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गरीब आरक्षण: 103वें संशोधन अधिनियम पर रोक लगाने से सुप्रीम कोर्ट का इनकार
Fri, 25 Jan 2019 05:03 AM IST
Avdhesh Kumar
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Avdhesh Kumar
Updated Fri, 25 Jan 2019 05:03 AM IST
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सुप्रीम कोर्ट ने आर्थिक रूप से कमजोर सामान्य वर्ग के लोगों को नौकरी व शैक्षिणक संस्थानों में 10 फीसदी आरक्षण संबंधी संविधान संशोधन की वैधता का परीक्षण करने का निर्णय लिया है। हालांकि शीर्ष अदालत ने अधिनियम पर रोक लगाने से इनकार किया है। याचिका यूथ फॉर इक्वालिटी सहित कई संगठन और लोगों ने दायर की है।
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चीफ जस्टिस रंजन गोगई और न्यायमूर्ति संजीव खन्ना की पीठ ने संशोधित अधिनियम की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली परीक्षण करने का निर्णय लेते हुए केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है। सरकार को तीन हफ्ते में जवाब दाखिल करने के लिए कहा गया है।
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हालांकि पीठ ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के इस आग्रह को स्वीकार कर किया जी संशोधित अधिनियम पर रोक न लगाई जाए। याचिकाओं में संविधान(103वें संशोधन) अधिनियम, 2019 की वैधता को चुनौती दी है, जिसे संसद के दोनों सदनों ने बतौर 124वें संविधान संशोधन विधेयक, 2019 के तौर पर पारित किया गया था।
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याचिकाओं में संविधान में अनुच्छेद-15(6) और 15(6) को जोड़े जाने को संविधान के मूल ढांचे में बदलाव करार दिया गया है। साथ ही यह सुप्रीम कोर्ट के फैसले को निष्फल करना है। याचिका में कहा गया कि इस संविधान संशोधन में अनुच्छेद 14(समानता) और 16(कोई भेदभाव नहीं) पर विचार नहीं किया गया है जो समानता का मूल तत्व है। साथ ही आरक्षण की सीमा का उल्लंघन भी किया गया है।
याचिकाओं में ने इंदिरा साहने(मंडल) मामले में सुप्रीम कोर्ट की नौ सदस्यीय संविधान पीठ के फैसले का हवाला देते हुए कहा गया है कि उस फैसले में कहा गया कि आर्थिक मानदंड आरक्षण का एकमात्र आधार नहीं हो सकता। साथ ही उस फैसले में कहा गया कि था कि आरक्षण 50 फीसदी से अधिक नहीं होना चाहिए।
साथ ही याचिकाओं में पांच सदस्यीय संविधान द्वारा एम नागराज मामले में दिए गए फैसले का भी हवाला दिया गया है। उस फैसले में संविधान पीठ ने अनुच्छेद-16(4ए) और 16(4बी) को इस शर्त पर संवैधानिक रूप से वैध बताया था बशर्ते राज्य यह प्रमाण दे कि उनका प्रतिनिधित्व अपर्याप्त है।
याचिकाओं में कहा गया है कि यह संविधान संशोधन अनुच्छेद-14 के तहत मिले समानता के अधिकार के मूल तत्व के खिलाफ है। साथ ही याचिकाकर्ताओं का यह भी कहना है कि इस संशोधन में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग की व्याख्या नहीं की गई है, यह राज्य पर छोड़ दिया गया है।