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GM Mustard: जीएम सरसों की खेती पर अस्थायी रोक की मांग पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला सुरक्षित, जानिए क्या है मामला
Thu, 18 Jan 2024 01:32 PM IST
नितिन गौतम
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: नितिन गौतम
Updated Thu, 18 Jan 2024 01:32 PM IST
सार
पीठ ने कहा कि जेनेटिकली मॉडिफाई फसलों का मुद्दा बहुत तकनीकी और वैज्ञानिक है। ऐसे में अदालत उस आधार पर फैसला करेगी कि देश के लिए क्या सही है।
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GM Mustard
- फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को अनुवांशिक रूप से रूपांतरित सरसों (genetically modified Mustard) की खेती पर अस्थायी रोक की मांग वाली याचिका पर सुनवाई पूरी कर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस संजय करोल की पीठ ने गुरुवार को अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमानी, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और वकील प्रशांत भूषण, वकील संजय पारिख के सबमिशन सुने।
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कही ये बात
सर्वोच्च अदालत ने सभी पक्षों को 22 जनवरी तक अपने लिखित सबमिशन देने का निर्देश दिया है। पीठ ने कहा कि जेनेटिकली मॉडिफाई फसलों का मुद्दा बहुत तकनीकी और वैज्ञानिक है। ऐसे में अदालत उस आधार पर फैसला करेगी कि देश के लिए क्या सही है। सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले केंद्र सरकार से सवाल किया था कि कोर्ट द्वारा नियुक्त जीएम फसलों पर बायोसेफ्टी टेक्निकल एक्सपर्ट कमेटी (TEC) की रिपोर्ट पर जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रेजल कमेटी (GEAC)ने ध्यान क्यों नहीं दिया। कोर्ट ने पूछा कि क्या जीईएसी ने 25 अक्तूबर,2022 को अनुवांशिक रूप से रूपांतरित सरसों की हाइब्रिड किस्म डीएमएच-11 की फसल को मंजूरी देने से पहले टीईसी की रिपोर्ट पर विचार किया था?
इस पर केंद्र सरकार की तरफ से पेश हुए अटॉर्नी जनरल ने बताया कि जीईएसी खुद एक संविधानिक निकाय है और जीईएसी को इन रिपोर्ट को देखने की जरूरत नहीं है, लेकिन मंजूरी देने से पहले सभी वैज्ञानिक पहलुओं का ध्यान रखा गया था। सुप्रीम कोर्ट सामाजिक कार्यकर्ता अरुणा रोड्रिगेज और एनजीओ 'जीन कैंपेन' की याचिका पर सुनवाई कर रहा है, जिनमें अनुवांशिक रूप से रूपांतरित सरसों की खेती पर अस्थायी रोक की मांग की गई है।
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क्या है पूरा मामला
उत्पादन बढ़ाने के लिए दुनिया में अनुवांशिक रूप से रूपांतरित फसलों (जेनेटिकली मॉडिफाई) की खेती की जा रही है। दिल्ली यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर और जेनेटिक्स के प्रोफेसर दीपक पेंटल के नेतृत्व में वैज्ञानिकों की एक टीम ने साल 2002 में सरसों की जीएम किस्म डीएमएच-11 को विकसित किया था। इस किस्म को भारत में सरसों की लोकप्रिय प्रजाति 'वरुण' की यूरोपीय सरसों के साथ क्रॉसिंग कराकर विकसित किया गया। इस जीएम सरसों (GM MUstard) की वरुण के मुकाबले 28 फीसदी ज्यादा पैदावार है। ऐसे में दावा किया जा रहा है कि इससे देश के किसानों को फायदा होगा और देश में सरसों के तेल की उपलब्धता भी बढ़ेगी।
हालांकि जीएम सरसों का सामाजिक संगठन और कार्यकर्ता, एनजीओ विरोध कर रहे हैं। इनका कहना है कि जीएम सरसों की खेती को हरी झंडी देने से भारत में खेती पर बुरा असर पड़ेगा। पर्यावरण से जुड़े लोगों का दावा है कि जीएम सरसों में थर्ड बार जीन मौजूद है, जिसकी वजह से इस पर ग्लूफोसिनेट अमोनियम का असर नहीं होगा। इसके चलते केमिकल हार्बिसाइड्स का इस्तेमाल बढ़ेगा, जिससे देश में पौधों की कई किस्मों को नुकसान हो सकता है। साथ ही जीएम मस्टर्ड के इस्तेमाल से मधुमक्खियों पर भी बुरा असर पड़ेगा। मधुमक्खियां भी शहद बनाने के लिए सरसों के फूलों पर काफी निर्भर होती हैं। यही वजह है कि इस पर अस्थायी रोक की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी।
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सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कही ये बात
सर्वोच्च अदालत ने सभी पक्षों को 22 जनवरी तक अपने लिखित सबमिशन देने का निर्देश दिया है। पीठ ने कहा कि जेनेटिकली मॉडिफाई फसलों का मुद्दा बहुत तकनीकी और वैज्ञानिक है। ऐसे में अदालत उस आधार पर फैसला करेगी कि देश के लिए क्या सही है। सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले केंद्र सरकार से सवाल किया था कि कोर्ट द्वारा नियुक्त जीएम फसलों पर बायोसेफ्टी टेक्निकल एक्सपर्ट कमेटी (TEC) की रिपोर्ट पर जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रेजल कमेटी (GEAC)ने ध्यान क्यों नहीं दिया। कोर्ट ने पूछा कि क्या जीईएसी ने 25 अक्तूबर,2022 को अनुवांशिक रूप से रूपांतरित सरसों की हाइब्रिड किस्म डीएमएच-11 की फसल को मंजूरी देने से पहले टीईसी की रिपोर्ट पर विचार किया था?
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इस पर केंद्र सरकार की तरफ से पेश हुए अटॉर्नी जनरल ने बताया कि जीईएसी खुद एक संविधानिक निकाय है और जीईएसी को इन रिपोर्ट को देखने की जरूरत नहीं है, लेकिन मंजूरी देने से पहले सभी वैज्ञानिक पहलुओं का ध्यान रखा गया था। सुप्रीम कोर्ट सामाजिक कार्यकर्ता अरुणा रोड्रिगेज और एनजीओ 'जीन कैंपेन' की याचिका पर सुनवाई कर रहा है, जिनमें अनुवांशिक रूप से रूपांतरित सरसों की खेती पर अस्थायी रोक की मांग की गई है।
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क्या है पूरा मामला
उत्पादन बढ़ाने के लिए दुनिया में अनुवांशिक रूप से रूपांतरित फसलों (जेनेटिकली मॉडिफाई) की खेती की जा रही है। दिल्ली यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर और जेनेटिक्स के प्रोफेसर दीपक पेंटल के नेतृत्व में वैज्ञानिकों की एक टीम ने साल 2002 में सरसों की जीएम किस्म डीएमएच-11 को विकसित किया था। इस किस्म को भारत में सरसों की लोकप्रिय प्रजाति 'वरुण' की यूरोपीय सरसों के साथ क्रॉसिंग कराकर विकसित किया गया। इस जीएम सरसों (GM MUstard) की वरुण के मुकाबले 28 फीसदी ज्यादा पैदावार है। ऐसे में दावा किया जा रहा है कि इससे देश के किसानों को फायदा होगा और देश में सरसों के तेल की उपलब्धता भी बढ़ेगी।
हालांकि जीएम सरसों का सामाजिक संगठन और कार्यकर्ता, एनजीओ विरोध कर रहे हैं। इनका कहना है कि जीएम सरसों की खेती को हरी झंडी देने से भारत में खेती पर बुरा असर पड़ेगा। पर्यावरण से जुड़े लोगों का दावा है कि जीएम सरसों में थर्ड बार जीन मौजूद है, जिसकी वजह से इस पर ग्लूफोसिनेट अमोनियम का असर नहीं होगा। इसके चलते केमिकल हार्बिसाइड्स का इस्तेमाल बढ़ेगा, जिससे देश में पौधों की कई किस्मों को नुकसान हो सकता है। साथ ही जीएम मस्टर्ड के इस्तेमाल से मधुमक्खियों पर भी बुरा असर पड़ेगा। मधुमक्खियां भी शहद बनाने के लिए सरसों के फूलों पर काफी निर्भर होती हैं। यही वजह है कि इस पर अस्थायी रोक की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी।