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लोकसभा चुनाव 2019: जातीय समीकरणों के बीच बेगूसराय में गिरिराज बनाम कन्हैया की जंग कितनी बड़ी है?
Sun, 24 Mar 2019 02:55 PM IST
Prabudhh Jain
बीबीसी हिंदी
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Published by: Prabudhh Jain
Updated Sun, 24 Mar 2019 02:55 PM IST
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गिरिराज सिंह और कन्हैया कुमार
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बिहार में सीपीआई (माले) ने बेगूसराय सीट पर सीपीआई उम्मीदवार कन्हैया कुमार को अपना समर्थन देने की घोषणा की है। इससे पहले बेगूसराय में शनिवार को सीपीआई के स्टेट कैबिनेट की बैठक हुई, जिसमें प्रदेश सचिव सत्यनारायण सिंह सहित बड़े अधिकारी मौजूद थे। यह बैठक करीब पांच घंटों तक चली, जिसमें यह तय किया गया कि कन्हैया कुमार को ही सीपीआई अपना उम्मीदवार बनाएगी। वहीं अन्य लेफ्ट पार्टियां सीपीआई (माले) और सीपीएम भी उन्हें अपना समर्थन देगी।
इन बैठकों के बाद अब यह स्पष्ट हो गया है कि यहां एनडीए के उम्मीदवार गिरिराज सिंह के सामने कन्हैया कुमार और महागठबंधन से राजद उम्मीदवार होंगे। गिरिराज सिंह जहां 'कट्टर मोदी समर्थक' हैं तो दूसरी तरफ कन्हैया कुमार 'घोर मोदी विरोधी'। एक हिंदू राष्ट्रवाद की बात करते हैं और विरोधियों को पाकिस्तान भेजने की सलाह देते हैं तो दूसरी तरफ दूसरे पक्ष पर देशद्रोह के आरोप लग चुके हैं और वो सत्ता पक्ष को फ़ासीवादी ताकत करार देते हैं।
इन दोनों के बीच की लड़ाई की संभावना के बाद बेगूसराय सीट अब लोकसभा चुनावों की 'हॉट सीट' बन चुकी है, जिस पर देश भर की नजरें होंगी। रामधारी सिंह दिनकर की यह भूमि वामपंथ का गढ रहा है, जहां यह न सिर्फ जन्मा, बल्कि इसका विकास हुआ और वो चरम पर भी पहुंचा।
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बिहार विधानसभा के पहले कम्युनिस्ट विधायक यहीं से हुए हैं। उनका नाम चंद्रशेखर सिंह था। यह मुख्य रूप से सीपीआई का गढ़ रहा है। यह भी सच है कि बेगूसराय में वामपंथ का विकास भूमिहारों के नेतृत्व में हुआ और वही इनके कर्ताधर्ता भी रहे हैं, लेकिन पिछले कुछ दशकों में वामपंथ की पकड यहां कमजोर हुई है। भूमिहारों का एक वर्ग अब भी सीपीआई के साथ है लेकिन इसका बड़ा वर्ग अब बीजेपी की तरफ रुख कर चुका है।
राजनीतिक नजरिए से भूमिहार समाज यहां निर्णायक भूमिका में होता है। कन्हैया कुमार और गिरिराज सिंह, दोनों इसी समाज से आते हैं। हालांकि दूसरी जातियों की भी स्थितियां बहुत बुरी नहीं हैं। महागठबंधन ने जिस तरह का समीकरण तैयार किया है, उसमें अगर मुस्लिम और हिंदुओं की अन्य जातियां एक साथ आती हैं तो मुकाबले की तस्वीर बदल सकती है।
