल्ली सेवा विधेयक मंगलवार को लोकसभा में पेश किया गया। गृह मंत्री अमित शाह ने इस बिल को सदन के पटल पर रखा। इस दौरान गृह मंत्री ने अध्यादेश के माध्यम से तत्काल कानून के पीछे के कारण भी बताए। शाह ने कहा, 'इस सदन के पास कोई भी कानून लाने की शक्ति है। अनुच्छेद 249 के तहत इस सदन को दिल्ली पर कोई भी कानून लाने की शक्ति दी गई है।
आगे उन्होंने कहा, 'संविधान ने सदन को दिल्ली राज्य के संबंध में कोई भी कानून पारित करने की शक्ति दी है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने स्पष्ट कर दिया है कि संसद दिल्ली राज्य के संबंध में कोई भी कानून ला सकती है। सभी आपत्तियां राजनीतिक हैं।'
उधर आप और कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दलों ने अध्यादेश का जोरदार विरोध किया है। हालांकि, लोकसभा में बहुमत वाली भाजपा को राज्यसभा में वाईएसआर कांग्रेस पार्टी और बीजू जनता दल से विधेयक के पारित होने का समर्थन मिलना तय हो गया है। लिहाजा दोनों से सदनों से दिल्ली सेवा विधेयक आसानी से पास हो जाएगा।
दिल्ली सेवा विधेयक मंगलवार को लोकसभा में पेश किया गया। गृह मंत्री अमित शाह ने इस बिल को सदन के पटल पर रखा। इस दौरान गृह मंत्री ने अध्यादेश के माध्यम से तत्काल कानून के पीछे के कारण भी बताए। शाह ने कहा, 'इस सदन के पास कोई भी कानून लाने की शक्ति है। अनुच्छेद 249 के तहत इस सदन को दिल्ली पर कोई भी कानून लाने की शक्ति दी गई है।
आगे उन्होंने कहा, 'संविधान ने सदन को दिल्ली राज्य के संबंध में कोई भी कानून पारित करने की शक्ति दी है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने स्पष्ट कर दिया है कि संसद दिल्ली राज्य के संबंध में कोई भी कानून ला सकती है। सभी आपत्तियां राजनीतिक हैं।'
उधर आप और कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दलों ने अध्यादेश का जोरदार विरोध किया है। हालांकि, लोकसभा में बहुमत वाली भाजपा को राज्यसभा में वाईएसआर कांग्रेस पार्टी और बीजू जनता दल से विधेयक के पारित होने का समर्थन मिलना तय हो गया है। लिहाजा दोनों से सदनों से दिल्ली सेवा विधेयक आसानी से पास हो जाएगा।
सीएम केजरीवाल और दिल्ली एलजी के साथ आप मंत्री-सौरभ भारद्वाज और आतिशी
- फोटो :
Agency
दिल्ली सेवा अध्यादेश क्या है?
दरअसल, मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अगुआई वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने 11 मई को फैसला सुनाते हुए कहा कि दिल्ली में जमीन, पुलिस और कानून-व्यवस्था को छोड़कर बाकी सारे प्रशासनिक फैसले लेने के लिए दिल्ली की सरकार स्वतंत्र होगी। अधिकारियों और कर्मचारियों का ट्रांसफर-पोस्टिंग भी कर पाएगी। उपराज्यपाल इन तीन मुद्दों को छोड़कर दिल्ली सरकार के बाकी फैसले मानने के लिए बाध्य हैं। इस फैसले से पहले दिल्ली सरकार के सभी अधिकारियों के स्थानांतरण और तैनाती उपराज्यपाल के कार्यकारी नियंत्रण में थे।
