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अनुच्छेद 370 पर सुप्रीम कोर्ट में केंद्र ने कहा, अब फैसला वापस लेना मुमकिन नहीं

Fri, 24 Jan 2020 01:54 AM IST
संदीप भट्ट न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: संदीप भट्ट Updated Fri, 24 Jan 2020 01:54 AM IST
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Government in Supreme Court on Article 370, It is not possible to take decision back
सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार ने साफ तौर पर कहा, अनुच्छेद 370 हटाने से जम्मू-कश्मीर को भारतीय संघ में शामिल किया जा सका है और इस फैसले को अब वापस लेना संभव नहीं है। केंद्र सरकार ने यह भी कहा कि जम्मू-कश्मीर की स्वायत्तता अस्थाई थी, भारत राज्यों का एक संघ है। 

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बीते साल पांच अगस्त को अनुच्छेद 370 हटाकर जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे को खत्म करने के केंद्र सरकार के फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर बृहस्पतिवार को सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की पीठ के समक्ष सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार के अटार्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने यह दलील रखी।
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वेणुगोपाल ने जम्मू-कश्मीर का उदाहरण देते हुए कहा, भारतीय राज्यों के एकीकरण का मकसद देश की अखंडता बनाए रखना है। वहीं, अटार्नी जनरल ने वीपी मेनन की किताब का हवाला दिया जिसमें पाकिस्तान और महराजा हरि सिंह और पाकिस्तान के बीच फूट का वर्णन किया गया है। 
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उन्होंने कहा कि पाकिस्तान और महराजा के बीच हुए करार का उल्लंघन हुआ। पाक द्वारा प्रशिक्षित जनजातियों को ट्रकों में भर कर लड़ाई करने भेजा गया और राज्य को कब्जे में लेने का प्रयास किया गया। जिस कारण हरि सिंह ने जम्मू एवं कश्मीर का भारत में विलय करने का निर्णय लिया।

अदालत में वकीलों के बीच तकरार

सुनवाई के दौरान केंद्र की ओर से एजी ने अपनी दलीलों के समर्थन में अदालत को पाकिस्तानी मीडिया रिपोर्ट सौंपनी चाहीं, लेकिन याचिकाकर्ताओं के वकील राजीव धवन ने इसे राजनीतिक दलील कहते हुए इसका विरोध किया। इस पर जम्मू-कश्मीर का प्रतिनिधित्व कर रहे सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा, अनुच्छेद 370 को हटाने को चुनौती देने वाली जम्मू-कश्मीर बार एसोसिएशन के वकील जफर अहमद शाह की अधिकतर दलीलें भी राजनीतिक थीं। ये जो कुछ भी कह रहे हैं, उसका मामले से कोई संबंध नहीं है। अदालत में जम्मू-कश्मीर के अलगाव का समर्थन करने वाली किसी दलील की इजाजत नहीं दी जा सकती। हम गलत को सही करने की कोशिश कर रहे हैं। इस पर धवन ने कहा, पहली बार संविधान के अनुच्छेद 3 का इस्तेमाल करते हुए एक राज्य का दर्जा घटाकर उसे केंद्रशासित प्रदेश बना दिया गया। अगर केंद्र एक राज्य के लिए इसका इस्तेमाल कर सकता है, तो केंद्र किसी भी राज्य के लिए ऐसा कर सकता है।

पुराने फैसले विरोधाभासी, बड़ी बेंच करे सुनवाई

बार की ओर से पेश वकील जफर अहमद शाह ने 1959 के प्रेमनाथ कौल बनाम जम्मू-कश्मीर सरकार और 1970 के संपत प्रकाश बनाम जम्मू-कश्मीर मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का जिक्र किया। उन्होंने कहा, प्रेमनाथ मामले में दिया गया फैसला 25 अक्तूबर, 1947 में दिए गए फैसले से अलग है। इसलिए मामले की सुनवाई पांच सदस्यीय पीठ नहीं कर सकती।

जम्मू-कश्मीर भारतीय संविधान से बाहर नहीं

अटॉर्नी जनरल ने कहा, प्रेमनाथ मामला 370 से जुड़ा नहीं। संपत प्रकाश मामला भी अनुच्छेद 370 कुछ ही प्रावधानों से जुड़ा था। इसलिए मामले को बड़ी बेंच को सौंपने की जरूरत नहीं है। उन्होंने 2017 में संतोष गुप्ता मामले में दिए उस फैसले का हवाला दिया जिसमें कहा गया था कि जम्मू-कश्मीर की संप्रभुता भारत के संविधान के बाहर नहीं है और जम्मू-कश्मीर का संविधान भी कहता था वह भारतीय संविधान के अधीन है।

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