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कैबिनेट विस्तार: सहयोगी दलों के दबाव में नहीं झुकी सरकार, जितना मोदी-शाह ने चाहा उतना ही मिला
Wed, 07 Jul 2021 10:50 PM IST
गौरव पाण्डेय
अमित शर्मा, नई दिल्ली
अमित शर्मा, नई दिल्ली
Published by: गौरव पाण्डेय
Updated Wed, 07 Jul 2021 10:50 PM IST
सार
जनता दल यूनाइटेड, अपना दल (एस), निषाद पार्टी सहित किसी भी सहयोगी दल का दबाव काम नहीं आया।
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जेपी नड्डा, पीएम मोदी और अमित शाह
- फोटो : पीटीआई (फाइल)
विस्तार
मंत्रिमंडल विस्तार के पहले सहयोगी दलों की तरफ से लगातार दबाव की रणनीति अपनाई जा रही थी। सभी दल अपने प्रभाव का उपयोग कर मंत्रिमंडल में अपने लिए ज्यादा से ज्यादा भागीदारी तलाश रहे थे। इसमें जनता दल यूनाइटेड, अपना दल (एस) और निषाद पार्टी सभी शामिल थे। लेकिन मंत्रिमंडल विस्तार की जो अंतिम रूपरेखा सामने आई है, उससे यह समझ आ जाता है कि मंत्रिमंडल विस्तार में सहयोगी दलों की दबाव की रणनीति कामयाब नहीं हुई। सहयोगी दलों को उतना ही मिला है जितना कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने उन्हें देना उपयुक्त समझा।
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बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल (यूनाइटेड) अंतिम क्षणों तक यह दबाव बना रही थी कि उसे मंत्रिमंडल में कम से कम दो कैबिनेट पद और दो राज्य मंत्री का पद मिलना चाहिए। इसके लिए बिहार मॉडल को भी पेश किया जा रहा था। लेकिन इसके बाद भी उसे केवल एक कैबिनेट मंत्री पद से संतुष्ट होना पड़ा है। उसके अध्यक्ष आरसीपी सिंह को कैबिनेट मंत्री के रूप में शपथ दिलाई गई है।
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अपना दल (एस) की नेता अनुप्रिया पटेल को इस बार भी केवल राज्य मंत्री पद से संतुष्ट होना पड़ा है। जबकि 2019 लोकसभा चुनाव के बाद बनने वाले मंत्रिमंडल में केवल इसलिए शामिल नहीं हुईं थीं क्योंकि उनकी पार्टी उनके लिए कैबिनेट पद की मांग कर रही थी। दोनों दलों में बातचीत बिगड़ने का ही परिणाम हुआ कि 2014 में मंत्री बनने के बाद अनुप्रिया पटेल 2019 में मंत्रिमंडल से बाहर हो गईं। अब उन्हें अपने उसी पुराने हिस्से पर सत्ता में वापसी करनी पड़ी है।
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इसी प्रकार निषाद पार्टी के अध्यक्ष संजय निषाद ने भी अपने बेटे प्रवीण निषाद को केंद्रीय मंत्रिमंडल में भागीदारी दिलाने के लिए कड़ी सौदेबाजी कर रहे थे। उनकी भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व से इस मुद्दे पर कई स्तर की बातचीत भी हुई थी। लेकिन पार्टी की तरफ से उन्हें यह साफ कर दिया गया था कि उनकी मांग पूरी नहीं की जा सकती। यही कारण है कि बाद में इसे लेकर उनकी नाराजगी भी सामने आ गई।
चिराग पासवान को दिखाई उनकी हैसियत
यानी उत्तर प्रदेश का महत्त्वपूर्ण चुनाव सामने होने के बाद भी केंद्र सरकार किसी सहयोगी दल के सामने नहीं झुकी। इतना ही नहीं, लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) के अंदर चल रहे घमासान और चिराग पासवान की कोर्ट जाने की धमकी के बाद भी केंद्र सरकार ने लोजपा सांसद पशुपति कुमार पारस को केंद्रीय मंत्रिमंडल में जगह दी। इसे चिराग पासवान को उनकी हैसियत दिखाने की कोशिश के रूप में भी देखा जा सकता है।
केवल सहयोगी दलों ही नहीं, पार्टी के कद्दावर नेताओं के सामने भी पार्टी का केंद्रीय आलाकमान समझौता करता हुआ नहीं दिखाई पड़ा। मेनका गांधी और वरुण गांधी के जैसे बड़े नाम को मंत्रिमंडल में शामिल करने की खूब अटकलें लगाई जा रही थीं, लेकिन इन्हें शामिल नहीं किया गया। इसे भी इसी संकेत के रूप में देखा जा रहा है कि मंत्रिमंडल में केवल उन्हीं चेहरों को जगह मिलेगी जिनकी विचारधारा प्रधानमंत्री की सोच के अनुरूप होगी।
भाजपा के एक केंद्रीय नेता के मुताबिक, केंद्र सरकार केवल और केवल प्रदर्शन में विश्वास रखती है। इस मंत्रिमंडल विस्तार ने यह दिखा दिया है कि अगर आप में काम करने की और परिणाम देने की क्षमता है तो आप कहीं भी हैं, केंद्र सरकार के दरवाजे आपके लिए खुले हैं, लेकिन अगर आप प्रदर्शन नहीं कर सकते तो कोई दबाव काम नहीं आएगा। उन्होंने कहा कि इस नए मंत्रिमंडल से विकास के एक नए युग की शुरुआत होगी।