गुजरात: '2022 की पिच' पर मुख्यमंत्री से लेकर मंत्री तक सब पहली दफा मंत्रिमंडल में, क्या चुनावों तक राज्य की ब्यूरोक्रेसी करेगी बैटिंग?
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विस्तार
गुजरात में अगले साल विधानसभा के चुनाव होंगे और चुनाव से पहले जिस तरीके का फेरबदल हुआ है, वह राजनीति में सबसे 'विस्फोटक' फेरबदल माना जाता है। मुख्यमंत्री से लेकर पूरी कैबिनेट तक बदल दी गई। गुजरात की जो कैबिनेट बनी है, उसे मुख्यमंत्री से लेकर मंत्री तक सब पहली दफा अपना पोर्टफोलियो संभालने वाले हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि जिस तरीके से गुजरात में इतना बड़ा फेरबदल हुआ है वह भारतीय जनता पार्टी के लिए गेम चेंजर साबित होगा या नहीं, लेकिन पहली बार मुख्यमंत्री से लेकर कैबिनेट मंत्री शासन सत्ता का अनुभव न होने के चलते ब्यूरोक्रेसी पर निर्भरता जरूर ज्यादा बढ़ जाएगी।
भारतीय जनता पार्टी ने उत्तराखंड और कर्नाटक में मुख्यमंत्री बदला। बात जब गुजरात में मुख्यमंत्री बदलने की आई तो राजनीतिक चर्चाएं सबसे ज्यादा होने लगीं। उसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि गुजरात देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष और गृह मंत्री अमित शाह का गृह राज्य भी है। लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा तब होनी शुरू हुई, जब नए मंत्रिमंडल में सभी बनाए गए मंत्री पहली दफा मंत्री बने थे। राजनीतिक विशेषज्ञ और गुजरात कैडर के पूर्व आईएएस शंभूभाई पटेल कहते हैं गुजरात में एक साथ पहली बार अनुभवहीन मंत्रियों को बहुत बड़ा पोर्टफोलियो दिया गया है। वे कहते हैं कि मंत्रियों से लेकर मुख्यमंत्रियों तक का शासन सत्ता चलाने का पहले कोई भी अनुभव नहीं है। ऐसे में जब चुनाव सिर पर है, तो निश्चित तौर पर भाजपा इस तरह के फेरबदल को मास्टर स्ट्रोक के तौर पर ही देख रही होगी। हालांकि शंभू भाई पटेल का कहना है कि कैबिनेट जरूर नई है, लेकिन जिस तरीके से जातिगत समीकरणों को भारतीय जनता पार्टी ने साधा है वह विजय रूपाणी के दौर में हुई जातिगत समीकरणों की अस्थिरता को निश्चित तौर पर रोकने का काम कर सकती है।
क्योंकि विजय रूपाणी के कार्यकाल में गुजरात के ज्यादातर इलाकों में खास तौर से जातिगत समीकरणों के आधार पर लोगों में जबरदस्त नाराजगी शुरू हो गई थी। वे कहते हैं कि भारतीय जनता पार्टी ने उस नाराजगी को दूर करने के लिए इतना व्यापक फेरबदल कर डाला। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि भारतीय जनता पार्टी गुजरात में किसी भी तरीके का कोई रिस्क नहीं उठाना चाहती है। उसके प्रमुख वजह देश के प्रधानमंत्री और गृहमंत्री का गुजरात से सीधा कनेक्शन होना है, बल्कि भारतीय जनता पार्टी भी एक बड़ी प्रयोगशाला गुजरात रही है।
खड़े हो रहे सवालिया निशान
