हरियाणा के लाल: मिट्टी में 'टफ' बचपन, 'दूध दही का खाना' और मेले के दंगल, पढ़िये 'गांव' से 'ओलंपिक' फतेह तक की कहानी
हरियाणा की माटी में तपकर कुंदन बनने वाले नीरज चोपड़ा ने सोना पाकर देश को स्वर्णिम आभा से चमका दिया है।
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हरियाणा के खिलाड़ियों ने ओलंपिक में अपना दम दिखाकर देश का नाम रोशन किया है। बात केवल टोक्यो ओलंपिक की नहीं है, इससे पहले भी कई ओलंपिक में हरियाणा के खिलाड़ियों का दबदबा रहा है। देश की कुल जनसंख्या के हिसाब से भले ही हरियाणा का हिस्सा दो ढाई प्रतिशत हो, लेकिन खेलों में कई राज्यों पर अकेला हरियाणा भारी पड़ता है। हरियाणा के 'लाल', मिट्टी में खेल कर बचपन 'टफ' बनाते हैं। दूध, दही, घी का खाना है। आधा व्यायाम खेतों में तो बाकी का स्टेडियम में पूरा हो जाता है।
मेले के दंगल होते हैं पहली परीक्षा, प्रोत्साहन भी कम नहीं
विभिन्न उत्सवों पर गांव देहात में लगने वाले मेले के दौरान जो दंगल आयोजित होते हैं, वहां इनकी पहली परीक्षा होती है। यूं कहें कि प्रदेश में खेलों का कुछ भौगोलिक और प्राकृतिक सा माहौल है। ध्यानचंद अवॉर्ड एवं भीम अवॉर्ड जैसे प्रतिष्ठित खेल पुरस्कारों से सम्मानित पूर्व अंतरराष्ट्रीय वालीबॉल खिलाड़ी ओमप्रकाश सिंह ने कहा, हरियाणा में खेलों की मुख्य धारा में पहुंचने के बाद खिलाड़ी और कोच, दोनों का सम्मान होता है। मेडल वाले खिलाड़ी को 6 करोड़, 4 करोड़ व ढाई करोड़ रुपये नकद मिलते हैं। ए क्लास की सरकारी नौकरी, प्लॉट और अन्य दूसरी सुविधाओं की बरसात होती है। यही बातें हैं जो हमारे खिलाड़ियों को गांव से ओलंपिक तक ले जाती हैं।
जीवन का हिस्सा हैं खेल
हरियाणा में दूसरे राज्यों के मुकाबले आज भी नॉनवेज का चलन ज्यादा नहीं है। खासतौर से, ग्रामीण इलाकों में तो नॉनवेज बहुत कम लोग खाते हैं। बचपन से मिट्टी में खेलना है, खेत पर जाना है और पशुओं को जोहड़ में भी ले जाना है। ये सब उनके खेल जीवन का हिस्सा है। ओमप्रकाश सिंह कहते हैं, दूध दही का खाना, शरीर के विकास के लिए अच्छा है। प्रदेश में आज भी उत्सवों पर दंगल होता है। कहीं गूगा का मेला तो कहीं सती का। अगर कोई उत्सव नहीं है, तो भी ईनामी दंगल आयोजित होते रहते हैं। पहले के उत्सवों में तीन खेल, जैसे कुश्ती, मुगदर उठाना और लंबी कूद, ये इवेंट तो सामान्य रहे हैं। इससे खेल हमारी संस्कृति का हिस्सा बनते चले गए। खिलाड़ियों को साल भर यह इंतजार रहता था कि कब वह उत्सव आएगा और दंगल होगा। जब से खेलों में धन की बरसात शुरू हुई है, खिलाड़ियों का ध्यान शिक्षा से कुछ हट गया है। अब वे खेल पर ही ध्यान देते हैं।
पूर्व सरकारों ने भी उठाए थे कई कदम
हरियाणा में राजनेताओं ने भी खेलों को बढ़ावा देने में मदद की है। हरियाणा की बहू कर्णम मल्लेश्वरी को मेडल जीतने पर तत्कालीन चौटाला सरकार ने 25 लाख रुपये दिए थे। उसके बाद मुख्यमंत्री चौटाला ने खेलों को बढ़ावा देने के लिए कुछ ऐसे विभाग, जो लाभ में चल रहे थे, जैसे मार्केटिंग बोर्ड को कुश्ती और एथलेटिक्स दे दिया गया। हैफेड को बैडमिन्टन, हुडा को महिला हॉकी और एचएसआईआईडीसी को वालीबॉल की जिम्मेदारी दी गई। मकसद था कि इन खेलों में कम से कम 200 अच्छे खिलाड़ी तैयार करने हैं। हरियाणा ओलंपिक एसोसिएशन ने राज्य खेल आयोजित किए थे। हालांकि वह आयोजन एक ही बार हो सका। सरकार बदल गई तो बहुत से कायदे भी बदल गए।
