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मौसम विभाग की कहानी: उपनिषद में है मौसम विज्ञान का राज, वेधशालाओं से लगाए जाते थे पूर्वानुमान

Wed, 12 Jul 2023 08:40 AM IST
हिमांशु मिश्रा स्पेशल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: हिमांशु मिश्रा Updated Wed, 12 Jul 2023 08:40 AM IST
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सार
मौसम विज्ञान का इतिहास काफी पुराना है। उपनिषद में भी इसका जिक्र मिलता है। इससे जुड़े कई रोचक तथ्य भी हैं। आइए जानते हैं मौसम विज्ञान और मौसम विभाग की पूरी कहानी... 
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History and story of Meteorological Department: Secret of meteorology is in the Upanishads
मौसम विभाग की कहानी - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

देश में इन दिनों बारिश से हाहाकार मचा हुआ है। हर रोज मौसम विभाग इसके लिए अलर्ट और अपडेट जारी कर रहा है। कुछ दिन पहले ही गुजरात से चक्रवाती तूफान 'बिपरजॉय' ने खूब तबाही मचाई थी। हालांकि, मौसम विभाग ने पहले ही इसको लेकर अलर्ट जारी कर दिया था। इसके चलते समय रहते बड़ी संख्या में लोग सुरक्षित स्थानों तक पहुंचा दिए गए थे। अब बारिश को लेकर भी हर किसी की निगाहें मौसम विभाग के अपडेट पर ही रहती है। मौसम विभाग से ही मालूम चलता है कि कब, कहां और कितनी बारिश होगी? किस क्षेत्र में कैसा मौसम रहेगा? तापमान बढ़ेगा या घटेगा? मौसम विभाग के इन्हीं पूर्वानुमानों की बदौलत लोग सजग हो जाते हैं। 


खैर, अब आपके मन में सवाल होगा कि आखिर ये मौसम विभाग को पता कैसे चल जाता है कि कब बारिश होने वाली है? कब तापमान बढ़ेगा और कब आएगा तूफान? मौसम विभाग काम कैसे करता है? मौसम विज्ञान की शुरुआत कब हुई? आइए जानते हैं मौसम विभाग के बारे में सबकुछ... 

शुरुआत मौसम विज्ञान की कहानी से करते हैं
करीब 650 ई.पू. में यूनानियों ने बादलों की बनावट का अनुमान लगाया था। इसके बाद करीब 340 ई.पू. में अरस्तू ने अपने ग्रंथ “मीटिरॉलॉजिका” में मौसम की व्याख्या की थी। चीन में भी 300 ई.पू. से मौसम की भविष्यवाणी से जुड़ी कई चीजें मिली हैं। आमतौर पर मौसम पूर्वानुमान की प्राचीन विधियां विभिन्न वायुमंडलीय घटनाओं के अवलोकन पर आधारित थी। मतलब ऐसा माना जाता था कि अगर सूर्यास्त लाल रंग के साथ होता था तो अगले दिन का मौसम साफ रहेगा। हालांकि, ऐसे अनुमान हमेशा सही साबित नहीं होते थे। 

भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के अनुसार, भारत में मौसम विज्ञान का उल्लेख 3000 ई.पू से मिलता है। उपनिषद में पुर्वानुमान और मौसम विज्ञान से जुड़े कई तथ्य मिले हैं। 500 ई.पू. में लिखी गई वराहमिहिर की शास्त्रीय कृति बृहद्संहिता से भी पता चलता है कि उस वक्त वायुमंडलीय प्रक्रियाओं का गहन अध्ययन होता था। खास बात है कि भारत में दुनिया की कुछ सबसे पुरानी मौसम विज्ञान वेधशालाएं हैं। ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत के मौसम और जलवायु का अध्ययन करने के लिए यहां कई ऐसे स्टेशन स्थापित किए थे। 1785 में कलकत्ता और 1796 में मद्रास में स्टेशन स्थापित किए गए थे। 