हालांकि, कोर्ट के फैसले के एक हफ्ते बाद 19 मई को केंद्र सरकार एक अध्यादेश ले आई। केंद्र ने 'गवर्नमेंट ऑफ नेशनल कैपिटल टेरिटरी ऑफ दिल्ली ऑर्डिनेंस, 2023' लाकर प्रशासनिक अधिकारियों की नियुक्ति और तबादले का अधिकार वापस उपराज्यपाल को दे दिया। इस अध्यादेश के तहत राष्ट्रीय राजधानी सिविल सर्विसेज अथॉरिटी का गठन किया गया है। दिल्ली के मुख्यमंत्री, दिल्ली के मुख्य सचिव और गृह सचिव को इसका सदस्य बनाया गया है। मुख्यमंत्री इस अथॉरिटी के अध्यक्ष होंगे और बहुमत के आधार पर यह प्राधिकरण फैसले लेगा। हालांकि, प्राधिकरण के सदस्यों के बीच मतभेद होने पर दिल्ली के उपराज्यपाल का फैसला अंतिम माना जाएगा।
दिल्ली में अधिकारियों के ट्रांसफर-पोस्टिंग के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने जो फैसला सुनाया था, वह केजरीवाल सरकार के पक्ष में था। ऐसे में इसे कानून में संशोधन करके या नया कानून बनाकर ही पलटा जाना संभव था। संसद उस वक्त चल नहीं रही थी, ऐसे में केंद्र सरकार ने अध्यादेश लाकर इस कानून को पलट दिया। छह महीने के अंदर संसद के दोनों सदनों में किसी भी अध्यादेश को पारित कराना जरूरी होता है। इसीलिए मंगलवार को सरकार लोकसभा में राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार (संशोधन) विधेयक, 2023 लेकर आई।
दरअसल, मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अगुआई वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने 11 मई को फैसला सुनाते हुए कहा कि दिल्ली में जमीन, पुलिस और कानून-व्यवस्था को छोड़कर बाकी सारे प्रशासनिक फैसले लेने के लिए दिल्ली की सरकार स्वतंत्र होगी। अधिकारियों और कर्मचारियों का ट्रांसफर-पोस्टिंग भी कर पाएगी। उपराज्यपाल इन तीन मुद्दों को छोड़कर दिल्ली सरकार के बाकी फैसले मानने के लिए बाध्य हैं। इस फैसले से पहले दिल्ली सरकार के सभी अधिकारियों के स्थानांतरण और तैनाती उपराज्यपाल के कार्यकारी नियंत्रण में थे।
हालांकि, कोर्ट के फैसले के एक हफ्ते बाद 19 मई को केंद्र सरकार एक अध्यादेश ले आई। केंद्र ने 'गवर्नमेंट ऑफ नेशनल कैपिटल टेरिटरी ऑफ दिल्ली ऑर्डिनेंस, 2023' लाकर प्रशासनिक अधिकारियों की नियुक्ति और तबादले का अधिकार वापस उपराज्यपाल को दे दिया। इस अध्यादेश के तहत राष्ट्रीय राजधानी सिविल सर्विसेज अथॉरिटी का गठन किया गया है। दिल्ली के मुख्यमंत्री, दिल्ली के मुख्य सचिव और गृह सचिव को इसका सदस्य बनाया गया है। मुख्यमंत्री इस अथॉरिटी के अध्यक्ष होंगे और बहुमत के आधार पर यह प्राधिकरण फैसले लेगा। हालांकि, प्राधिकरण के सदस्यों के बीच मतभेद होने पर दिल्ली के उपराज्यपाल का फैसला अंतिम माना जाएगा।
दिल्ली में अधिकारियों के ट्रांसफर-पोस्टिंग के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने जो फैसला सुनाया था, वह केजरीवाल सरकार के पक्ष में था। ऐसे में इसे कानून में संशोधन करके या नया कानून बनाकर ही पलटा जाना संभव था। संसद उस वक्त चल नहीं रही थी, ऐसे में केंद्र सरकार ने अध्यादेश लाकर इस कानून को पलट दिया। छह महीने के अंदर संसद के दोनों सदनों में किसी भी अध्यादेश को पारित कराना जरूरी होता है। इसीलिए मंगलवार को सरकार लोकसभा में राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार (संशोधन) विधेयक, 2023 लेकर आई।
Delhi CM Arvind Kejriwal with Lieutenant governor of Delhi, Vinai Kumar Saxena
- फोटो :
Agency (File Photo)
नया बिल अध्यादेश से कितना अलग?
जानकारी के मुताबिक, विधेयक में अध्यादेश के सभी प्रमुख प्रावधान होंगे। हालांकि, विधेयक में अध्यादेश में शामिल उस प्रावधान का कोई जिक्र नहीं है जो राज्य विधानसभा को 'सेवाओं' पर कोई कानून बनाने से रोकता है।
यह विधेयक अखिल भारतीय सेवाओं और दिल्ली और अंडमान निकोबार द्वीप सिविल सेवाएं (DANICS) से संबंधित अधिकारियों की नियुक्ति पर केंद्र सरकार को दिल्ली सरकार पर प्रमुखता देगा। इसमें अध्यादेश में उल्लिखित उस प्रावधान को हटा दिया गया है, जिसके तहत 'सेवाओं' पर कोई कानून बनाने में राज्य विधानसभा की कोई भूमिका नहीं थी।
विधेयक में दिल्ली सरकार के लिए केंद्र सरकार को वार्षिक रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिए अध्यादेश के तहत अनिवार्य आवश्यकता को हटा दिया गया। बिल में केंद्र सरकार को भेजे जाने वाले प्रस्तावों या मामलों से संबंधित मंत्रियों के आदेशों/निर्देशों को एलजी और दिल्ली के मुख्यमंत्री के समक्ष रखने की अनिवार्यता को भी हटा दिया गया।
अध्यादेश से अलग बिल में एनसीटी सरकार को किसी भी प्राधिकरण, बोर्ड, आयोग या वैधानिक निकाय में एलजी द्वारा नियुक्ति के लिए उपयुक्त व्यक्तियों के एक पैनल की सिफारिश करने की अनुमति देने के लिए बिल की धारा 45 डी में उप-धारा (बी) जोड़ा गया है। अध्यादेश में (धारा 45डी के तहत) ऐसी सभी शक्तियां राष्ट्रपति या दूसरे शब्दों में केंद्र के पास थीं।
हालांकि, प्रावधान में कहा है कि राज्य सरकार की सिफारिशें करने की शक्ति केवल राज्य विधानसभा द्वारा निर्मित और शासित निकायों तक ही सीमित होगी। साथ ही, इस मामले में दिल्ली सरकार की भूमिका सिफारिश करने तक ही सीमित रहेगी। विधेयक एलजी को सिफारिशों को अस्वीकार करने या संशोधन की मांग करने की शक्ति प्रदान करेगा।
विधेयक के अनुसार, दिल्ली सरकार में वरिष्ठ अधिकारियों के सभी स्थानांतरण और पोस्टिंग दिल्ली के मुख्यमंत्री की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय समिति द्वारा की जाएगी।
जानकारी के मुताबिक, विधेयक में अध्यादेश के सभी प्रमुख प्रावधान होंगे। हालांकि, विधेयक में अध्यादेश में शामिल उस प्रावधान का कोई जिक्र नहीं है जो राज्य विधानसभा को 'सेवाओं' पर कोई कानून बनाने से रोकता है।
यह विधेयक अखिल भारतीय सेवाओं और दिल्ली और अंडमान निकोबार द्वीप सिविल सेवाएं (DANICS) से संबंधित अधिकारियों की नियुक्ति पर केंद्र सरकार को दिल्ली सरकार पर प्रमुखता देगा। इसमें अध्यादेश में उल्लिखित उस प्रावधान को हटा दिया गया है, जिसके तहत 'सेवाओं' पर कोई कानून बनाने में राज्य विधानसभा की कोई भूमिका नहीं थी।
विधेयक में दिल्ली सरकार के लिए केंद्र सरकार को वार्षिक रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिए अध्यादेश के तहत अनिवार्य आवश्यकता को हटा दिया गया। बिल में केंद्र सरकार को भेजे जाने वाले प्रस्तावों या मामलों से संबंधित मंत्रियों के आदेशों/निर्देशों को एलजी और दिल्ली के मुख्यमंत्री के समक्ष रखने की अनिवार्यता को भी हटा दिया गया।
अध्यादेश से अलग बिल में एनसीटी सरकार को किसी भी प्राधिकरण, बोर्ड, आयोग या वैधानिक निकाय में एलजी द्वारा नियुक्ति के लिए उपयुक्त व्यक्तियों के एक पैनल की सिफारिश करने की अनुमति देने के लिए बिल की धारा 45 डी में उप-धारा (बी) जोड़ा गया है। अध्यादेश में (धारा 45डी के तहत) ऐसी सभी शक्तियां राष्ट्रपति या दूसरे शब्दों में केंद्र के पास थीं।
हालांकि, प्रावधान में कहा है कि राज्य सरकार की सिफारिशें करने की शक्ति केवल राज्य विधानसभा द्वारा निर्मित और शासित निकायों तक ही सीमित होगी। साथ ही, इस मामले में दिल्ली सरकार की भूमिका सिफारिश करने तक ही सीमित रहेगी। विधेयक एलजी को सिफारिशों को अस्वीकार करने या संशोधन की मांग करने की शक्ति प्रदान करेगा।
विधेयक के अनुसार, दिल्ली सरकार में वरिष्ठ अधिकारियों के सभी स्थानांतरण और पोस्टिंग दिल्ली के मुख्यमंत्री की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय समिति द्वारा की जाएगी।