G20 Summit: चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग का भारत नहीं आना तय, ये हैं इसके कूटनीतिक मायने
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विस्तार
चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग जी-20 शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए भारत नहीं आएंगे। उनके स्थान पर चीन का प्रतिनिधित्व ली छ्यांग करेंगे। ऐसा करके प्रधानमंत्री के निमंत्रण के अलावा शी जिनपिंग ने अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन की स्नेह से भरी उम्मीद पर पानी फेर दिया है। बाइडन ने उनसे जी-20 सम्मेलन में भारत आने की अपील की थी। हालांकि शी के न आने से विदेश मंत्री एस जयशंकर और भारत के माथे पर शिकन की कोई लकीर नहीं है। माना जा रहा है कि नई दिल्ली न आने के शी जिनपिंग के फैसले के पीछे अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन का वियतनाम का दौरा भी हो सकता है।
चीन अपने पड़ोसी देश वियतनाम के अमेरिका से रिश्ते को नापसंद करता रहा है। उसे भारत के साथ वियतनाम के रिश्ते पर भी ऐतराज रहता है। अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन चीन के राष्ट्रपति की नापसंदगी की परवाह किए बिना 10 सितंबर को नई दिल्ली से हनोई (वियतनाम की राजधानी) के लिए रवाना हो जाएंगे। 07 सितंबर को वह दिल्ली पहुंचेंगे। 08 सितंबर को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के आपसी हितों, क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर द्विपक्षीय चर्चा करेंगे। 09-10 को जी-20 के सदस्य देशों के राष्ट्राध्यक्षों का शिखर सम्मेलन तय है। उसमें हिस्सा लेंगे। 10 सितंबर को उनका जहाज इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से हनोई के लिए उड़ान भरेगा। वहां जो बाइडन, महासचिव गुयेन फु ट्रोंग और अन्य वियतनामी नेताओं से मिलेंगे। इसलिए शी जिनपिंग की निगाह नई दिल्ली से लेकर हनोई तक के रूट पर टिकी रहेगी। याद रहे कि 11 सितंबर को अमेरिका के ट्विन टावर पर आतंकियों ने हमले किए थे। इस हमले की 22 वीं बरसी है। इसलिए जो बाइडन एक दिन हनोई में रुकने के बाद 11 सितंबर को अलास्का में रूकेंगे।
भारत समेत इन देशों को है चीन के नए नक्शे से ऐतराज
कूटनीति के जानकार मानते हैं कि शी जिनपिंग ने अपने देश का नया नक्शा ऐसे समय में यूं ही नहीं जारी कराया था। चीन के नए नक्शे में कई देशों की सीमाओं का उल्लंघन है। चीन ने केवल भारत के अरुणाचल समेत कुछ इलाकों को ही अपने नये नक्शे में नहीं दिखाया है। इसको लेकर मलयेशिया, फिलीपींस, विएतनाम को भी कड़ी आपत्ति है। इस समय को निश्चित रूप से अमेरिका के राष्ट्रपति के विएतनाम दौरे से जोड़कर देखना चाहिए। इसके अलावा एशिया और चीन के पड़ोसी देश अब न केवल दक्षिण चीन सागर, बल्कि चीन की बहुप्रतीक्षित महात्वाकांक्षी रिंग ऑफ पर्ल को भी लेकर सवाल उठाने लगे हैं। चीन की विस्तारवादी नीति को लेकर भारत की चिंताएं कुछ ज्यादा ही गंभीर हैं।
भारतीय विदेश मंत्रालय ने ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान ही कहा था कि उसके पास चीन के राष्ट्रपति की द्विपक्षीय वार्ता की पेशकश लंबित है। यह सूचना जोहान्सबर्ग में प्रधानमंत्री मोदी और शी जिनपिंग की भेंट के बाद आया था। लेकिन कहा जा रहा है कि जिस तरह से चीन की सेना लद्दाख क्षेत्र में जमी है और सीमा विवाद के निबटारे की दिशा में गतिरोध बना हुआ है, ऐसे में भारत और चीन के शिखर नेता के बीच द्विपक्षीय चर्चा, संयुक्त वक्तव्य की स्थिति बहुत सामान्य बात नहीं है। इसका एक प्रमुख कारण चीन का डेपसांग, डेमचोक जैसे सामरिक स्थानों पर चर्चा से मुंह चुराना भी है।
हालांकि भारतीय सामरिक, रणनीतिक और अर्थव्यवस्था के जानकारों का कहना है कि दुनिया में जिओपालिटिक्स के करवट लेने से चीन की अर्थव्यवस्था को तगड़ा झटका लग रहा है। उसकी वृद्धि दर प्रभावित हो रही है। बेरोजगारी बढ़ रही है और सकल घरेलू उत्पाद, निर्यात आदि पर गंभीर असर पड़ रहा है। इससे जनता में नाराजगी बढ़ रही है। इसलिए चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने तमाम चुनौतियों को देखते हुए जी-20 में न आने का फैसला किया होगा।