हरियाणा में खुद के एजेंडे पर काम नहीं कर सकेगी भाजपा, दोबारा शुरू सकता है 'खर्ची और पर्ची' का दौर
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हरियाणा में सरकार बनाने के लिए जरुरी बहुमत से मात्र छह सीट पीछे रहने वाली भाजपा निर्दलीय विधायकों के समर्थन से दोबारा सत्ता में वापसी की तैयारी कर रही है। प्रदेश की राजनीति करवट ले रही है। पिछले पांच साल में मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने भाजपा के एजेंडे को धरातल पर लागू करने का प्रयास किया था। चाहे वह शिक्षा का क्षेत्र हो या नौकरियां देने का, यहां पर भाजपा की नीतियां लागू कर दी गई थी।
फिर शुरू हो सकता है 'खर्ची और पर्ची' का दौर
हालांकि इन नीतियों का विपक्ष यह कहते हुए विरोध करता रहा कि इसके जरिए भाजपा प्रदेश का तानाबाना खराब कर रही है। भाजपा ने चुनाव प्रचार के दौरान यह मुद्दा प्रमुखता से उठाया था कि खट्टर सरकार ने अपने कार्यकाल में 'खर्ची और पर्ची' पर काफी हद तक रोक लगाई है। इससे भ्रष्टाचार पर अंकुश लगा है। भाजपा का दावा था कि न ही नौकरियों में और न ही तबादलों में भ्रष्टाचार का कोई मामला सामने आया। चूंकि अब खट्टर सरकार 2.0 अपने खुद के बहुमत से सरकार नहीं बना रही है और उसे निर्दलीयों की बैसाखी का सहारा लेना पड़ा है। ऐसे में यह सवाल उठ रहा है कि क्या इस बार खट्टर सरकार अपने खुद के एजेंडे पर काम नहीं कर सकेगी। प्रदेश में 'खर्ची और पर्ची' यानी भ्रष्टाचार का दौर फिर से शुरु हो सकता है।
नीतियां बनाने में संघ की मदद
पिछले पांच साल में मुख्यमंत्री खट्टर ने भाजपा की नीतियों के अनुसार शासन चलाया था। यहां तक कि कई विभागों में नीतियां बनाने के लिए आरएसएस के पदाधिकारियों की मदद ली गई। स्कूलों की किताबों का सिलेबस तक बदलने या उसमें कुछ नया जोड़ने की नीति बनने लगी। प्रदेश की राजनीति पर गहरी पकड़ रखने वाले चंद्रप्रकाश बताते हैं कि खट्टर सरकार ने कुछ काम ऐसे किए थे, जो पहले नहीं हुए। इनमें मेरिट के आधार पर नौकरी देना और ऑन लाइन तबादला नीति लागू करना, आदि कार्य शामिल हैं।
लोकसभा चुनाव के दौरान खट्टर ने इन बातों को 'खर्ची और पर्ची' से जोड़कर खूब भुनाया था। उनका कहना था कि पूर्व हुड्डा सरकार में खर्ची और पर्ची, दोनों चलती थी। अगर किसी को नौकरी लेनी होती या तबादला कराना होता, तो उसे खर्ची व पर्ची, का सहारा लेना पड़ता था। खट्टर सरकार ने हर क्षेत्र में अपने एजेंडे पर काम किया। वजह, पार्टी के पास पूर्ण बहुमत था। केंद्र की ओर से भी मुख्यमंत्री खट्टर को काम करने के लिए फ्री हैंड दिया गया।
मंत्रिमंडल में ज्यादातर नए चेहरे
2014 में जब पहली बार भाजपा सरकार बनी तो मुख्यमंत्री खट्टर और उनके अधिकांश मंत्री अनुभव के मामले में पीछे थे। रामबिलाश शर्मा को छोड़कर पहले कोई मंत्री नहीं रहा। किस मंत्री को कौन सा कार्यभार देना है, इसे लेकर काफी खटपट होती रही। खुद सीएम खट्टर को प्रशासनिक अनुभव नहीं था। नतीजा, रामपाल का बरवाला कांड, आरक्षण के दंगे और राम रहिम समर्थकों का हुड़दंग, इन तीन घटनाओं ने प्रदेश को हिलाकर रख दिया। विपक्ष ने इसे खट्टर सरकार की असफलता करार दिया। उन्हें नौसिखिया कहा गया। अब खट्टर सरकार को निर्दलीयों की बैसाखी का सहारा लेकर आगे बढ़ना है। इस बार उनके मंत्रिमंडल में ज्यादातर नए चेहरे होंगे।
दो को छोड़ सभी मंत्री हारे चुनाव
वजह, केवल दो मंत्रियों को छोड़कर बाकी सभी मंत्री चुनाव हार चुके हैं। शिक्षा, वित्त, कृषि और परिवहन मंत्रालय जिन नेताओं के पास था, वे सभी परास्त हो गए हैं। प्रदेश की राजनीति को करीब से जानने वाले शोधार्थी रविंद्र कुमार सैनी कहते हैं कि खट्टर सरकार के लिए निर्दलीयों को साथ लेकर चलना आसान नहीं होगा। इनमें कई निर्दलीय तो ऐसे हैं, जिन्हें शासन-प्रशासन का अच्छा खासा ज्ञान है। गोपाल कांडा, रणजीत सिंह चौटाला, सोमबीर और धर्मपाल प्रदेश की राजनीति को ठीक तरह से समझ लेते हैं। कांडा का प्रयास रहेगा कि उन्हें 2009 की तरह खट्टर सरकार में भी गृह मंत्रालय मिल जाए। हालांकि उन पर केस होने के कारण गृह मंत्रालय मिलना मुश्किल है।
खुद के एजेंडे पर चलना मुश्किल
बता दें कि 2009 में जब कांग्रेस पार्टी को 40 सीटें मिली थी तो कांडा और दूसरे निर्दलीयों की मदद से ही सरकार बनाई गई थी। इसमें कोई शक नहीं है कि इस बार खट्टर सरकार के लिए खुद के एजेंडे पर चलना बहुत मुश्किल होगा। खट्टर सरकार को अपना मिजाज बदलना पड़ेगा। फैसले लेने में लचक लानी होगी। यह बात भी सही है कि निर्दलीयों की बदौलत अगर सरकार चलती है तो हो सकता है कि प्रदेश में खर्ची और पर्ची का दौर दोबारा शुरु हो जाए।