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जम्मू-कश्मीर: मोदी की बैठक में 'गुपकार' को बुलाया लेकिन जम्मू की पार्टियां को नहीं भेजा न्योता, ये दल करेगा अलग प्रांतीय विधानसभा की मांग

Tue, 22 Jun 2021 04:56 PM IST
Harendra Chaudhary जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली
जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Harendra Chaudhary Updated Tue, 22 Jun 2021 04:56 PM IST
सार

मोदी के साथ बैठक में जम्मू एंड कश्मीर नेशनल पैंथर्स पार्टी एकमात्र ऐसी पार्टी होगी जो जम्मू-कश्मीर के लिए 'कॉन्फेडरेशन ऑफ जम्मू-कश्मीर' यानी अलग-अलग प्रांतीय विधानसभाओं के गठन का प्रस्ताव रखेगी। इसके तहत एक उच्च न्यायालय रहे, एक राज्यपाल हो और वित्त व्यवस्था अलग-अलग रहे...

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Gupkar alliance invited in meeting with PM Modi on June 24, but Jammus parties did get invitation
गुपकार की ऑल पार्टी मीटिंग में शामिल नेता - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ जम्मू-कश्मीर के राजनीतिक दलों के नेताओं की बैठक का काउंटडाउन शुरू हो गया है। यह बैठक 24 जून को होगी। कांग्रेस, पीडीपी और नेशनल कांफ्रेंस सहित 'गुपकार' गठबंधन के सभी दलों ने पीएम मोदी की बैठक में जाने पर सहमति जताई है। मंगलवार को गुपकार के अलावा कांग्रेस पार्टी के पदाधिकारियों की बैठक हुई। सभी पार्टियां अपना एजेंडा तैयार कर रही हैं ताकि वे प्रधानमंत्री के समक्ष खुलकर अपनी बात रख सकें। गुपकार ने मंगलवार को इशारा कर दिया है कि वे अनुच्छेद 370 और 35ए पर बात करेंगे। कांग्रेस ने इस मुद्दे पर गुपकार को समर्थन देने की बात कही है।

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मोदी के साथ बैठक में जम्मू एंड कश्मीर नेशनल पैंथर्स पार्टी एकमात्र ऐसी पार्टी होगी जो जम्मू-कश्मीर के लिए 'कॉन्फेडरेशन ऑफ जम्मू-कश्मीर' यानी अलग-अलग प्रांतीय विधानसभाओं के गठन का प्रस्ताव रखेगी। इसके तहत एक उच्च न्यायालय रहे, एक राज्यपाल हो और वित्त व्यवस्था अलग-अलग रहे। जम्मू के राजनीतिक दलों का कहना है कि 'गुपकार' को तो प्रधानमंत्री की बैठक का न्योता भेज दिया, लेकिन जम्मू की राजनीतिक पार्टियों को किनारे कर दिया गया।

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जम्मू कश्मीर पैंथर्स पार्टी के एक वरिष्ठ पदाधिकारी का कहना है कि प्रधानमंत्री की बैठक में पार्टी अध्यक्ष प्रो. भीम सिंह हिस्सा लेंगे। उन्होंने इस बात पर नाराजगी जताई कि प्रधानमंत्री की तरफ से 'गुपकार' में शामिल सभी पार्टियों को न्योता भेजा गया है। दूसरी तरफ जम्मू के राजनीतिक दलों को इस बैठक में नहीं बुलाया गया। जैसे 'इक्कजुट जम्मू' और 'डोगरा स्वाभिमान संगठन' के पास न्योता नहीं पहुंचा। इन दोनों राजनीतिक दलों का स्थानीय आधार है। इन्होंने डीडीसी का चुनाव भी लड़ा है।

गुपकार गठबंधन के प्रवक्ता युसुफ तारीगामी कहते हैं 'हम जम्मू-कश्मीर को लेकर प्रधानमंत्री से बात करेंगे। मीटिंग का कोई एजेंडा नहीं है, जो कुछ भी बोलना चाहता है, बोल सकता है। हम आपको यकीन दिलाना चाहते हैं कि हम आसमान के तारे नहीं मांगेंगे। हम वही मांगेंगे, जो हमारा था और हमारा ही रहना चाहिए। इस बयान का मतलब साफ है कि गुपकार 'अनुच्छेद 370' की वापसी चाहता है। वजह, इसके साथ उनका वजूद जुड़ा है।