1784 में कलकत्ता और 1804 में मुंबई में द एशियाटिक सोसाइटी की स्थापना हुई। इससे भारत में मौसम विज्ञान में वैज्ञानिक अध्ययन को बढ़ावा मिला। कलकत्ता में कैप्टन हैरी पिडिंगटन ने 1835-1855 के दौरान उष्णकटिबंधीय तूफान से संबंधित 40 पन्नों का जर्नल ऑफ एशियाटिक सोसाइटी प्रकाशित किया। इसमें उन्होंने "चक्रवात" शब्द का अर्थ बताया, जिसका अर्थ है ‘सांप की कुंडली’। 1842 में उन्होंने 'तूफान के नियम' पर अपना एक शोध प्रकाशित किया। 19वीं शताब्दी तक प्रांतीय सरकारों के तहत भारत में कई वेधशालाएं काम करने लगीं।

फिर कैसे बदला मौसम विज्ञान?
17वीं सदी में तापमापी और वायुदाबमापी के आविष्कार होने और वायुमंडलीय गैसों के व्यवहार संबंधी नियमों के प्रतिपादन के बाद आधुनिक मौसम विज्ञान अस्तित्व में आया। मौसम पूर्वानुमान के वर्तमान युग की शुरुआत साल 1937 में टेलीग्राफ के आविष्कार के बाद से मानी जाती है। टेलीग्राफ के आविष्कार के बाद किसी विशाल क्षेत्र के मौसम पूर्वानुमान के लिए आवश्यक सूचनाओं को एकत्र करना संभव हो पाया था। साल 1922 में ब्रिटिश भौतिकविद लेविंस फ्राई रिचर्डसन ने संख्यात्मक मौसम पूर्वानुमान की संभावना का प्रस्ताव रखा। 

हालांकि, उस समय पूर्वानुमान के लिए आवश्यक आंकड़ों की बड़ी मात्रा में जटिल गणना के लिए तेज कंप्यूटर नहीं थे। ऐसे में 1955 में इलेक्ट्रॉनिक कंप्यूटर के विकास के साथ ही संख्यात्मक मौसम पूर्वानुमान का सही विकास हो पाया। इसके बाद संख्यात्मक मौसम पूर्वानुमान के लिए वायुमंडल के गणितीय मॉडलों का उपयोग किया जाने लगा। अभी मौसम वैज्ञानिकों द्वारा सटीक पूर्वानुमान के लिए विशाल आंकड़ों के जुटाने और उसकी गणना के लिए शक्तिशाली सुपर कंप्यूटरों का उपयोग किया जाता है। 

आमतौर पर मौसम पूर्वानुमान 24 से 48 घंटों के लिए किया जाता है। अगले 48 घंटों से एक सप्ताह के लिए मौसम के बारे में किया जाने वाला पूर्वानुमान मध्यम अवधि पूर्वानुमान कहलाता है। मध्यम अवधि पूर्वानुमान सामान्य पूर्वानुमान से जटिल कार्य है। इसके लिए आगामी मौसम को प्रभावित करने वाली बीती मौसमी घटनाओं को सूचीबद्ध किया जाता है। मध्यम अवधि पूर्वानुमान के तहत आगामी 10 दिनों में वायुमंडल के व्यवहार के बारे में भविष्यवाणी की जाती है। 

मौजूदा समय में मौसम के पूर्वानुमान के लिए समष्टि पूर्वानुमान यानी इन्सेम्बल फॉरकास्ट का उपयोग होने लगा है। समष्टि पूर्वानुमान बारिश की बूंदों की आरंभिक स्थिति में बहुत सूक्ष्म परिवर्तन द्वारा अनेक बार आंशिक रूप से अलग आरंभिक बिन्दुओं को निर्धारित कर कुछ दिन आगे की भविष्यवाणी करता है। 

एक समष्टि पूर्वानुमान मौसम संबंधी बहुत से संख्यात्मक पूर्वानुमान मॉडलों (5 से लेकर 100 तक) पर निर्भर होता है जो आरंभिक स्थितियों और वायुमंडल के न्यूमेरिकल रिप्रजेंटेशन से अलग होते हैं। इस प्रकार पूर्वानुमान के दो मुख्य स्रोतों में अनिश्चितता होती है। अगर किसी समय पर अधिकतर पूर्वानुमानों के परिणाम समान हों तब मौसम वैज्ञानिकों का पूर्वानुमान के प्रति विश्वसनीयता बढ़ जाती है। दूसरी तरफ यदि समष्टि पूर्वानुमानों के परिणामों में बहुत अंतर होता है तब किसी विशेष पूर्वानुमान की विश्वसनीयता बहुत कम हो जाती है। हालांकि भारतीय में मौसम का पूर्वानुमान अधिकतर मानसून का ही पूर्वानुमान होता है जिसके लिए विभिन्न पारंपरिक सिद्धांतों के साथ-साथ जेट धारा का भी अध्ययन किया जाता है। 

