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Nasirnagar Demolition: 'वरिष्ठ अधिकारी पद पर रहे तो जांच महज दिखावा', नासिरनगर विध्वंस पर गुजरात हाईकोर्ट सख्त

Mon, 10 Aug 2026 09:47 PM IST
Devesh Tripathi पीटीआई, अहमदाबाद
पीटीआई, अहमदाबाद Published by: Devesh Tripathi Updated Mon, 10 Aug 2026 09:47 PM IST
सार

सूरत के नासिरनगर में हुई तोड़फोड़ को लेकर गुजरात हाईकोर्ट ने राज्य सरकार और नगर निगम की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाए हैं। अदालत ने कहा कि निष्पक्ष जांच के लिए नगर निगम और पुलिस के शीर्ष अधिकारियों को जांच पूरी होने तक मौजूदा पदों पर नहीं रखा जाना चाहिए। पीठ ने 30 मई की कार्रवाई को पहली नजर में गैर-कानूनी बताया, जिससे बड़ी संख्या में लोग प्रभावित हुए।

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सूरत में 100 से ज्यादा मकानों पर चला था बुलडोजर - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स/PTI

विस्तार

गुजरात हाईकोर्ट ने सोमवार को कहा कि सूरत के नासिरनगर में हुई अवैध तोड़फोड़ की जांच तब "महज दिखावा" बनकर रह जाएगी, जब तक नगर निगम और पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी जांच के दौरान अपने पदों पर बने रहेंगे। न्यायमूर्ति निखिल करियल की पीठ ने कहा कि न्याय सुनिश्चित करने के लिए राज्य सरकार को सूरत नगर निगम आयुक्त और पुलिस उपायुक्त समेत वरिष्ठ अधिकारियों को जांच पूरी होने तक अपने पद पर बने रहने की अनुमति नहीं देनी चाहिए।
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पीठ ने यह आदेश नासिरनगर से विस्थापित 26 लोगों की ओर से दाखिल याचिका पर दिया। याचिका में 30 मई को हुए गैर-कानूनी विध्वंस को चुनौती दी गई थी। इस कार्रवाई के कारण करीब 150 लोग बेघर हो गए थे। अदालत ने कहा कि सबसे वरिष्ठ अधिकारियों का संबंधित पदों पर बने रहना जांच को महज दिखावा बना देगा।
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हाईकोर्ट ने अधिकारियों को लगाई तलाड़
हाईकोर्ट ने प्रभावित लोगों के पुनर्वास के लिए सूरत नगर निगम आयुक्त की ओर से दिए गए उस प्रस्ताव पर भी सवाल उठाया, जिसमें गैर-सरकारी संगठन (एनजीओ) की मदद से उन्हें आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) की आवास योजना के तहत घर देने की बात कही गई थी। अदालत ने कहा कि जिन लोगों के घर गिराए गए हैं, उनके पुनर्वास की जिम्मेदारी पूरी तरह नगर निगम और राज्य के अधिकारियों के कंधों पर है। अधिकारी इस जिम्मेदारी से बच नहीं सकते।
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अदालत ने राज्य सरकार और सूरत नगर निगम से इस संबंध में निर्देश मांगे हैं। मामले की अगली सुनवाई 14 अगस्त को होगी। राज्य सरकार ने इससे पहले अदालत को बताया था कि उसने यह जांचने के लिए एक समिति गठित की है कि तोड़फोड़ की कार्रवाई गुजरात नगर निगम अधिनियम, 1949 के तहत तय प्रक्रिया के अनुसार की गई थी या नहीं।

नगर निगम और पुलिस के अधिकारियों की हो रही जांच
सरकार ने कहा कि समिति 30 मई को तोड़फोड़ के दौरान मौके पर मौजूद सूरत नगर निगम के वरिष्ठ अधिकारियों और पुलिस अधिकारियों के साथ-साथ निजी लोगों की भूमिका की भी जांच करेगी। समिति को संबंधित अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई के लिए प्रशासनिक स्तर पर उचित कदम की सिफारिश करने का अधिकार भी दिया गया है। सरकार ने अपने हलफनामे में कहा कि जांच दो महीने के भीतर पूरी की जाएगी।

अदालत ने कहा कि नगर निगम ने जहां कथित गलत काम के आरोप में कनिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की है, वहीं निगम और पुलिस के सबसे वरिष्ठ अधिकारियों को भी जांच पूरी होने तक अपने पदों पर बने रहने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। सूरत नगर निगम ने इस मामले में पहले ही पांच कनिष्ठ अधिकारियों को निलंबित कर दिया है।

हाईकोर्ट ने क्या-क्या कहा?
पीठ ने आगे कहा कि 30 मई को इलाके में की गई तोड़फोड़ प्रथम दृष्टया अवैध थी। ऐसे में प्रभावित लोगों को ईडब्ल्यूएस योजना के तहत घर देना भी उचित नहीं है, जिसमें एनजीओ उनकी ओर से भुगतान करेंगे। इसके लिए आवेदन के साथ 20,000 रुपये का ड्राफ्ट और निर्माण लागत के रूप में 5.5 लाख रुपये देने की बात कही गई थी।

अदालत ने कहा, "राज्य और सूरत नगर निगम को उन लोगों के मामले में अपनी जिम्मेदारी से बचने की अनुमति नहीं दी जा सकती, जिनके घर बिना किसी कानूनी अधिकार के गिराए गए हैं।" नगर निगम आयुक्त ने अपने हलफनामे में कहा था कि संबंधित जमीन कुछ निजी लोगों की थी, जिन्होंने तीसरे पक्ष के माध्यम से वहां विकास कार्य कराने की मांग की थी।


12 मार्च को भूखंड के सत्यापन प्रमाणपत्र के लिए आवेदन किया गया था, लेकिन इसे खारिज कर दिया गया। इसके बाद डेवलपर ने सड़क की सीमा की भौतिक रूप से निशानदेही कराने का अनुरोध किया। कुछ नगर निगम अधिकारियों ने 30 मई को की जाने वाली निशानदेही की जानकारी पुलिस को दी थी। इसी प्रक्रिया के दौरान तोड़फोड़ की कार्रवाई की गई।
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