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स्वास्थ्य: हमारी यादें छीन रहा वायु प्रदूषण, डिमेंशिया का खतरा 40% ज्यादा; सीधे दिमाग को पहुंचा रहा नुकसान

Sun, 01 Mar 2026 06:04 AM IST
Pavan अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली Published by: Pavan Updated Sun, 01 Mar 2026 06:04 AM IST
सार

अल्जाइमर, जो डिमेंशिया का सबसे आम रूप है, दुनिया भर में करीब पांच करोड़ लोगों को प्रभावित कर रहा है। अमेरिका में हुए इस व्यापक अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल प्लोस मेडिसिन में प्रकाशित हुए हैं। वहीं, भारत के कई शहरों में पीएम 2.5 का स्तर विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों से कई गुना अधिक है।

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Health: Air pollution is robbing our memories, increasing risk of dementia by 40%; directly harming the brain
वायु प्रदूषण - फोटो : अमर उजाला प्रिंट

विस्तार

जिस हवा को हम जिंदगी समझकर भीतर खींच रहे हैं, वही हमारी याददाश्त पर हमला कर रही है, हमारे जीवन भर की यादों को नष्ट कर रही है। नई अंतरराष्ट्रीय स्टडी ने साफ कर दिया है कि वायु प्रदूषण अब सिर्फ फेफड़ों और दिल की बीमारी का मसला नहीं रहा, बल्कि यह सीधे दिमाग को नुकसान पहुंचा रहा है। शोध में पाया गया है कि हवा में हर 10 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर पीएम2.5 की बढ़ोतरी से डिमेंशिया का खतरा करीब 40 फीसदी और अल्जाइमर का जोखिम 47 फीसदी तक बढ़ सकता है। भारत जैसे प्रदूषणग्रस्त देशों के लिए यह किसी खतरे की घंटी से कम नहीं है।
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अमेरिका में हुए इस व्यापक अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल प्लोस मेडिसिन में प्रकाशित हुए हैं। शोधकर्ताओं ने 2000 से 2018 के बीच 65 वर्ष से अधिक उम्र के 2.78 करोड़ अमेरिकी नागरिकों के स्वास्थ्य संबंधी आंकड़ों का विश्लेषण किया। अध्ययन में स्पष्ट संकेत मिले कि जो लोग लंबे समय तक पीएम 2.5 के संपर्क में रहे, उनमें अल्जाइमर और अन्य प्रकार के डिमेंशिया का खतरा उल्लेखनीय रूप से अधिक था। खास बात यह रही कि यह जोखिम हाई ब्लड प्रेशर, स्ट्रोक या डिप्रेशन जैसी बीमारियों को ध्यान में रखने के बाद भी बना रहा। यानी जहरीली हवा दिमाग पर सीधे प्रहार कर सकती है। गौरतलब है कि अल्जाइमर, जो डिमेंशिया का सबसे आम रूप है, दुनिया भर में करीब पांच करोड़ लोगों को प्रभावित कर रहा है। ऐसे में यह अध्ययन वैश्विक सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर चेतावनी के रूप में सामने आया है।
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स्ट्रोक झेल चुके लोगों के लिए और घातक
अध्ययन में यह भी सामने आया कि जिन लोगों को पहले स्ट्रोक हो चुका था, उनमें प्रदूषण का असर और ज्यादा गंभीर पाया गया। यानी जिनका मस्तिष्क पहले से कमजोर है, उनके लिए जहरीली हवा और भी अधिक खतरनाक साबित हो सकती है। जिन इलाकों में यह अध्ययन किया गया, वहां पीएम 2.5 का स्तर विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी डब्ल्यूएचओ द्वारा निर्धारित सुरक्षित सीमा से लगभग दोगुना था। डब्ल्यूएचओ के अनुसार सालाना औसत पीएम2.5 का स्तर पांच माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर से अधिक नहीं होना चाहिए, जबकि भारत, चीन और अफ्रीका के कई हिस्सों में यह इससे कई गुना ज्यादा है।

भारत के लिए सीधी चेतावनी
भारत के कई शहरों में पीएम 2.5 का स्तर विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों से कई गुना अधिक है। तेजी से बढ़ती बुजुर्ग आबादी और लगातार खराब होती वायु गुणवत्ता का मेल भविष्य में डिमेंशिया और अल्जाइमर के मामलों में विस्फोटक वृद्धि का कारण बन सकता है। यह सिर्फ पर्यावरण का सवाल नहीं है, यह परिवारों की स्मृतियों, सामाजिक ढांचे और आने वाली पीढ़ियों के मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ा संकट है। वैज्ञानिकों का साफ कहना है कि यदि ट्रैफिक, उद्योगों और पराली जलाने से निकलने वाले प्रदूषण को नियंत्रित किया जाए और हवा की गुणवत्ता सुधारी जाए, तो भविष्य में अल्जाइमर और डिमेंशिया के मामलों को कम किया जा सकता है। साफ हवा का मतलब सिर्फ बेहतर सांस नहीं, बल्कि सुरक्षित यादें भी हैं। अब चुनौती यह नहीं कि प्रदूषण कितना खतरनाक है, बल्कि यह है कि हम इसे रोकने के लिए कितनी जल्दी और कितनी सख्ती से कदम उठाते हैं।

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