चौटाला सरकार ने ही सबसे पहले ओलंपिक में मेडल लाने वाले को एक करोड़ रुपये देने की घोषणा की थी। इससे धीरे धीरे एशियन और दूसरी प्रतिस्पर्धाओं में मेडल आने लगे। इसके बाद 2004 में हुड्डा सरकार आई। उसमें कोचों को भी 10 से 20 लाख रुपये दिए गए। खिलाड़ियों को डीएसपी भर्ती किया गया।
खट्टर सरकार ने खोला खजाना
अब मुख्यमंत्री खट्टर ने ओलंपिक में गोल्ड मेडल लाने वाले को 6 करोड़ रुपये देने की घोषणा कर दी है। अच्छी बात ये है कि उन्होंने नेशनल अवार्डी खिलाड़ियों या कोचों को 5000 से 20000 रुपये का मानदेय प्रतिमाह देना शुरू कर दिया। भीम अवॉर्डी को पहले कोई मानदेय नहीं मिलता था, अब उसे भी पांच हजार रुपये प्रतिमाह मिलेंगे। नेशनल अवॉर्डी को 20 हजार रुपये दिए जाते हैं। जैसे ही ओलंपिक में मेडल आता है तो इनामों की बौछार होने लगती है। बतौर ओमप्रकाश, खेलों को लेकर भले ही 'राजनीतिक दंगल' की बात कही जाती है, लेकिन इससे खिलाड़ी और खेल का ज्यादा नुकसान नहीं है। राजनेता जमकर घोषणाएं करते हैं तो खिलाड़ियों का भला ही होता है, वोट का चक्कर अपनी जगह रहता है। कई कोच भी जुनूनी रहे हैं। जैसे सेना से रिटायर्ड हवा सिंह, जो कि द्रोणाचार्य और अर्जुन अवॉर्डी हैं, ने भिवानी के साई सेंटर को ही बॉक्सिंग का केंद्र बना दिया। खेलों के विकास में मेहताब सिंह का नाम भी सम्मान से लिया जाता है।
127 सदस्यीय भारतीय दल में 31 हरियाणा के
टोक्यो ओलंपिक में गए भारत के 127 खिलाड़ियों के दल में से हरियाणा के 31 हैं। पंजाब से 19 खिलाड़ी गए थे। महिलाओं की हॉकी टीम में 9 खिलाड़ी हरियाणा की हैं। कुश्ती के सात, शूटिंग 4 और बॉक्सिंग में चार खिलाड़ी टोक्यो गए थे। देश का एकमात्र गोल्ड मेडल हरियाणा के नीरज चोपड़ा ने जीता है। भारत की जनसंख्या में हरियाणा और पंजाब का हिस्सा 4.4 प्रतिशत है, जबकि ओलंपिक में 40 प्रतिशत खिलाड़ी इन्हीं दोनों प्रदेशों से पहुंचते हैं। यूपी की जनसंख्या 17 प्रतिशत है, लेकिन वहां से 8 खिलाड़ी टोक्यो गए हैं।
हरियाणा का खेल बजट 400 करोड़ रुपये
हरियाणा का खेल बजट यूपी से 37 प्रतिशत ज्यादा है। यूपी की जीडीपी 20 लाख करोड़ रुपये है तो हरियाणा की 9 लाख करोड़ रुपये है। राजस्थान का खेल बजट 100 करोड़ है तो हरियाणा का 400 करोड़ रुपये है। हरियाणा में स्वर्ण पदक विजेता को 6 करोड़ और खेल की तैयारी के लिए 15 लाख रुपये मिलते हैं। हरियाणा में मेडल जीतने वाले खिलाड़ी के कोच को भी 20 लाख रुपये देते हैं। हरियाणा में साईं के 22 ट्रेनिंग सेंटर हैं। मुख्यमंत्री मनोहर लाल ने कहा कि पहली बार सरकार ने चौथे स्थान पर रहने वाले प्रत्येक एथलीट और दूसरे खिलाड़ियों को भी 50-50 लाख रुपये दिए जाएंगे।
2008 में विजेंद्र सिंह ने जीता था पदक
2008 के ओलंपिक में भारत ने तीन पदक जीते थे। इनमें से एक पदक हरियाणा के विजेंद्र सिंह ने जीता था। 2012 के ओलंपिक में छह पदकों में से तीन पदक हरियाणा के खिलाड़ियों ने अपने नाम किए थे। 2016 में दो पदकों में से एक पदक हरियाणा की साक्षी मलिक ने जीता था। ध्यानचंद अवॉर्ड एवं भीम अवॉर्ड से सम्मानित पूर्व अंतरराष्ट्रीय वालीबॉल खिलाड़ी ओमप्रकाश सिंह ने कहा, हरियाणा में नेचुरल टेलेंट है, बस उसे एक आकार देना पड़ता है। गांव देहात में टेलेंट भरा पड़ा है।