इस तरह से डेटा जुटाते हैं वैज्ञानिक 
मौसम के पूर्वानुमान के लिए कई फैक्टर्स जिम्मेदार होते हैं। इसके लिए तमाम यंत्रों की सहायता से वातावरण और जमीन की सतह का तापमान, नमी, हवा की गति और दिशा, ओस, बादलों की स्थिति आदि को देखा जाता है। इसके लिए कई तरह की मशीनों और उपकरणों का इस्तेमाल किया जाता है, जैसे- बारिश के लिए वर्षामापी यंत्र, हवा की गति मापने के लिए एनीमोमीटर, हवा की दिशा के लिए विंडवेन, वाष्पीकरण की दर को मापने के लिए पेन-इवेपोरीमीटर, सनसाइन रिकॉर्डर, ओस के लिए ड्यूगेज, जमीन का तापमान नापने के लिए थर्मामीटर आदि का प्रयोग किया जाता है। 

मौसम का डेटा जुटाने में हाई-स्पीड कंप्यूटर, मौसम संबंधी उपग्रह, एयर बैलून और मौसम रडार भी अहम भूमिका निभाते हैं। इसके बाद जुटाए गए डेटा का अध्ययन किया जाता है, साथ ही वर्तमान डेटा और मौसम के पिछले डेटा को भी देखा जाता है। इसके बाद मौसम की भविष्यवाणी की जाती है। 

मौसम विभाग के पास कई तरह के सेटेलाइट मौजूद होते हैं जो बादलों की तस्वीर देते रहते हैं। इससे मौसम विभाग के लोगों को ये अनुमान लगता रहता है कि कहां बादल हैं और कहां नहीं हैं। हालांकि बादलों को देखकर केवल इतना अंदाजा लगाया जा सकता है कि किस जगह धूप निकलेगी और किस जगह बादल छाए रहने का अनुमान है। बारिश का अनुमान लगाने के लिए ये देखना पड़ता है कि बादलों में कितना पानी है। इसके लिए धरती से आकाश की ओर रडार छोड़ी जाती है। रडार के जरिए भेजी गई तरंगें बादलों से टकरा कर वापस आती हैं और उसके बाद उनका अध्ययन किया जाता है। इसके बाद मौसम विभाग ये भविष्यवाणी करता है कि कहां बारिश हो सकती है। 

कैसे पता चलता है कि कहां, कितनी बारिश हुई? 
अब मौसम विभाग ये भी बता देता है कि कहां कितनी MM बारिश हुई है। इसे मापने का तरीका बेहद साधारण है। दरअसल मौसम विभाग के पास एक बाल्टीनुमा कीप होती है, जो ऐसी जगह पर रखी जाती है, जहां न कोई बड़ी इमारत हो और न ही कोई पेड़ हो। ये ऐसी जगह होती है, जहां जब पानी गिरे तो वो कीप अच्छी तरह से भर सके। इस कीप में MM में नंबर लिखे होते हैं। बारिश रुकने के बाद इन नंबर्स को देख लिया जाता है और इसके आधार पर मौसम विभाग ये जारी करता है कि किस जगह कितने MM बारिश हुई। 

चार तरह के होते हैं मौसम पूर्वानुमान
मौसम विभाग चार तरह की भविष्यवाणियां करता है। पहला तात्कालिक जो अगले 24 घंटे के लिए होता है, दूसरा अल्प अवधि जो एक से तीन दिनों के लिए होता है, तीसरा मध्यम अवधि जो चार से 10 दिनों के लिए होता है और चौथा विस्तृत अवधि जो 10 से ज्यादा दिनों के लिए होता है।
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