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Madras High Court: स्कूल टीसी में बकाया फीस के जिक्र पर हाईकोर्ट नाराज, कहा- यह बच्चे का निजी दस्तावेज
Fri, 19 Jul 2024 03:39 PM IST
निर्मल कांत
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चेन्नई
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चेन्नई
Published by: निर्मल कांत
Updated Fri, 19 Jul 2024 03:39 PM IST
सार
Madras High Court: उच्च न्यायालय ने तमिलनाडु सरकार को निर्देश दिया कि वह राज्य के सभी स्कूलों को आदेश जारी करे कि वह प्रवेश के समय छात्र से टीसी प्रस्तुत करने करने के लिए जोर न दें और स्कूल प्रबंधन को शुल्क का भुगतान न करने या देरी से भुगतान करने सहित दस्तावेज में अनावश्य प्रविष्टियां न करें।
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मद्रास उच्च न्यायालय।
- फोटो : एएनआई
विस्तार
किसी छात्र का स्थानांतरण प्रमाण पत्र (टीसी) स्कूलों के लिए लंबित शुल्क लेने का जरिया नहीं है। बल्कि, वह उसके नाम पर एक निजी दस्तावेज है और उसमें बकाया शुल्क के संबंध में कोई प्रविष्टि नहीं की जानी चाहिए। मद्रास उच्च न्यायालय ने एक मामले की सुनवाई के दौरान शुक्रवार को यह टिप्पणी की।
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पीठ ने तमिलनाडु सरकार को जारी किए निर्देश
उच्च न्यायालय ने तमिलनाडु सरकार को निर्देश दिया कि वह राज्य के सभी स्कूलों को आदेश जारी करे कि वह प्रवेश के समय छात्र से टीसी प्रस्तुत करने करने के लिए जोर न दें और स्कूल प्रबंधन को शुल्क का भुगतान न करने या देरी से भुगतान करने सहित दस्तावेज में अनावश्य प्रविष्टियां न करें। न्यायमूर्ति एसएम सुब्रमण्यम और न्यायमूर्ति सी.कुमारप्पन की खंडपीठ ने निर्देश में कहा कि आदेश के उल्लंघन की स्थिति में छात्रों को निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम (आरटीई) की धारा 17 और बच्चों की सुरक्षा के लिए लागू प्रासंगिक कानूनों के तहत कार्रवाई शुरू की जानी चाहिए।
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'आरटीई अधिनियम के अनुरूप जरूरी संशोधन करें'
खंडपीठ ने राज्य सरकार को यह भी निर्देश दिया कि वह तमिलनाडु के शिक्षा नियमों और माध्यमिक स्कूलों के लिए विनियमन संहिता पर फिर से विचार करे। अदालत ने कहा कि राज्य सरकार तीन महीने की अवधि के भीतर आरटीई अधिनियम के प्रावधानों के अनुरूप सभी जरूरी संशोधन करे।
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एकल न्यायाधीश के आदेश को रद्द किया
राज्य सरकार की ओर से दायर अपील को स्वीकार करते हुए खंडपीठ ने एकल न्यायाधीश के आदेश को रद्द किया। एकल न्यायाधीश ने ऑल इंडिया प्राइवेट स्कूल लीगल प्रोटेक्शन सोसायटी की याचिका को स्वीकार किया था और पाया था कि देय फीस के बकाया का संकेत देने से छात्र और उसके माता -पिता पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ता है।
'फीस में देरी के लिए छात्रों को परेशना करना क्रूरता'
पीठ ने कहा कि शुल्क का भुगतान न करने या देरी से भुगतान करने पर बच्चों को परेशान करना क्रूरता है और किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम 2015 की धारा 75 के तहत अपराध है। अदालत ने कहा, अगर बकाया फीस हो तो स्कूलों को कानून के अनुसार अभिभावकों पर उचित कार्रवाई करने का पूरा अधिकार है। लेकिन इस प्रक्रिया में शुल्क का भुगतान में चू पर बच्चे को परेशान करना या दंडित करना अपराध है और यह किशोर न्याय अधिनियम के दायरे में आता है।