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इन बैठकों के बाद अब यह स्पष्ट हो गया है कि यहां एनडीए के उम्मीदवार गिरिराज सिंह के सामने कन्हैया कुमार और महागठबंधन से राजद उम्मीदवार होंगे। गिरिराज सिंह जहां 'कट्टर मोदी समर्थक' हैं तो दूसरी तरफ कन्हैया कुमार 'घोर मोदी विरोधी'। एक हिंदू राष्ट्रवाद की बात करते हैं और विरोधियों को पाकिस्तान भेजने की सलाह देते हैं तो दूसरी तरफ दूसरे पक्ष पर देशद्रोह के आरोप लग चुके हैं और वो सत्ता पक्ष को फ़ासीवादी ताकत करार देते हैं।
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इन दोनों के बीच की लड़ाई की संभावना के बाद बेगूसराय सीट अब लोकसभा चुनावों की 'हॉट सीट' बन चुकी है, जिस पर देश भर की नजरें होंगी। रामधारी सिंह दिनकर की यह भूमि वामपंथ का गढ रहा है, जहां यह न सिर्फ जन्मा, बल्कि इसका विकास हुआ और वो चरम पर भी पहुंचा।
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बिहार विधानसभा के पहले कम्युनिस्ट विधायक यहीं से हुए हैं। उनका नाम चंद्रशेखर सिंह था। यह मुख्य रूप से सीपीआई का गढ़ रहा है। यह भी सच है कि बेगूसराय में वामपंथ का विकास भूमिहारों के नेतृत्व में हुआ और वही इनके कर्ताधर्ता भी रहे हैं, लेकिन पिछले कुछ दशकों में वामपंथ की पकड यहां कमजोर हुई है। भूमिहारों का एक वर्ग अब भी सीपीआई के साथ है लेकिन इसका बड़ा वर्ग अब बीजेपी की तरफ रुख कर चुका है।
राजनीतिक नजरिए से भूमिहार समाज यहां निर्णायक भूमिका में होता है। कन्हैया कुमार और गिरिराज सिंह, दोनों इसी समाज से आते हैं। हालांकि दूसरी जातियों की भी स्थितियां बहुत बुरी नहीं हैं। महागठबंधन ने जिस तरह का समीकरण तैयार किया है, उसमें अगर मुस्लिम और हिंदुओं की अन्य जातियां एक साथ आती हैं तो मुकाबले की तस्वीर बदल सकती है।
जाति आधारित जनसंख्या क्या है, इससे जुड़ा कोई आधिकारिक आंकड़ा तो नहीं है, लेकिन पार्टियां जिन अनुमानित आंकड़ों का इस्तेमाल करती हैं, उसके मुताबिक बेगूसराय लोकसभा सीट में भूमिहारों की संख्या करीब 4.75 लाख है। वहीं मुसलमानों की जनसंख्या 2.5 लाख, कुर्मी-कुशवाहा की दो लाख और यादवों की संख्या करीब 1.5 लाख है। जाति आधारित ये आंकड़े दर्शाते हैं कि यहां की राजनीति भूमिहार समाज के इर्द-गिर्द घूमती रही है। पिछले दस लोकसभा चुनावों में से नौ के विजयी उम्मीदवार इसी समाज से रहे हैं। हालांकि उनकी पार्टियां जरूर अलग-अलग रही हैं।
1980 से 2014 के बीच बेगूसराय सीट पर दस बार लोकसभा चुनाव हो चुके हैं। सिर्फ 2009 के चुनावों में ऐसा मौका आया जब बेगूसराय को एक मुस्लिम सांसद मिला। ये सांसद थे नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल यूनाइटेड से डॉ. मुनाजिर हसन। 2014 के लोकसभा चुनावों में बेगूसराय की सीट भाजपा के खाते में गई थी। भाजपा के भोला सिंह को करीब 4.28 लाख वोट मिले थे, वहीं राजद के तनवीर हसन को 3.70 लाख वोट मिले थे। दोनों में करीब 58 हजार वोटों का अंतर था। वहीं सीपीआई के राजेंद्र प्रसाद सिंह को करीब 1.92 लाख वोट ही मिले थे।
"दूसरी बात यह है कि यहां जाति आधारित मतदान का चलन रहा है। ऐसे में राजद और सीपीआई का वोट बैंक बिल्कुल अलग-अलग हैं।"
