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शोध: मां बनने के बाद महीनों बीमारी झेलतीं चार करोड़ महिलाएं, एक-तिहाई को पीठ के निचले हिस्से में रहता है दर्द
Sun, 10 Dec 2023 05:58 AM IST
यशोधन शर्मा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: यशोधन शर्मा
Updated Sun, 10 Dec 2023 05:58 AM IST
सार
अन्य स्वास्थ्य समस्याओं में बार-बार पेशाब आना (8-31 फीसदी), बेचैनी (9-24 फीसदी), अवसाद (11-17 फीसदी) व पेट के निचले हिस्से में दर्द (11 फीसदी) शामिल हैं। शोधकर्ताओं की अंतरराष्ट्रीय टीम का कहना है कि ये समस्याएं आम तौर पर महिलाओं को प्रसवोत्तर स्वास्थ्य देखभाल के बावजूद सामने आती हैं।
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Women health
- फोटो : Women health
विस्तार
दुनियाभर में हर साल कम से कम चार करोड़ महिलाएं मां बनने के बाद किसी न किसी तरह की स्वास्थ्य समस्या का सामना करती हैं। द लांसेट ग्लोबल हेल्थ जर्नल में प्रकाशित एक नए शोध के मुताबिक, इनमें से 32 फीसदी को काफी समय तक पीठ के निचले हिस्से में दर्द रहता है।
शोध में पाया गया कि प्रसव के बाद महिलाओं को होने वाली इस तरह की छोटी-मोटी बीमारियां कभी महीनों सताती हैं तो कभी सालों तक पीछा नहीं छोड़तीं। शोधकर्ताओं के मुताबिक, सबसे ज्यादा महिलाओं (35 फीसदी) को प्रसव बाद सेक्स के दौरान या बाद में दर्द यानी डायस्पेरियुनिया की समस्या आती है।
अन्य स्वास्थ्य समस्याओं में बार-बार पेशाब आना (8-31 फीसदी), बेचैनी (9-24 फीसदी), अवसाद (11-17 फीसदी) व पेट के निचले हिस्से में दर्द (11 फीसदी) शामिल हैं। शोधकर्ताओं की अंतरराष्ट्रीय टीम का कहना है कि ये समस्याएं आम तौर पर महिलाओं को प्रसवोत्तर स्वास्थ्य देखभाल के बावजूद सामने आती हैं।
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सामान्य बीमारियों पर ध्यान देना जरूरी
शोधकर्ताओं का सुझाव है कि गर्भावस्था और बच्चे के जन्म के दौरान ही महिलाओं की स्वास्थ्य देखभाल इस तरह से होनी चाहिए कि उन्हें आगे चलकर ऐसी समस्याएं न झेलनी पड़ें।
प्रसव के बाद कई स्थितियां शारीरिक पीड़ा के तौर पर महिलाओं की दिनचर्या प्रभावित करती हैं। लेकिन कोई महत्व नहीं दिया जाता। कई बार तो नजरअंदाज कर दिया जाता है।
गरीब देशों में स्थिति और भी खराब
शोध के मुताबिक, गरीब देशों में यह समस्या और भी ज्यादा हो सकती है, खासकर जहां मातृ-मृत्यु दर अधिक है। 12 वर्षों से अधिक शोध समीक्षा में पाया गया कि उसकी तरफ से निर्धारित 32 प्राथमिकता वाली स्थितियों में 40 फीसदी पर भी ठीक से अमल नहीं होता।
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शोध में पाया गया कि प्रसव के बाद महिलाओं को होने वाली इस तरह की छोटी-मोटी बीमारियां कभी महीनों सताती हैं तो कभी सालों तक पीछा नहीं छोड़तीं। शोधकर्ताओं के मुताबिक, सबसे ज्यादा महिलाओं (35 फीसदी) को प्रसव बाद सेक्स के दौरान या बाद में दर्द यानी डायस्पेरियुनिया की समस्या आती है।
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अन्य स्वास्थ्य समस्याओं में बार-बार पेशाब आना (8-31 फीसदी), बेचैनी (9-24 फीसदी), अवसाद (11-17 फीसदी) व पेट के निचले हिस्से में दर्द (11 फीसदी) शामिल हैं। शोधकर्ताओं की अंतरराष्ट्रीय टीम का कहना है कि ये समस्याएं आम तौर पर महिलाओं को प्रसवोत्तर स्वास्थ्य देखभाल के बावजूद सामने आती हैं।
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सामान्य बीमारियों पर ध्यान देना जरूरी
शोधकर्ताओं का सुझाव है कि गर्भावस्था और बच्चे के जन्म के दौरान ही महिलाओं की स्वास्थ्य देखभाल इस तरह से होनी चाहिए कि उन्हें आगे चलकर ऐसी समस्याएं न झेलनी पड़ें।
प्रसव के बाद कई स्थितियां शारीरिक पीड़ा के तौर पर महिलाओं की दिनचर्या प्रभावित करती हैं। लेकिन कोई महत्व नहीं दिया जाता। कई बार तो नजरअंदाज कर दिया जाता है।
गरीब देशों में स्थिति और भी खराब
शोध के मुताबिक, गरीब देशों में यह समस्या और भी ज्यादा हो सकती है, खासकर जहां मातृ-मृत्यु दर अधिक है। 12 वर्षों से अधिक शोध समीक्षा में पाया गया कि उसकी तरफ से निर्धारित 32 प्राथमिकता वाली स्थितियों में 40 फीसदी पर भी ठीक से अमल नहीं होता।