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जयंती पर विशेष: प्रख्यात गीतकार गोपाल दास नीरज जी चलते-फिरते महाकाव्य थे
Mon, 04 Jan 2021 04:27 AM IST
Kuldeep Singh
ज्ञानेंद्र रावत, नई दिल्ली
ज्ञानेंद्र रावत, नई दिल्ली
Published by: Kuldeep Singh
Updated Mon, 04 Jan 2021 04:27 AM IST
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अखिल भारतीय कवि सम्मेलन में अपनी कविता पढ़ते पद्मभषूण कवि गोपाल दास नीरज
- फोटो : अमर उजाला
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पद्मविभूषण और लगातार तीन बार फिल्मफेयर पुरुस्कारों से सम्मानित प्रख्यात गीतकार गोपाल दास नीरज चलते-फिरते महाकाव्य थे। वह गर्व से कहते थे कि आत्मा का शब्द रूप है काव्य। मानव होना यदि भाग्य है तो कवि होना मेरा सौभाग्य...। मेरी कलम की स्याही और मन के भाव तो मेरी सांसों के साथ ही खत्म होंगे।
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उनका मानना था कि 1965 में आई आई उनकी फिल्म ‘नई उमर की नई फसल’ का गीत कारवां गुजर गया गुबार देखते रहे... और मेरा नाम जोकर फिल्म के गीत ए भाई जरा देख के चलो, आगे ही नहीं पीछे भी... इन दोनों में जीवन का दर्शन छिपा है।
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प्रेम गीतों के लिए ख्यात नीरज जीवन भर प्यार के चक्रव्यूह से निकल नहीं पाये या कहें कि वह प्यार के लिए तरसते रहे। उन्हें प्रशंसकों और जनता ने अपार प्यार और सम्मान दिया, लेकिन उनके अंतस में कहीं न कहीं प्यार की कमी जरूर रही। गीतों में वह पीड़ा अक्सर बाहर आ जाती थी। उनका यह गीत इसका प्रमाण है...देखती ही रहो आज दर्पण न तुम, प्यार का यह मुहूरत निकल जायेगा।
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मुझे गर्व है कि वह मेरे राजकीय इंटर कॉलेज, एटा के छात्र रहे और अक्सर बातचीत में वह इसका उल्लेख भी करते थे। हम सब पूर्व छात्रों ने संजीव यादव के संयोजकत्व में जब 2014 में कॉलेज का शताब्दी समारोह आयोजित किया था, अस्वस्थता के बावजूद वह उसमें आये थे। उस समय छात्रों की मांग पर अपने संस्मरणों और गीतों से मौजूद हजारों छात्रों को उन्होंने सम्मोहित कर दिया था।
उनके बारे में मुझे मेरी मां बताया करती थीं कि बचपन से ही वह भगवान शिव के परम भक्त थे। मैंने अक्सर देखा कि उनका यह गीत ‘इतने बदनाम हुए हम तो इस जमाने में, लगेंगी आपको सदियां हमें भुलाने में, न पीने का सलीका न पिलाने का शऊर, ऐसे भी लोग चले आये हैं मयखाने में’ मुशायरों और कवि सम्मेलनों में बहुत पसंद किया जाता था। एटा जिले और जीआईसी को अपने इस विलक्षण प्रतिभा के धनी सरस्वती पुत्र पर हमेशा गर्व रहेगा। - लेखक वरिष्ठ पत्रकार व पर्यावरणविद हैं