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2040 तक पूरे देश में ढाई करोड़ से ज्यादा लोग आ सकते हैं बाढ़ की चपेट में

Tue, 06 Aug 2019 07:03 PM IST
अनिल पांडेय रिसर्च डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
रिसर्च डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: अनिल पांडेय Updated Tue, 06 Aug 2019 07:03 PM IST
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सार
  • रेत भरने से नदियों की गहराई कम
  • शहरों का खराब ड्रेनेज सिस्टम
  • पत्थर गिरने से रास्ता बदलती हैं नदियां
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Heavy rains cause flooding in many states of India, Know the reason and cause of Flood
बाढ़ और अतिवृष्टि - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

बिहार, गुजरात, मुंबई, मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश के कई जिले बाढ़ या फिर जलभराव से त्रस्त हैं। बिहार में लगभग हर साल बाढ़ आती है। नेपाल से सटे सीमावर्ती जिलों में हाहाकार मचा हुआ है। पिछले साल भी राज्य में बाढ़ आई थी। हालांकि, असर उतना ज़्यादा नहीं था। पर उससे एक साल पहले यानी साल 2017 में आई बाढ़ ने पूरे उत्तर बिहार में भीषण तबाही मचायी थी।



ऐसे ही हालात गुजरात के भी हैं, जहां कई स्थानों में वायुसेना के हेलिकॉप्टर की मदद से बाढ़ में फंसे लोगों को निकाला गया। मुंबई भी पानी में डूबी हुई है। हालात इतने बदतर थे कि ट्रेन बाढ़ में फंस गई थी और लोगों को बचाने के लिए स्पेशल ऑपरेशन चलाना पड़ा था।


ऐसे हालातों में एनडीआरएफ, एसडीआरएफ और सशस्त्र बल की टीमों को सबसे पहले राहत और बचाव कार्य के लिए लगाया जाता है। पिछले साल केरल और चेन्नई में भी बाढ़ ने कहर बरपाया था। पूर्वोत्तर के राज्य भी इससे अछूते नहीं हैं। बाढ़ की वजह से हजारों हेक्टेयर जमीन को नुकसान होता है। वहीं वर्षाकाल की शुरुआत में मुंबई में जोरदार बारिश और खराब ड्रेनेज सिस्टम से हालात बुरे हो गए थे।

यह भी पढ़ेंः 13 साल में 359 फीसदी बढ़ा बीएमसी का बजट फिर भी मुंबई में बारिश से डूबी सड़कें और ट्रेन की पटरियां

केरल में 2018 की बाढ़ की वजह से लाखों लोग विस्थापित हुए थे और डेढ़ हजार से ज्यादा हेक्टेयर जमीन पर लगी फसल बरबाद हुई थी। चाय, कॉफी, इलायची और रबड़ के उत्पादों को भी बहुत भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा था।

केरल में 44 नदियों पर 70 बांध

केरल में पिछले साल आई प्रलयंकारी बाढ़ ने केरल का चेहरा ही बदल कर रख दिया है। इस बाढ़ को आए एक साल होने को है, जिसमें 350 से ज्यादा लोग मारे गए थे और बड़े पैमाने पर जान-माल की हानि हुई थी। जानकारों का कहना है कि इस तबाही के पीछे बांधों का भी बड़ा हाथ है जो राज्य में बहने वाली 44 नदियों पर बनाए गए हैं।

65 साल में एक लाख से अधिक मौतें बाढ़ से

भारत सरकार के आंकड़ों पर आधारित विश्व बैंक के एक अध्ययन में अंदेशा जताया गया है कि 2040 तक देश के ढाई करोड़ लोग भीषण बाढ़ की चपेट में होंगे। बाढ़ प्रभावित आबादी में ये छह गुना उछाल होगा। केंद्रीय जल आयोग के मुताबिक 1953 से 2017 की 64 साल की अवधि में अतिवृष्टि और बाढ़ से देश में कुल 107,487 मौतें हुई हैं।

फसल, मकान और सार्वजनिक सेवाओं को तीन लाख 65 हजार 860 करोड़ रुपयों का नुकसान हुआ है। छोटी अवधि में हाई इंटेसिटी बारिश, जलनिकास की जर्जर क्षमता, जलाशयों के रखरखाव में कमी और जल संग्रहण की लचर स्थिति और बाढ़ नियंत्रण उपायों की नाकामी को भारी बाढ़ और उससे होने वाले व्यापक नुकसान के कारणों में बताया गया है।

देश का चार करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र बाढ़ की जद में

राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के मुताबिक देश के कुल करीब 32.9 करोड़ हेक्टेयर भौगोलिक क्षेत्र में से चार करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र, बाढ़ की जद में रहता है। देश में इस समय करीब 226 के आसपास बाढ़ निगरानी केंद्र हैं, जिन्हें 2020 तक 325 किए जाने की योजना है, लेकिन बाढ़ नियंत्रण और निगरानी के समूचे सिस्टम में नए हालात और पुराने रिकॉर्डों को देखते हुए आमूलचूल बदलाव की जरूरत है।

प्रौद्योगिकीय क्षमताओं के विकास के साथ साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर की विशेषज्ञता भी हासिल करनी होगी, लेकिन इन सबसे पहले, प्रोएक्टिव, चौकस, सचेत और कर्तव्यनिष्ठ कर्मचारियों-अधिकारियों वाली सरकारी मशीनरी की जरूरत है।

क्यों आती है बाढ़?

भारत में जून से लेकर सितंबर महीने तक बाढ़ की स्थिति बनी रहती है। इस दौरान होने वाली बारिश ज्यादातर राज्यों में बाढ़ ला देती है। कश्मीर, राजस्थान, गुजरात, बिहार, उत्तर प्रदेश, असम और मध्य प्रदेश करीब हर साल बाढ़ की विभीषिका का शिकार बनते हैं। जुलाई 2017 में राजस्थान के हिल स्टेशन माउंट आबू में भयंकर बारिश हुई थी। बताया जाता है कि यहां इतनी बारिश हुई कि जितनी पिछले 300 साल में नहीं हुई थी।

बाढ़ आने के तीन खास कारण माने जाते हैंः

  1. रेत भरने से नदियों की गहराई कम: देश में बाढ़ आने का एक दूसरा बड़ा कारण नदियों की गहराई कम हो जाना है। देश की ज्यादातर नदियों की गहराई रेत भर जाने से कम हुई है, उनमें उतनी गहराई नहीं बची है जिससे बारिश के पानी को वह अपने अंदर लेकर आगे बढ़ सकें। नतीजा यह होता है कि उथलाई नदियां अतिरिक्त पानी का भार सहन नहीं कर पातीं और अपने तटों के दोनों तरफ बाढ़ उत्पन्न कर देती हैं। ब्रह्मपुत्र नदी इसका सबसे सटीक उदाहरण है। इस नदी का पाट दो किलोमीटर से लेकर 14 किलोमीटर तक फैल चुका है।
  2. शहरों का खराब ड्रेनेज सिस्टम: शहरी क्षेत्रों में बाढ़ जैसी स्थिति के लिए वहां का ड्रेनेज सिस्टम जिम्मेदार है। महानगरों में पानी निकासी की व्यवस्था पुरानी हो गई है। बढ़ती आबादी का बोझ ड्रेनेज प्रणाली संभाल नहीं पातीं। चेन्नई में 2015 में आई बाढ़ ड्रेनेज सिस्टम की विफलता थी। इसके अलावा मुंबई में हर साल की तरह इस साल भी वर्षाकाल की शुरुआत में ही खराब ड्रेनेज सिस्टम की वजह से सड़कों पर पानी गया था और हालात बुरे हो गए थे। दिल्ली और एनसीआर में औसत बारिश ही घंटों जाम का कारण बन जाती है। 
  3. पत्थर गिरने से रास्ता बदलती हैं नदियां: पहाड़ी इलाकों में बाढ़ की बड़ी वजह भूस्खलन को माना जाता है। उत्तराखंड में 2013 में भारी बारिश से बड़ी संख्या में भूस्खलन के हादसे हुए। भूस्खलन में चट्टानें और पत्थर खिसककर नदियों में आ जाते हैं जो नदियों और झरनों के मार्ग को अवरुद्ध कर देते हैं। इससे नदियों का पानी अपने वास्तविक रास्ते को छोड़ आबादी और कृषि क्षेत्र में प्रवेश कर जाता है जिससे बाढ़ की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।
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