वहीं राजनीतिक विश्लेषक प्रोफेसर नवल किशोर चौधरी का भी मानना है कि वामपंथी पार्टियों का साथ आना वामपंथ समर्थकों के लिए अच्छी खबर तो जरूर है, लेकिन यह बेगूसराय सीट पर बहुत कमाल नहीं दिखा पाएगा। वो कहते हैं, "बेगूसराय में सीपीआई (माले) और सीपीएम का बहुत आधार नहीं है। वहां मुख्य रूप से सीपीआई की ही पैठ है।"
1980 से 2014 के बीच बेगूसराय सीट पर दस बार लोकसभा चुनाव हो चुके हैं। सिर्फ 2009 के चुनावों में ऐसा मौका आया जब बेगूसराय को एक मुस्लिम सांसद मिला। ये सांसद थे नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल यूनाइटेड से डॉ. मुनाजिर हसन। 2014 के लोकसभा चुनावों में बेगूसराय की सीट भाजपा के खाते में गई थी। भाजपा के भोला सिंह को करीब 4.28 लाख वोट मिले थे, वहीं राजद के तनवीर हसन को 3.70 लाख वोट मिले थे। दोनों में करीब 58 हजार वोटों का अंतर था। वहीं सीपीआई के राजेंद्र प्रसाद सिंह को करीब 1.92 लाख वोट ही मिले थे।
कन्हैया का रास्ता आसान होगा?
इन राजनीतिक और जातिगत समीकरण के बीच बेगूसराय का मुकाबला कैसा होगा? इस सवाल के जवाब में बेगूसराय के वरिष्ठ पत्रकार कुमार भावेश कहते हैं, "वाम पार्टियों के साथ आने से बहुत फर्क तो नहीं पड़ेगा क्योंकि सीपीआई के अलावा अन्य दो पार्टियों का यहां बहुत मजबूत आधार नहीं है।""दूसरी बात यह है कि यहां जाति आधारित मतदान का चलन रहा है। ऐसे में राजद और सीपीआई का वोट बैंक बिल्कुल अलग-अलग हैं।"
वहीं राजनीतिक विश्लेषक प्रोफेसर नवल किशोर चौधरी का भी मानना है कि वामपंथी पार्टियों का साथ आना वामपंथ समर्थकों के लिए अच्छी खबर तो जरूर है, लेकिन यह बेगूसराय सीट पर बहुत कमाल नहीं दिखा पाएगा। वो कहते हैं, "बेगूसराय में सीपीआई (माले) और सीपीएम का बहुत आधार नहीं है। वहां मुख्य रूप से सीपीआई की ही पैठ है।"
कैसी होगी लड़ाई?
अभी तक की स्थितियों के मुताबिक फिलहाल लड़ाई त्रिकोणीय नजर आ रही है- गिरिराज सिंह बनाम राजद उम्मीदवार बनाम कन्हैया। हालांकि विश्लेषक यह मान रहे हैं कि अंतिम लड़ाई 'मोदी बनाम एंटी मोदी' की ही होगी।कुमार भावेश कहते हैं, "बेगूसराय की लड़ाई मोदी बनाम एंटी मोदी की होगी। ऐसे में जनता के मोदी के खिलाफ जाने के दो विकल्प होंगे। पहला राजद उम्मीदवार और दूसरा कन्हैया। वो कहते हैं, "जैसा कि सीपीआई के प्रदेश सचिव ने कहा है कि महागठबंधन के साथ बातचीत के दरवाज़े बंद नहीं हुए हैं। ऐसे में फिलहाल कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी।"
वहीं प्रोफेसर चौधरी भी मानते हैं कि अगर स्थितियां नहीं बदलीं तो अंत में मामला मोदी बनाम एंटी मोदी का होगा। ऐसे में कन्हैया कुमार दौड में पीछे छूट सकते हैं। और अगर महागठबंधन कन्हैया पर हामी भर देता है तो जाहिर सी बात है मुकाबला अत्यंत रोचक हो जाएगा। यह तो तय है कि बेगूसराय की सीट हॉट सीट साबित होने वाली है और आने वाले समय में चुनावों में राष्ट्रप्रेम और राष्ट्रद्रोह का मामला यहां चुनावी सभाओं में जमकर उठाया जाएगा।