पदाधिकारी के मुताबिक, पैंथर्स पार्टी को छोड़कर बाकी के दलों ने पुरानी व्यवस्था का भरपूर फायदा उठाया है। पैंथर्स पार्टी ने अनुच्छेद 370 और 35ए हटाने का समर्थन किया था। इतना ही नहीं, पार्टी का स्टैंड यह भी है कि अपर हाउस यानी एमएलसी व्यवस्था खत्म की जाए। गुपकार समूह को अब समझ नहीं आ रहा है कि वे क्या करें। जम्मू-कश्मीर के राजनीतिक और सुरक्षा मामलों के विशेषज्ञ कैप्टन अनिल गौर (रिटायर्ड) का कहना है कि गुपकार वालों की दुकान बंद हो गई है। 70 साल से जम्मू कश्मीर के संस्थानों को दीमक की तरह खत्म कर दिया गया है। ऐसा कोई विभाग नहीं बचा था, जहां बैक डोर एंट्री न हुई हो।

वह कहते हैं, लद्दाख वाले आज खुश हैं, क्योंकि गुपकार के लोगों ने वहां के बारे में कभी नहीं सोचा। वे लोग विकास के मामले में पिछड़ते चले गए। गुपकार तो पीएम के समक्ष अनुच्छेद 370 हटने से पहले वाली व्यवस्था बहाल करने पर बात कहेगा। जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा मिले, यह उनकी दूसरी मांग रहेगी। आज भी जम्मू को उसका निर्धारित हिस्सा नहीं मिल पा रहा है। बतौर गौर, अनुच्छेद 370 हटने के बाद जम्मू-कश्मीर में फायरमैन के तीन सौ पद निकले थे। इनमें से 290 आवेदक कश्मीर के लगे हैं। दस युवा जम्मू के हैं। सहायक प्रोफेसर की 90 फीसदी नियुक्तियां कश्मीर के युवाओं को मिल रही हैं। जम्मू में दैनिक मजदूरी वालों को पक्का नहीं किया जा रहा, जबकि कश्मीर में दैनिक मजदूर नियमित हो रहे हैं। यही वजह है कि पैंथर्स पार्टी पीएम मोदी के समक्ष अलग-अलग प्रांतीय विधानसभाओं के गठन का प्रस्ताव रखेगी। इसके बाद ही विकास को लेकर भेदभाव खत्म हो सकेगा।

गुपकार वालों ने पश्चिम पाकिस्तान से आए लोगों की आज तक सुध नहीं ली। ये लोग जम्मू के आसपास बसे हैं। इन्हें आज तक जमीन नहीं मिल सकी है। इसके अलावा 1965 और 1971 की लड़ाई में जिन लोगों की जमीन खाली कराई गई थी, उन्हें भी कुछ नहीं मिला है। इन लोगों को उम्मीद थी कि अनुच्छेद 370 हटने के बाद बहुत कुछ बदल जाएगा। अप्रवासी लोग, जो आतंकियों के चलते कश्मीर से जम्मू में आकर बस गए हैं, उनकी वापसी को लेकर कुछ नहीं हो रहा। कश्मीरी पंडितों की तर्ज पर उन्हें जो सुविधाएं मिलनी चाहिए, वे नहीं मिली। कैप्टन अनिल गौर (रिटायर्ड) कहते हैं, कश्मीरी पंडितों को दोबारा बसाया जाए। अब आगे जब भी विधानसभा चुनाव हो, वह 2011 की जनगणना के आधार पर नहीं, बल्कि 2021 की जनगणना पर हो। वजह, 2011 में दस लाख लोगों के नाम अतिरिक्त रूप से कश्मीर में जोड़ दिए गए। इससे जम्मू की जनसंख्या कम हो गई। उम्मीद है पीएम इन बातों पर गौर करेंगे।

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