{"_id":"699d941d7ccb8d63310d364b","slug":"haldwani-eviction-sc-says-land-belongs-to-railway-encroachers-cannot-dictate-terms-2026-02-24","type":"story","status":"publish","title_hn":"हल्द्वानी अतिक्रमण विवाद: सुप्रीम कोर्ट ने कहा- जमीन रेलवे की है, अतिक्रमणकारी शर्तें तय नहीं कर सकते","category":{"title":"India News","title_hn":"देश","slug":"india-news"}}
हल्द्वानी अतिक्रमण विवाद: सुप्रीम कोर्ट ने कहा- जमीन रेलवे की है, अतिक्रमणकारी शर्तें तय नहीं कर सकते
Tue, 24 Feb 2026 05:35 PM IST
निर्मल कांत
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
Published by: निर्मल कांत
Updated Tue, 24 Feb 2026 05:35 PM IST
सार
सुप्रीम कोर्ट ने हल्द्वानी में कथित तौर पर रेलवे की जमीन पर बसे परिवारों को प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत पुनर्वास का मौका देने के लिए 15 मार्च के बाद शिविर लगाने का निर्देश दिया है और 31 मार्च तक पात्रता तय कर रिपोर्ट देने को कहा है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अतिक्रमण करने वालों को उसी जगह रहने का अधिकार नहीं है। पढ़ें रिपोर्ट-
विज्ञापन
सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : ANI
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को उत्तराखंड विधिक सेवा प्राधिकरण को निर्देश दिया कि वह एक शिविर लगाए, ताकि रेलवे परियोजना के लिए आवश्यक सरकारी जमीन पर रह रहे और बेदखली का सामना कर रहे परिवार प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत पुनर्वास के लिए आवेदन कर सकें।
याचिकाकर्ताओं के आग्रह पर कोर्ट ने कहा कि यह शिविर 15 मार्च के बाद लगाया जाए, क्योंकि उन्होंने इसे रमजान के महीने के बाद आयोजित करने की मांग की थी। शीर्ष कोर्ट ने नैनीताल के जिला कलेक्टर और अन्य राजस्व अधिकारियों को आवश्यक सहायता देने का निर्देश दिया। यह पूरी प्रक्रिया 31 मार्च से पहले पूरी की जानी है। शीर्ष कोर्ट ने यह भी कहा कि जिला कलेक्टर हर परिवार की योजना के तहत पात्रता तय करें और अपनी रिपोर्ट कोर्ट में पेश करें।
चीफ जस्टिस (सीजेआई) सूर्य कांत और जॉयमाल्या बागची की बेंच दिसंबर 2022 में उत्तराखंड हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें हल्द्वानी में सार्वजनिक जमीन पर कथित रूप से कब्जा करने वाले करीब 50 हजार लोगों को हटाने का निर्देश दिया गया था। जनवरी 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी थी और इस अंतरिम आदेश को समय-समय पर बढ़ाया जाता रहा है। जुलाई और सितंबर 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार, केंद्र सरकार और रेलवे को निर्देश दिया था कि वे सार्वजनिक जमीन से बेदखल किए गए लोगों के लिए पुनर्वास योजना तैयार करें।
विज्ञापन
कोर्ट ने क्या कहा?
रेलवे का कहना है कि ट्रैक विस्तार और अन्य प्रोजेक्ट्स के लिए इस जमीन की सख्त जरूरत है, खासकर नदी के कारण मौजूदा ट्रैक में दिक्कत आ रही है। यह इलाका रेलवे विस्तार के लिए उत्तराखंड में आखिरी संभावित जगह है, उसके बाद पहाड़ी क्षेत्र शुरू हो जाता है।
ये भी पढ़ें: NOTA से क्या बेहतर हुए जनप्रतिनिधि?: सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी, महिलाओं की भागीदारी की सराहना
याचिकाकर्ताओं की दलील
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने दलील दी कि यहां 50 हजार लोग दशकों से रह रहे हैं, कई पट्टे वाली जमीन पर बसे हैं और रेलवे ने पहले कभी मांग नहीं की। उन्होंने एक मैप पेश किया, जिसमें पास की खाली जमीन का इस्तेमाल सुझाया गया। भूषण ने कहा कि एक साथ इतने परिवारों को प्रधानमंत्री आवास योजना (पीएमएवाई) के तहत घर देना संभव नहीं और दिल्ली की झुग्गी नीति में भी निर्धारित तारीख होती है।
सरकार ने रखा अपना पक्ष
केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने कहा कि पात्र परिवारों को विस्थापन के बाद छह महीने तक प्रति माह 2,000 रुपए का भत्ता दिया जाएगा। रेलवे और राज्य सरकार ने सामूहिक रूप से प्रभावित परिवारों की पहचान करने और पुनर्वास की व्यवस्था का आश्वासन दिया। मामले की अगली सुनवाई अप्रैल 2026 में होगी। तब तक रेलवे जमीन से अतिक्रमण हटाने की कोई कार्रवाई नहीं होगी। केंद्र ने बताया कि 13 जमीनों पर फ्रीहोल्ड है, और हर्जाना राज्य व रेलवे दोनों देंगे।
विज्ञापन
याचिकाकर्ताओं के आग्रह पर कोर्ट ने कहा कि यह शिविर 15 मार्च के बाद लगाया जाए, क्योंकि उन्होंने इसे रमजान के महीने के बाद आयोजित करने की मांग की थी। शीर्ष कोर्ट ने नैनीताल के जिला कलेक्टर और अन्य राजस्व अधिकारियों को आवश्यक सहायता देने का निर्देश दिया। यह पूरी प्रक्रिया 31 मार्च से पहले पूरी की जानी है। शीर्ष कोर्ट ने यह भी कहा कि जिला कलेक्टर हर परिवार की योजना के तहत पात्रता तय करें और अपनी रिपोर्ट कोर्ट में पेश करें।
विज्ञापन
चीफ जस्टिस (सीजेआई) सूर्य कांत और जॉयमाल्या बागची की बेंच दिसंबर 2022 में उत्तराखंड हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें हल्द्वानी में सार्वजनिक जमीन पर कथित रूप से कब्जा करने वाले करीब 50 हजार लोगों को हटाने का निर्देश दिया गया था। जनवरी 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी थी और इस अंतरिम आदेश को समय-समय पर बढ़ाया जाता रहा है। जुलाई और सितंबर 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार, केंद्र सरकार और रेलवे को निर्देश दिया था कि वे सार्वजनिक जमीन से बेदखल किए गए लोगों के लिए पुनर्वास योजना तैयार करें।
विज्ञापन
कोर्ट ने क्या कहा?
- सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अतिक्रमण करने वालों को यह हक नहीं है कि वे उसी जगह पर रहने की मांग करें या रेलवे की जमीन के इस्तेमाल का फैसला करें।
- यह मामला लंबे समय से चल रहा है। रेलवे की लगभग 30 हेक्टेयर जमीन पर बनभूलपुरा, गफूर बस्ती और अन्य इलाकों में हजारों अवैध निर्माण बने हुए हैं, जहां अनुमानित 5,000 से अधिक परिवार (करीब 50,000 लोग) रहते हैं।
- कोर्ट ने निर्देश दिए कि प्रभावित परिवारों की सूची तैयार की जाए, खासकर ईडब्ल्यूएस (आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग) के लोगों को पीएमएवाई के तहत आवास के लिए अप्लाई करने में मदद मिले।
- कोर्ट ने आदेश दिया कि नैनीताल जिले का राजस्व प्राधिकरण, केंद्र और राज्य सरकार मिलकर एक सप्ताह का शिविर लगाएं, जहां पीएमएवाई के फॉर्म भरे जा सकें। यह कैंप 19 मार्च से शुरू हो।
- आदेश में कहा गया कि बनभूलपुरा में पुनर्वास केंद्र बनाया जाए, जहां हर परिवार का मुखिया जाकर फॉर्म भर सके।
- नैनीताल के जिलाधिकारी और एसडीएम हल्द्वानी को लॉजिस्टिक्स सपोर्ट देने के निर्देश दिए गए।
- कोर्ट ने कहा कि सामाजिक कार्यकर्ता घर-घर जाकर लोगों को पीएमएवाई के बारे में जागरूक करें।
- कोर्ट ने सुनिश्चित करने को कहा कि सभी पात्र परिवारों को पीएमएवाई के तहत आवास मिल सके।
रेलवे का कहना है कि ट्रैक विस्तार और अन्य प्रोजेक्ट्स के लिए इस जमीन की सख्त जरूरत है, खासकर नदी के कारण मौजूदा ट्रैक में दिक्कत आ रही है। यह इलाका रेलवे विस्तार के लिए उत्तराखंड में आखिरी संभावित जगह है, उसके बाद पहाड़ी क्षेत्र शुरू हो जाता है।
ये भी पढ़ें: NOTA से क्या बेहतर हुए जनप्रतिनिधि?: सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी, महिलाओं की भागीदारी की सराहना
याचिकाकर्ताओं की दलील
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने दलील दी कि यहां 50 हजार लोग दशकों से रह रहे हैं, कई पट्टे वाली जमीन पर बसे हैं और रेलवे ने पहले कभी मांग नहीं की। उन्होंने एक मैप पेश किया, जिसमें पास की खाली जमीन का इस्तेमाल सुझाया गया। भूषण ने कहा कि एक साथ इतने परिवारों को प्रधानमंत्री आवास योजना (पीएमएवाई) के तहत घर देना संभव नहीं और दिल्ली की झुग्गी नीति में भी निर्धारित तारीख होती है।
सरकार ने रखा अपना पक्ष
केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने कहा कि पात्र परिवारों को विस्थापन के बाद छह महीने तक प्रति माह 2,000 रुपए का भत्ता दिया जाएगा। रेलवे और राज्य सरकार ने सामूहिक रूप से प्रभावित परिवारों की पहचान करने और पुनर्वास की व्यवस्था का आश्वासन दिया। मामले की अगली सुनवाई अप्रैल 2026 में होगी। तब तक रेलवे जमीन से अतिक्रमण हटाने की कोई कार्रवाई नहीं होगी। केंद्र ने बताया कि 13 जमीनों पर फ्रीहोल्ड है, और हर्जाना राज्य व रेलवे दोनों देंगे।
विज्ञापन
रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News apps, iOS Hindi News apps और Amarujala Hindi News apps अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन