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Haryana: आंधी के फेर में फंसी रही कांग्रेस तो इस रामबाण के सहारे थी BJP; हुड्डा vs भाजपा की वजह से पलटी बाजी

Jitendra Bhardwaj जितेंद्र भारद्वाज
Updated Tue, 08 Oct 2024 07:33 PM IST
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सार
अब चुनावी नतीजों में भाजपा की गैर-जाट सोशल इंजीनियरिंग का फॉर्मूला कारगर होता हुआ दिख रहा है। सोशल इंजीनियरिंग के इसी फार्मूले पर भाजपा ने 2014 और 2019 का चुनाव जीता था।  
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Haryana: Congress was caught in there own plan BJP relied on panacea bhupinder singh hooda vs BJP turned table
हरियाणा चुनाव - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

हरियाणा विधानसभा चुनाव के नतीजों ने भाजपा के लिए हैट्रिक लगाने का प्लेटफॉर्म तैयार कर दिया है। कांग्रेस पार्टी ने इन नतीजों को सही नहीं बताया है। पार्टी नेताओं ने इसे लोकतंत्र नहीं, बल्कि तंत्र की जीत करार दिया है। राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, अब तो एग्जिट पोल पर भी सवाल उठने लगे हैं। 



पूरे चुनाव प्रचार को देखें तो दो ही बातें समझ आती हैं। पहला, अपनी जीत को लेकर कांग्रेस पार्टी 'आंधी-तूफान' के चक्कर में फंस गई। खुद राहुल गांधी ने अपनी जनसभा में कह दिया कि प्रदेश में तो कांग्रेस की आंधी चल रही है। कांग्रेस पार्टी, प्रचंड जीत हासिल करने जा रही है। लिहाजा ऊपरी तौर पर ये बात कुछ गलत भी नहीं थी। कांग्रेस पार्टी की जनसभाओं में भीड़ तो जुट रही थी। वोटरों के बीच भूपेंद्र सिंह हुड्डा और उनके पुत्र दीपेंद्र हुड्डा घूम रहे था। अगर प्रदेश स्तर के नेताओं की बात करें तो मीडिया भी इन्हें ही तव्वजो दे रहा था। हर जगह इन्हीं दोनों का जलवा था। 


दूसरी तरफ भाजपा, जिसे लेकर यह प्रचार किया गया कि उसके नेताओं का विरोध हो रहा है। कई गांवों में किसानों ने उन्हें घुसने नहीं दिया। इन सबके बीच भाजपा अपने एक ही 'रामबाण' पर चलती रही। पार्टी ने गैर जाट वोटरों पर फोकस रखा। प्रदेश की आबादी में करीब 75 फीसदी हिस्सेदारी वाला यह वर्ग, तकरीबन साइलेंट रहा। भाजपा ने चुनाव को 'हुड्डा बनाम बीजेपी' बना दिया। भाजपा नेताओं ने कहा, अगर कांग्रेस आती है तो हुड्डा ही सीएम होंगे। किसी दूसरे व्यक्ति का नंबर नहीं आएगा। इस प्रचार का असर मंगलवार को वोटों की गिनती में देखने को मिला। 

प्रदेश की राजनीति को करीब से समझने वाले वरिष्ठ पत्रकार रविंद्र कुमार आगे कहते हैं, ये चुनाव पूरी तरह से जातिवाद पर चला गया था। कांग्रेस को उम्मीद थी कि उसे जाट एवं दलित वोटरों का पूर्ण समर्थन मिलेगा। इस भरोसे के पीछे खास वजह लोकसभा चुनाव था। प्रदेश की दस लोकसभा सीटों में से कांग्रेस ने पांच सीटें जीती थी। कांग्रेस पार्टी को जाट समुदाय, जिसकी आबादी करीब 25 फीसदी है और दलित समुदाय, जिसकी संख्या लगभग 20 प्रतिशत है, का समर्थन मिला था। कांग्रेस पार्टी को भरोसा था कि उसे विधानसभा चुनाव में इन वर्गों का समर्थन मिलेगा। अब वोटों की गिनती में ऐसा कुछ दिखाई नहीं पड़ा। 

बतौर रविंद्र कुमार, भाजपा ने लोकसभा चुनाव के बाद अपनी रणनीति बदली। बीजेपी नेताओं को मालूम था कि उसे जाटों के वोट नहीं मिलेंगे। किसान, पहलवान और जवान, कांग्रेस ने इस समीकरण को वोटों में बदलने का भरसक प्रयास किया। मीडिया में इस प्रयास को खूब कामयाबी भी मिलती हुई दिखाई दी। दूसरी तरफ भाजपा ने गैर जाट वोटों पर फोकस किया। हालांकि भाजपा प्रवक्ता केके शर्मा बताते हैं, देखिये प्रदेश में हमें सभी जातियों का समर्थन मिला। जाटों के वोट भी मिले हैं तो दलितों ने भी भाजपा में विश्वास जताया है।  

