मोदी सरकार का बड़ा फैसला, उग्रवादी समूह एनडीएफबी के साथ समझौते पर किए हस्ताक्षर
- बोडो क्षेत्र में शांति के लिए असम सरकार-विद्रोही संगठनों में समझौता
- विद्रोही गुटों ने 48 साल से चल रही अलग राज्य की मांग छोड़ी
- 30 जनवरी को एनडीएफबी के 1550 विद्रोही हथियारों सहित करेंगे आत्मसमर्पण
- पुनर्वास के लिए तीन साल में केंद्र और राज्य सरकार देंगे 1500 करोड़ रुपये
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विस्तार
असम के बोडो इलाके में स्थायी शांति के लिए केंद्र ने असम सरकार व तीन मुख्य विद्रोही गुटों के साथ त्रिपक्षीय समझौता किया है। गृहमंत्री अमित शाह की मौजूदगी में सोमवार को गृह मंत्रालय में हुए समझौते के तहत अब कोई गुट अलग बोडो राज्य की मांग नहीं करेगा।
साथ ही असम के खतरनाक उग्रवादी संगठन नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैंड (एनडीएफबी) के चार गुटों के 1550 विद्रोही 150 हथियारों के साथ 30 जनवरी को आत्मसमर्पण करेंगे। सरकार हथियार डालने वाले विद्रोहियों के पुनर्वास और क्षेत्र के विकास के लिए 1500 करोड़ का आर्थिक पैकेज देगी।
Home Minister Amit Shah: Today Centre, Assam Govt and Bodo representatives have signed an important agreement. This agreement will ensure a golden future for Assam and for the Bodo people. https://t.co/tnxf8Y21Nb pic.twitter.com/hD9VaTL5f3
विज्ञापन विज्ञापन— ANI (@ANI) January 27, 2020
शाह ने इसे ऐतिहासिक करार बताते हुए कहा, केंद्र असम समेत पूरे पूर्वोत्तर के विकास के लिए प्रतिबद्ध है। समझौता उसी का अहम हिस्सा है। बोडो उग्रवाद के कारण कुछ दशकों में 4000 से ज्यादा लोगों की जान गई है। यह समझौता बोडो लोगों के विकास का रास्ता खोलेगा।
शाह की मौजूदगी में एनडीएफबी, ऑल बोडो स्टूडेंट यूनियन (एबीएसयू) और यूनाईटेड बोडो पीपुल्स ऑर्गनाईजेशन (यूबीपीओ) के शीर्ष नेताओं ने समझौते पर हस्ताक्षर किए। केंद्र की ओर से गृह मंत्रालय में संयुक्त सचिव सत्येंद्र गर्ग और असम के मुख्य सचिव कुमार संजय कृष्ण ने हस्ताक्षर किए। असम के सीएम सर्बानंद सोनोवाल ने गवाह के तौर पर हस्ताक्षर किए। एबीएसयू 1972 से अलग बोडोलैंड के लिए आंदोलन चला रही थी।
27 साल में तीसरा समझौता
इस मसले पर 27 साल में तीसरा करार है। पहला समझौता 1993 में ऑल बोडो स्टूडेंट यूनियन से हुआ था, जिसमें सीमित राजनीतिक शक्तियों के साथ बोडोलैंड ऑटोनोमस काउंसिल के गठन की बात थी। 2003 में दूसरा समझौता विद्रोही संगठन बोडो लिबरेशन टाइगर से हुआ।
उसमें असम के चार जिलों कोकराझार, चिरांग, बसका और उदालगुड़ी को मिलाकर बोडोलैंड टेरिटोरियल एरिया डिस्ट्रिक्ट (बीटीएडी) बनाने की सहमति हुई। नए समझौते के तहत बीटीएडी का नाम बदलकर बोडोलैंड टेरिटोरियल रीजन (बीटीआर) कर दिया गया।
