CAPF: सीएपीएफ के 13000 कैडर अफसरों पर चोट, क्या हार में बदलेगी जीती हुई लड़ाई, रिव्यू पेटिशन में गई सरकार
सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि सीएपीएफ अधिकारी, देश की सेवा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। वे कठिन परिस्थितियों में काम कर रहे हैं। इसके बावजूद, सीएपीएफ के कैडर अधिकारी, अपने करियर में बहुत अधिक ठहराव का सामना कर रहे हैं।
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केंद्रीय अर्धसैनिक बलों में पदोन्नति एवं वित्तीय हितों के मोर्चे पर पिछड़ चुके कैडर अधिकारियों को सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले से उम्मीद बंधी थी कि उनके साथ न्याय होगा। विशेषकर सहायक कमांडेंट, जिन्हें 15 साल में भी पहली पदोन्नति नहीं मिल रही, सुप्रीम कोर्ट के फैसले से उनके चेहरे खिल उठे थे। 23 मई को सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस ओका और जस्टिस उज्जवल भुयान ने एक अहम फैसले में केंद्रीय अर्धसैनिक बलों में 'संगठित समूह ए सेवा' (ओजीएएस) लागू करने की बात कही थी। इसके लिए छह माह की समय-सीमा तय की गई। सर्वोच्च अदालत ने इन बलों में बतौर प्रतिनियुक्ति बाहर से आने वाले आईपीएस की संख्या (सीनियर एडमिनिस्ट्रेटिव ग्रेड के स्तर तक) को धीरे-धीरे कम करने की बात कही। उनकी सेवा अवधि अधिकतम 2 वर्ष तक सीमित रखने पर बल दिया। खास बात है कि इस फैसले के बाद सीएपीएफ में डीआईजी और आईजी ही नहीं, कमांडेंट के पदों पर भी आईपीएस की तैनानी होने लगी। अब केंद्र सरकार, जस्टिस ओका और जस्टिस उज्जल भुयान द्वारा दिए गए फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में रिव्यू पेटिशन में चली गई है। सरकार के इस कदम को 13000 कैडर अधिकारियों के लिए एक बड़ा झटका बताया जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था, केंद्रीय अर्धसैनिक बलों में 'संगठित समूह ए सेवा' (ओजीएएस) लागू किया जाए। इसके लिए बाकायदा छह माह की समय-सीमा भी तय की गई है। चार वर्ष से लंबित कैडर रिव्यू प्रक्रिया, उक्त अवधि में ही पूरी की जाए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि गैर-कार्यात्मक वित्तीय उन्नयन (एनएफएफयू) कैसे देना है, इसके लिए समय-सीमा सुनिश्चित की जानी चाहिए। सीएपीएफ में केवल एनएफएफयू के लिए नहीं, बल्कि सभी कार्यों के लिए 'ओजीएएस पैटर्न' लागू होना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि सीएपीएफ अधिकारी, देश की सेवा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। वे कठिन परिस्थितियों में काम कर रहे हैं। इसके बावजूद, सीएपीएफ के कैडर अधिकारी, अपने करियर में बहुत अधिक ठहराव का सामना कर रहे हैं। अदालत ने इन बलों में बतौर प्रतिनियुक्ति बाहर से आने वाले अधिकारियों की संख्या (सीनियर एडमिनिस्ट्रेटिव ग्रेड के स्तर तक) को धीरे-धीरे कम किया जाए। साथ ही उनकी सेवा अवधि अधिकतम 2 वर्ष तक सीमित हो। इस ग्रेड में आईजी रैंक वाले अधिकारी आते हैं। यानी कुछ वर्षों के दौरान इन बलों में आईजी रैंक तक आईपीएस प्रतिनियुक्ति को खत्म किया जा सकता है। मई और जून में यूपी कैडर के आईपीएस स्वप्निल ममगई को बीएसएफ में डीआईजी, त्रिपुरा कैडर के आईपीएस शाश्वत कुमार को एसएसबी में कमांडेंट और उत्तराखंड कैडर की आईपीएस प्रीति प्रियादर्शनी ने आईटीबीपी में बतौर कमांडेंट ज्वाइन करने के आदेश जारी हुए। इनके अलावा करीब आधा दर्जन दूसरे आईपीएस भी सीएपीएफ में आ गए। कैडर अफसरों को उसी वक्त ऐसा लगने लगा था कि इस फैसले को लेकर सरकार की मंशा ठीक नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट रूप से कहा था कि सीएपीएफ अधिकारियों को ओजीएएस आदि प्रक्रियाओं में शामिल किया जाना चाहिए। सरकार, सीएपीएफ प्रतिनिधियों को उनकी सेवा शर्तों और पदोन्नति से संबंधित सभी चर्चाओं और निर्णयों में शामिल करे। केंद्रीय अर्धसैनिक बल, अब पूर्ण रूप से 'ओजीएएस' के दायरे में माने गए हैं। इनके हितों को लेकर सरकार जो भी निर्णय ले, उसमें 'ओजीएएस' का दृष्टिकोण मान्य रहे। सीएपीएफ के पूर्व कैडर अफसरों का कहना था कि इन बलों में 'समूह ए' अधिकारियों की सेवाएं 1986 से संगठित हैं, मगर अफसरों को उसका लाभ नहीं मिल सका।
2006 के दौरान जब छठे केंद्रीय वेतन आयोग ने आईएएस, आईपीएस व आईआरएस सहित अन्य सभी संगठित समूह ए सेवाओं 'ओजीएएस' के लिए गैर कार्यात्मक वित्तीय उन्नयन 'एनएफएफयू' योजना शुरु की तो कैडर अधिकारियों ने भी इसका लाभ देने की मांग की। हालांकि तब 'सीएपीएफ' को संगठित समूह 'ए' सेवा के रूप में मान्यता देने से इनकार कर दिया गया। इसके बाद कैडर अफसरों ने दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। लंबी कानूनी लड़ाई लड़ने के बाद 3 सितंबर 2015 के दिन अदालत ने अपने फैसले में सीएपीएफ को 1986 से 'संगठित समूह ए सेवा' घोषित कर दिया, लेकिन इसके बावजूद उन्हें फायदा नहीं मिल सका। दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई।
सर्वोच्च न्यायालय ने 5 फरवरी 2019 को दिए अपने फैसले में दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश को बरकरार रखा। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 3 जुलाई 2019 को अपनी एक घोषणा के जरिए 'सीएपीएफ संगठित सेवा ए' को मंजूरी प्रदान कर दी। तब कैडर अफसरों में यह उम्मीद जगी थी कि उन्हें एनएफएफयू के परिणामी लाभ मिल जाएंगे। रेलवे सुरक्षा बल 'आरपीएफ' भी सीएपीएफ के साथ न्यायालय में सह-याचिकाकर्ता था। केंद्रीय मंत्रिमंडल की मंजूरी के बाद रेल मंत्रालय ने न्यायालय के आदेश को अक्षरश: लागू कर दिया। आरपीएफ को संगठित सेवा का दर्जा मिल गया। उन्हें एनएफएफयू के सभी लाभ मिल गए और साथ ही उनकी सेवा का नाम बदलकर 'आईआरपीएफएस' कर दिया। कैडर अफसरों के मुताबिक, सीएपीएफ में पुराने सेवा नियमों की आड़ में खंडित एनएफएफयू को न्यायालय के आदेश की व्याख्या कर लागू किया गया है। नतीजा, इससे सीएपीएफ कैडर अफसरों की बहुत छोटी संख्या को ही उसका लाभ मिल सका। अधिकांश कैडर अफसर फायदों से वंचित रहे।
इसके बाद भी अधिकांश अफसरों की पदोन्नति से जुड़ी समस्याएं जस की तस बनी रही। एक ही न्यायालय के आदेश की विभिन्न मंत्रालयों द्वारा अलग-अलग व्याख्या कर दी गई। अधिकारियों के मुताबिक, जब तक ओजीएएस 'संगठित सेवा' पैटर्न के अनुसार, भर्ती नियमों/सेवा नियमों में संशोधन नहीं किया जाता है, तब तक ओजीएएस का लाभ नहीं दिया जा सकता। सीएपीएफ के अधिकारियों की मांग थी कि ओजीएएस पैटर्न के अनुसार, संशोधित भर्ती नियम/सेवा नियमों के साथ कैबिनेट और सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पूर्ण कार्यान्वयन किया जाए। अनेकों बार मांग करने के बाद भी उनके सेवा नियम/भर्ती नियम संशोधित नहीं किए गए। इसका नतीजा यह निकला कि वह केस दोबारा से अदालत में पहुंच गया।
सीएपीएफ में कैडर रिव्यू काफी समय से लंबित है। बीएसएफ और सीआरपीएफ में पिछला कैडर रिव्यू 2016 में हुआ था। अब वह कैडर रिव्यू वर्ष 2021 से लंबित है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा, 6 महीने के भीतर कैडर रिव्यू पूरा किया जाना चाहिए। इन सेवाओं के भर्ती नियमों (आरआर) में संशोधन और समयबद्ध पदोन्नति का प्रावधान हो। भर्ती नियम (आरआर) और सेवा नियम (एसआर) को ओजीएएस मानकों के अनुसार बदला जाए। एनएफएफयू, कैसे देना है, ये भी तय होगा। इसके लिए एक समय-सीमा सुनिश्चित की जानी चाहिए। जैसे, उप कमांडेंट को चार वर्ष में एनएफएफयू का फायदा मिले। सेकेंड-इन-कमांड को 9 वर्ष बाद, कमांडेंट को 13 वर्ष और महानिरीक्षक को 18 वर्ष में उक्त फायदा दिया जाए। कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) को सभी नियमों में संशोधन और कैडर रिव्यू 3 महीने के भीतर करना होगा। सभी तरह की प्रक्रिया में सीएपीएफ प्रतिनिधियों को शामिल किया जाए। विशेषकर, सेवा नियमों और कैडर समीक्षा से जुड़े सभी निर्णयों में सीएपीएफ के कैडर अधिकारियों की भागीदारी अनिवार्य होगी। अब केंद्र सरकार के रिव्यू पेटिशन में जाने से उक्त फैसले के लागू होने पर संदेह हो गया है।