राजनीतिक जानकार बताते हैं, इस चुनाव को लेकर जो एग्जिट पोल आया था, वह ओपेनियन पोल था। इसे मीडिया भी ठीक तरह से प्रस्तुत नहीं कर सका। कांग्रेस, अपनी जीत के प्रति आश्वस्त थी। प्रदेश में 2005 से लेकर अभी तक जाटों ने कांग्रेस पार्टी का पूरा साथ दिया है। कांग्रेस ने भी इस वर्ग को प्रमुखता के साथ अपने से जोड़े रखा। नतीजा, दूसरे कई वर्ग, पार्टी से दूर होते चले गए। कांग्रेस पार्टी ने इस बार जाट समुदाय के 35 लोगों को टिकट दिया था। ओबीसी के 20, 17 दलित, 4 ब्राह्मण, 5 मुस्लिम, 6 पंजाबी और वैश्य समुदाय के दो लोगों को टिकट दिया। पार्टी ने राजपूत समुदाय से एक प्रत्याशी चुनाव में उतारा था। भाजपा ने जाट समुदाय के 16 लोगों को टिकट दिया। ओबीसी के 24 व 11 ब्राह्मण उम्मीदवारों पर भरोसा जताया। दो मुस्लिम व पंजाबी समुदाय के दस प्रत्याशी मैदान में उतारे थे। वैश्य समुदाय के 6 और राजपूत समुदाय के तीन लोगों को टिकट दिया था। अब चुनावी नतीजों में भाजपा की गैर-जाट सोशल इंजीनियरिंग का फॉर्मूला कारगर होता हुआ दिख रहा है। सोशल इंजीनियरिंग के इसी फार्मूले पर भाजपा ने 2014 और 2019 का चुनाव जीता था।  

राजनीतिक जानकार ओम प्रकाश तंवर बताते हैं, भाजपा ने जाटों सहित सभी जातियों को टिकट दिया था। कांग्रेस ने जाट समुदाय पर ज्यादा फोकस किया। भाजपा ने चुनाव में कुमारी शैलजा और दलित का मुद्दा खूब भुनाया।  इससे जाट बनाम गैर-जाट का नैरेटिव और ज्यादा सेट हो गया। पूर्व सीएम ने कुछ सोच विचार कर ही शैलजा को लेकर यह बयान दिया था कि राजनीति में कुछ भी संभव है। उनसे पूछा गया था कि क्या शैलजा, भाजपा ज्वाइन कर सकती हैं। वोटिंग से एक सप्ताह पहले भाजपा ने प्रदेश में यह नेरेटिव सैट कर दिया कि ये चुनाव हुड्डा बनाम भाजपा का है। कांग्रेस का मतलब हुड्डा है। अगर कांग्रेस आती है तो हुड्डा ही सीएम बनेंगे। यह बात गैर जाटों को एक दूसरा ही संदेश दे गई। कांग्रेस पार्टी ने जाटों को टिकट भी खूब बांटे थे। भाजपा ने अहीरवाल में यह संदेश दे दिया कि जब पंजाबी और सैनी समुदाय से सीएम बन सकता है तो आने वाले समय में यादव बिरादरी से भी किसी नेता को मुख्यमंत्री बनाया जा सकता है। अगर कांग्रेस सत्ता में आती है तो केवल हुड्डा या उनका बेटा ही सीएम बनेगा। 

भाजपा ने दलितों को भी आपस में बांटने का प्रयास किया। चमार और गैर चमार का मुद्दे को आगे बढ़ा दिया। इनके आरक्षण को वर्गीकृत करने की बात कही। हरियाणा में एससी 'ए कैटेगरी' में आते हैं। इस समुदाय में चमार ज्यादा हैं। भाजपा ने वादा किया है कि हम इसमें वर्गीकरण कर देंगे। 
इससे गैर चमार जाति के वोट भी प्रमुखता से भाजपा को मिल गए। इसके अलावा शैलजा के मामले को लेकर चमार नाराज हो गए। इन दोनों बातों का फायदा भाजपा को मिल गया। ओबीसी में शामिल यादव भी भाजपा के साथ आ गए। सैनी और गुर्जर भी मिल गए। पंजाबी, ब्राह्मण, ठाकुर व बनियां समुदाय का समर्थन पहले से ही भाजपा के साथ रह है। प्रदेश में किसान, जवान और पहलवान का मुद्दा, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया में छाया रहा, लेकिन यहां पर भी एक तर्क दिया गया। 

राजनीतिक जानकार के मुताबिक, ये मुद्दे भी एक जाति विशेष के आसपास घूमते हुए दिखाई पड़े। भाजपा ने इन्हें एक जाति से ही जोड़ दिया। चुनाव प्रचार में कांग्रेस ने इन्हें जबरदस्त तरीके से आगे बढ़ाया। कांग्रेस को उम्मीद थी कि वोटिंग के दौरान ये मुद्दे दूसरे समुदायों के साथ रंग दिखाएंगे। इन मुद्दों ने रंग तो दिखाया, मगर ये एक ही जाति से बंधकर रह गए। इनके आंदोलन या प्रदर्शन को दूसरे समुदायों का समर्थन नहीं मिल सका। भाजपा ने इस बात को बखूबी समझा। चुनाव के लिए एक विशेष जाति समीकरण तैयार कर दिया गया। कांग्रेस इस बात को नहीं समझ सकी। उसने दूसरी जातियों को अपनी तरफ आकर्षित करने का ज्यादा प्रयास नहीं किया। इतना ही नहीं, चुनावी रैलियों में लोगों का जोश देखकर कांग्रेस को यह भ्रम हो गया कि प्रदेश की छत्तीस बिरादरी हमारे साथ है। तंवर के अनुसार, कांग्रेस ने यह समझने का प्रयास नहीं किया कि उनकी रैलियों में जो भीड़ आ रही है, कहीं वो एक या दो समुदायों की तो नहीं है।

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