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि जिस तरीके से गुजरात में मुख्यमंत्री से लेकर कैबिनेट का पूरा फेरबदल किया गया है उससे पूर्व मुख्यमंत्री विजय रूपाणी और उनकी कैबिनेट पर भी सवाल उठने लगे हैं। भारतीय जनता पार्टी के असंतुष्ट खेमे के बड़े नेता कहते हैं, चुनाव से पहले मुख्यमंत्री से लेकर पूरी कैबिनेट को बदल देना राजनैतिक रूप से बड़ा कदम हो सकता है, लेकिन पब्लिक में इसका संदेश क्या जाता है इस पर भी गौर करने की जरूरत है। गुजरात के वरिष्ठ पत्रकार दामोदर पटेल कहते हैं कि रूपाणी का हटाया जाना राजनैतिक हो सकता है लेकिन पूरी कैबिनेट का हटाया जाना यह इशारा करता है कि कोई भी मंत्री काम का नहीं था। यही फैसला पूरे मंत्रिमंडल पर सवालिया निशान खड़े करता है।
राजनीतिक विश्लेषक और पूर्व आईएएस शंभू भाई पटेल कहते हैं कि गैर-अनुभवी मुख्यमंत्री और उनकी कैबिनेट के होने से निश्चित तौर पर ब्यूरोक्रेसी का हस्तक्षेप बढ़ जाएगा। वे कहते हैं कि पहले भी गुजरात के कई प्रमुख बड़े नेताओं के साथ सेवाएं दे चुके एक सेवानिवृत्त अधिकारी की सेवाएं और ज्यादा बढ़ने वाली हैं। उनका कहना है सिर्फ अधिकारी की जिम्मेदारी ही नहीं बढ़ेगी बल्कि गुजरात के ब्यूरोक्रेटिक सेटअप पर सरकार की निर्भरता हद से ज्यादा बढ़ सकती है।
कहने के लिए तो गुजरात में 2022 की राजनैतिक पिच तैयार की जा रही है। लेकिन इस पिच में अभी से इतने रोड़े आने लगे हैं जिसे संभालना न सिर्फ आलाकमान बल्कि राज्य के संगठन के लिए भी बड़ी चुनौती होगा। गुजरात की राजनीति बहुत करीब से समझने वाले पत्रकार आरएन रयानी कहते हैं कि निश्चित तौर पर रूपाणी की कैबिनेट के न सिर्फ मंत्री मंत्री-विधायक जबरदस्त तरीके से नाराज हैं। बल्कि इस नाराजगी की झलक मंत्रिमंडल विस्तार से पहले गुजरात में देखी जा चुकी है। रायणी कहते हैं कि जातिगत समीकरणों को साधते हुए नए मंत्रिमंडल का विस्तार तो जरूर किया गया है लेकिन उसी जातिगत समीकरणों के आधार पर लोगों में नाराजगी भी दिख रही है। वह कहते हैं कि अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के नेताओं और आलाकमान को इस बात को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। इसके अलावा नाराजगी से भारतीय जनता पार्टी के नेताओं में ही नहीं है बल्कि उन नेताओं में भी है जो अपनी पार्टी को छोड़कर भाजपा के पाले में आ गए थे। क्योंकि इनमें से कुछ लोग ऐसे भी थे जिनको रूपाणी की कैबिनेट में मंत्री बनाया गया था। लेकिन जब विस्तार हुआ और मुख्यमंत्री से लेकर मंत्री तक बदले गए तो उसमें ऐसे मंत्री भी थे जो कांग्रेस वालों ने दोनों को छोड़कर भाजपा में शामिल हुए थे। विशेषज्ञों का कहना है कि इन नेताओं की अपने इलाकों से लेकर अगड़ी जातियों में विशेष पकड़ भी है।
हालांकि भाजपा ने गुजरात में जो मंत्रिमंडल का विस्तार किया है, उसमें पटेल, क्षत्रिय, पिछड़े, जैन, दलित, और आदिवासी विधायकों को मंत्री बनाया है। इसमें आठ पटेल दो क्षत्रिय, छह ओबीसी, तीन आदिवासी और एक जैन समेत दो दलित समुदाय के विधायक मंत्री बने हैं। नए मंत्रिमंडल में गुजरात के अलग-अलग इलाकों को भी तवज्जो दी गई है। सबसे कम मंत्री उत्तरी गुजरात इलाके से बनाए गए हैं। गुजरात मंत्रिमंडल के सदस्यों पर नजर डालें, तो पाएंगे कि सौराष्ट्र से आठ विधायक मंत्री बने हैं। जबकि दक्षिण गुजरात से सात विधायकों को मंत्री बनाया गया है। मध्य गुजरात से छह विधायक मंत्री बने हैं। जबकि सबसे कम मंत्री उत्तर गुजरात इलाके से बनाए गए हैं। उत्तर गुजरात से तीन विधायकों को ही सिर्फ मंत्री बनाया गया है।