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गुजरात विधानसभा चुनाव में टर्निंग पॉइंट ला सकते हैं ये सात चेहरे

Thu, 02 Nov 2017 02:43 PM IST
Updated Thu, 02 Nov 2017 02:43 PM IST
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hardik patel jignesh mevani alpesh thakore are key faces of gujarat election can change the game
पीएम मोदी - फोटो : SELF
नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद गुजरात में पहली बार विधानसभा चुनाव होने जा रहा है। चूंकि यह प्रधानमंत्री का गृहराज्य है और पिछले 20 वर्षों से अधिक समय से यहां भाजपा का वर्चस्व है। इसलिए ये चुनाव पार्टी की नाक का सवाल बना हुआ है। 
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राज्य की 182 विधानसभा सीटों के लिए 9 और 14 दिसंबर को चुनाव होने हैं। चुनाव के मद्देनजर बीजेपी और कांग्रेस के दिग्गज नेता सत्ता हासिल करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं, वहीं अभी-अभी उभरे नेता जाति और वोट बैंक के नाम पर अपनी राजनीति चमका रहे हैं। ये चुनाव कई मायनों में खास होने वाला है।
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पहली बार राज्य के 182 विधानसभा सीटों पर बूथ मैनेजमेंट का काम महिलाओं के हाथों में होगा। यानी हर सीट पर देखरेख के लिए महिला प्रतिनिधि मौजूद रहेंगी। इस चुनाव में करीब 50,128 पोलिंग बूथ पर मतदान होंगे और राज्य के करीब 4.3 करोड़ मतदाता नेताओं की तकदीर पर अपनी सहमति की मुहर लगाएंगे। 
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चुनावी गहमागहमी के बीच सबसे रोचक बात ये है कि इस बार के विधानसभा में चुनाव वोट देने वाली 65 फीसदी जनसंख्या की उम्र 35 वर्ष से कम है। ये भी कहा जा सकता है कि इस चुनाव में युवा अहम किरदार निभा सकते हैं। इस चुनाव के सबसे चर्चित चेहरों देश के प्रधानमंत्री सहित पटेल आंदोलन से चमके हार्दिक पटेल, जिग्नेश मेवाणी सहित कई युवा और बूढ़े होते युवाओं के नाम शामिल है।

गुजरात के सबसे अधिक समय तक मुख्यमंत्री रहे हैं प्रधानमंत्री

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modi
नरेंद्र मोदी
नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बनने से पहले गुजरात के सबसे अधिक समय तक मुख्यमंत्री रहे हैं। साल 1995 में पहली बार केशुभाई पटेल के नेतृत्व में गुजरात में बीजेपी ने सत्ता का स्वाद चखा था। 1998 में एक बार पार्टी ने फिर वापसी की और आज तक सत्ता में कायम हैं। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रचारक बन 30 साल पहले गुजरात आने वाले मोदी ने 2001 में मुख्यमंत्री का पद संभाला और फिर सबसे ईमानदार नेता की छवि के साथ साथ हिंदुत्व और विकास का नारा देकर राज्य में अपना दबदबा बनाया। उसी गुजरात विकास मॉडल के साथ 2014 के चुनाव में पीएम उम्मीदवार के रूप में उभरे थे। विधानसभा चुनावों में जिस तरह से मोदी रैलियां कर रहे हैं वो बताता है कि गुजरात मोदी का है और मोदी गुजरात के हैं।

अमित शाह
अमित शाह को राजनीति की गहरी समझ है शायद यही वजह है कि उन्होंने पार्टी के लिए चुनाव लड़ने की बजाय बीजेपी को चुनाव जिताने का बीड़ा उठाया है। 1980 में अमित शाह ने लाल कृष्ण आडवाणी का चुनाव प्रचार संभाला था। फिर उन्होंने पार्टी को मजबूत बनाने का बीड़ा उठाया और 2014 में यूपी में क्षेत्रीय पार्टी सहित कांग्रेस का सफाया कर यह बता दिया कि वो कितने बड़े नीति निर्माता हैं। 2014 में यूपी चुनाव जीतने के बाद वो भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाए गए।
 

पढ़ें: गुजरात में गरजे राहुल, बोले- बीजेपी को चुनाव के दिन लगेगा करंट, GST ने देश को किया बर्बाद


भारत सिंह सोलंकी-
भारत सिंह सोलंकी 2005 और 2008 के बीच गुजरात कांग्रेस के अध्यक्ष थे। लेकिन उनका ये सफर बहुत अच्छा नहीं रहा। 2015 में उन्हें दूसरी बार पार्टी अध्यक्ष बनाया गया और फिर उन्होंने कमाल ही कर दिया। उनकी देखरेख में पार्टी ने निकाय चुनावों में 20 से अधिक साल के चले आ रहे सूखे को खत्म कर बढ़त हांसिल की। फिर सोलंकी ने अपना दबदबा राज्य सभा चुनाव के दौरान दिखाया जब कांग्रेस के कई नेता टूट की कगार पर खड़े थे तब सोलंकी ने 43 विधायकों को जोड़कर रखा। नाक की लड़ाई बन चुके इस चुनाव में सोलंकी तब और मजबूत हो गए जब उन्होंने विधानसभा चुनाव की तारीख घोषित होने से पहले ओबीसी नेता अल्पेश ठाकोर को अपनी पार्टी से जोड़ने में सफल रहे और जल्द ही हार्दिक को भी पार्टी में इंट्रोड्यूस कर सकते हैं।
 

अब बात उन युवा नेताओं की जो जोड़तोड़ कर चढ़ेंगे राजनीति की सीढ़ी

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हार्दिक पटेल - फोटो : self

जिग्नेश मेवाणी-
राष्ट्रीय दलित अधिकार मंच के संस्थापक हैं। युवा मेवाणी पत्रकारिता में भी हाथ आजमा चुके हैं और वकालत भी उन्होंने कर रखी है। 36 वर्षीय मेवाणी जुलाई 2016 में तब चर्चा में आए जब ऊना में 6 दलितों को गौ रक्षकों ने अपना शिकार बनाया था। मेवाणी ने उनदिनों दस दिनों का अहमदाबाद से ऊना पैदल मार्च किया और राष्ट्रीय मीडिया में छाने के बाद वो दलितों की आवाज बने और उनके बड़े नेता के रूप में उभरे।
 
हार्दिक पटेल
हार्दिक पाटीदार अनामत आंदोलन समिति के अध्यक्ष हैं और ये भी आरक्षण की मांग के साथ 2015 में सड़कों पर उतरे और पाटीदार समुदाय और खासकर पाटीदार युवाओं की आवाज बने।
पाटीदार के लिए सरकारी नौकरियों और कॉलेजों में आरक्षण इनकी बड़ी मांगे हैं। 24 साल के इस पाटीदार छोड़े ने महज दो महीनों में वो कर दिखाया जो कांग्रेस गुजरात में दशकों से नहीं कर पाई। फिर क्या था रातों-रात हार्दिक नेता बनें और वो कभी आप पार्टी से तो कभी कांग्रेस से जोड़ तोड़ कर रहे हैं। ऐसा माना जा रहा है कि पाटीदार समुदाय में उनका दबदबा है। यही वजह है कि नरेंद्र मोदी के दिल्ली पहुंचने के बाद महज दो साल के अंदर पार्टी को अपना मुख्यमंत्री तक बदलना पड़ा। अपने छोटे से राजनीतिक करियर में हार्दिक की छवि एक बड़े नेता की बन चुकी है इसीलिए वो 9 महीने जेल की हवा खा चुके हैं वहीं उनपर राजद्रोह का मामला भी चल रहा है। कांग्रेस भी इस छोटा पैकेट लेकिन बड़ा धमाल के साथ पाटीदार समुदाय को अपने साथ करने की जुगत में जुटी है।
 
अल्पेश ठाकोर
पिछले दस वर्षों में अल्पेश धीरे-धीरे राजनीति की सीढियां चढ़ रहे हैं। ठाकोर ओबीसी समुदाय से आते हैं और पिछले दिनों उन्होंने कांग्रेस का दामन थामा है और राजनीतिक जानकार इसे अल्पेश की घर वापसी भी कह रहे हैं। अल्पेश ने 2010 में राजनीतिक करियर की शुरुआत गी और 2012 के जिला पंचायत चुनाव न जीत पाने के बाद राजनीति से कुछ दिनों तक किनारा कर लिया था लेकिन पिछले पांच सालों में उन्होंने तेजी से बढ़त बनाई है। उन्होंने राज्य के ओबीसी समुदाय के 146 जातियों को एकजुट करने का बीड़ा उठाया और अवैध शराब के खिलाफ मुहिम छेड़ी और फिर उन्हें समर्थन मिलना शुरु हो गया। राज्य में नशा मुक्ति अभियान चलाने के लिए उन्होंने गुजरात क्षत्रिय ठाकोर सेना बनाई, आज इस सेना में करीब 6.5 लाख लोग रजिस्टर्ड हैं। वहीं ठाकोर ने ओबीसी, एससी,एसटी समुदाय को जोड़ कर एक एकता मंच भी बनाया है।
राजनीति में जातिगत वोट और राजनीति के मद्देनजर इस बात को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है कि राज्य में 22 से 24 फीसदी ठाकोर समुदाय के लोग हैं।
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