इसके पास ज्यादा, विधायी, कार्यकारी, प्रशासनिक और आर्थिक शक्तियां होंगी। संविधान की छठी अनुसूचि के तहत आयोग गठित होगा, जो बोडो बहुल क्षेत्रों को बीटीआर में शामिल कर क्षेत्र का परिसीमन करेगा। साथ ही बोडो के सामाजिक, सांस्कृतिक, बोली और क्षेत्रीय पहचान से जुड़े मसलों का भी समाधान करेगा।
तीन साल तक 250-250 करोड़ रुपए हर साल खर्च
समझौते के तहत राज्य और केंद्र इलाके में योजनाओं के क्रियान्वयन और इनके पुनर्वास के लिए तीन साल तक प्रतिवर्ष 250-250 करोड़ रुपए खर्च करेगी। बोडो नौजवानों को मुख्यधारा में लाने के लिए सेना, अर्धसैनिक बल और पुलिस में विशेष भर्ती अभियान चलेगा।
राज्य सरकार अलग राज्य की मांग को लेकर आंदोलन में मारे गए विद्रोहियों के परिजन को 5-5 लाख रुपये देगी। एनडीएफबी विद्रोहियों के खिलाफ केस वापस होंगे, हालांकि जघन्य अपराधों के मामले में मौजूदा कानून के तहत केस दर केस समीक्षा की जाएगी।
नई सुबह का समझौता
बोडो संगठनों से हुआ समझौता उनके जीवन में परिवर्तनकारी परिणाम आएंगे। बोडो समझौता शांति, सद्भाव और एकजुटता की नई सुबह लाने वाला है। जो पहले सशस्त्र विद्रोह में लिप्त थे, मुख्यधारा में लौटेंगे और देश की प्रगति में योगदान देंगे। हम बोडो लोगों की आकांक्षा को समझते हुए उन्हें पूरा करने को हरसंभव सहायता देने के लिए प्रतिबद्ध हैं। - नरेंद्र मोदी, प्रधानमंत्री
बड़ा सवाल : क्या इलाके में स्थायी शांति बहाल हो सकेगी
प्रतिबंधित संगठन नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैंड (एनडीएफबी) और असम सरकार के साथ हुए त्रिपक्षीय समझौते के बाद सबसे बड़ा सवाल है कि क्या इसके बाद इलाके की दशकों पुरानी समस्या खत्म हो जाएगी? असम भाजपा नेता और राज्य के वित्त मंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने समझौते को ऐतिहासिक बताया।
वहीं, राजनीतिक हलकों में सवाल उठने लगा है कि क्या इससे इलाके में स्थायी शांति बहाल हो सकेगी। एनडीएफबी लंबे अरसे से बोडो जनजाति के लिए अलग राज्य या केंद्र शासित प्रदेश की मांग करता रहा है, लेकिन ताजा समझौते में इसका कोई जिक्र नहीं है।
समझौते के खिलाफ गैर-बोडो संगठनों का 12 घंटे बंद
केंद्र सरकार के इस कदम के विरोध में विभिन्न गैर-बोडो संगठनों ने सोमवार को निचले असम में 12 घंटे का बंद रखा। इस दौरान सामान्य जनजीवन अस्त-व्यस्त रहा। बंद के दौरान विभिन्न संगठनों के समर्थकों ने कई जगह सड़कों की नाकेबंदी की और नेताओं व मंत्रियों के पुतले जलाए। इलाके में तमाम दुकानें, बाजार, स्कूल-कॉलेज और दफ्तर बंद रहे। राज्य के अन्य हिस्सों पर बंद का कोई असर नहीं पड़ा।
बोडो शांति समझौते को मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल के नेतृत्व वाली असम सरकार और बोडोलैंड टेरिटोरियल काउंसिल प्रमुख हग्रामा मोहिलरी का पूरा समर्थन है। यह समझौता दशकों पुरानी बोडो समस्या का पूर्ण और अंतिम समाधान है। - हिमंत बिस्वा सरमा, वित्तमंत्री असम