यादें जो हमेशा रहेंगी अटल
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बात 1997 की है जब मैं लखनऊ में नवभारत टाइम्स का राज्य संवाददाता था और अटल बिहारी वाजपेयी 13 दिन के लिए भारत के प्रधानमंत्री बनकर सत्ता से उतर चुके थे। लेकिन लखनऊ के सांसद होने के कारण उनका अक्सर लखनऊ आना जाना होता रहता था। इसलिए जब भी वह लखनऊ होते तो या तो लालजी टंडन या वाजपेयी के बेहद नज़दीक रहने वाले विधान परिषद सदस्य और मौजूदा सांसद राजेश पांडे गुड्डू भइया के साथ अटल जी से हम पत्रकारों की अक्सर अनौपचारिक मुलाकात होती रहती थी। खूब गपशप होती।
अटल जी से मिलना अपने आप में एक बेहद आनंददायक अनुभव होता था। उन्हीं दिनों जब छह-छह महीने के मुख्यमंत्री पद का बसपा और भाजपा के बीच समझौता हुआ और जब मायावती ने अपना छह महीने का कार्यकाल पूरा होने के बाद बेहद भारी मन से भाजपा के कल्याण सिंह को मुख्यमंत्री माना, लेकिन एक महीने के बाद अचानक बसपा ने समर्थन वापस लेकर कल्याण सिंह सरकार को संकट में डाल दिया। तब सरकार के संकट मोचक तत्कालीन भाजपा प्रदेश अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने कांग्रेस और बसपा के करीब 45 विधायकों का समर्थन जुटाकर सरकार बचा ली।
एवज में कांग्रेस और बसपा तोड़कर बनी नरेश अग्रवाल के नेतृत्व वाली लोकतांत्रिक कांग्रेस और नरेंद्र सिंह की अगुआई में बनी जनबसपा के सभी विधायकों को मंत्री बनाना पड़ा जिनमे कई विधायक दागी और अपराधिक रिकार्ड वाले थे। इन दागी मंत्रियों का जब शपथग्रहण राजभवन के मैदान में हुआ तब अटल बिहारी वाजपेयी भी अन्य भाजपा नेताओं के साथ उपस्थित थे। शपथ लेने वाले एक मंत्री के खिलाफ तब हत्या के एक मामले में गिरफ्तारी वारंट भी था।
इसे लेकर मैंने बेहद आलोचनात्मक खबर और विश्लेषण लिखा। जिसमें वाजपेयी के संसद के स्वर्ण जयंती सत्र में राजनीति के अपराधीकरण के खिलाफ दिए गए उनके शानदार भाषण का उल्लेख करते हुए लखनऊ में भाजपा सरकार में दागी और अपराधिक रिकार्ड वाले मंत्रियों के शपथ ग्रहण पर टिप्पणी थी। खबर छपने के कुछ दिन बाद मैं अटल जी से मिलने राज्य अतिथि गृह पहुंचा। दोपहर का वक्त था। मैं अकेला ही गुड्डू पांडे के साथ अटल जी के पास गया था। नमस्ते करने के बाद पास में ही बैठ गया। अपनी चिर परिचित मुद्रा में अटल शांत मुद्रा में बैठे थे।
कुछ क्षणों के बाद गुड्डू ने मेरा नाम लेकर उन्हें जगाने की कोशिश की। उन्होंने आंखे खोली, मुस्कुराए और बोले जानता हूं पंडित जी को। लेकिन यार चिकोटी तक तो ठीक है, कभी-कभी जोर से नोच भी लेते हो। इशारा साफ था लेकिन अंदाज इतना सहज था कि पहले खुद अटल और फिर सभी हंस पड़े। फिर बोले अरे भाई कहासुनी तो होती रहेगी पंडित जी को कुछ खिलाओ पिलाओ। माहौल और सहज हो गया और काफी देर तक चर्चा होती रही।
एक और किस्सा याद आ रहा है। 1996 के लोकसभा चुनाव घोषित हो चुके थे। भाजपा अपने गठबंधन के सहयोगी तलाश रही थी। 1992 की बाबरी मस्जिद विध्वंस की घटना के बाद भाजपा के साथ गठबंधन करने से शिवसेना और अकाली दल को छोड़कर अन्य दल संकोच में थे। इसलिए भाजपा के लिए नए सहयोगी तलाशने और जोड़ने की जिम्मेदारी अटल बिहारी वाजपेयी ही संभाल रहे थे, क्योंकि अयोध्या कांड के बाद लाल कृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी की छवि कट्टर हिंदुत्ववादी बन चुकी थी।
लखनऊ प्रेस क्लब में अटल बिहारी वाजपेयी पत्रकार मिलन आयोजित किया गया। औपचारिक संवाददाता सम्मेलन के बाद अटल जी के साथ हम कुछ पत्रकार खाने की मेज पर बैठ गए। अब पूरी बातचीत अनौपचारिक और ऑफ द रिकार्ड थी। किसी ने पूछा कि भाजपा के साथ कौन से नए दल आ सकते हैं। अटल जी मुस्कुराए फिर आंख का इशारा करके शरारत से बोले समता से तो बात पक्की है ममता से इशारे हो रहे हैं। सुनते ही सब ठहाका लगा कर हंस पड़े।
एक और किस्सा। अटल बिहारी वाजपेयी 1996 में प्रधानमंत्री बन चुके थे। पूरे लखनऊ में जबर्दस्त खुशी और जोश था। प्रधानमंत्री की शपथ लेने के बाद वाजपेयी सबसे पहले लखनऊ आए। राजभवन में रुके थे। ला मार्टिनीयर ग्राउंड में उनकी जनसभा हुई। इसके बाद राजभवन में प्रेस कांफ्रेंस थी। सारे पत्रकार वहां पहुंचे। आम तौर पर अटल जी से लखनऊ के पत्रकार बेरोकटोक मिला करते थे और उनके सुरक्षाकर्मी भी हम लोगों को पहचानते थे। इसलिए कोई टोका टोकी नहीं होती थी। लेकिन अब माजरा बदल चुका था।
वाजपेयी प्रधानमंत्री थे और सुरक्षा व्यवस्था एसपीजी की थी। हर पत्रकार की तलाशी ली गई। आई कार्ड जांचे परखे गए तब जाने दिया गया। अंदर जाकर जब सब बैठ गए और वाजपेयी ने आकर सबसे नमस्कार किया और हालचाल पूछा तो एक बुजुर्ग पत्रकार बिफर पड़े। बोले अटल जी इतना अपमान तो जीवन में कभी नहीं हुआ जितना आज आपके पास आने के लिए सहना पड़ा। अटल जी समझ गए। फौरन नहले पर दहला मारते हुए बोले आप लोगों को मेरे एमपी होने भर से संतोष नहीं था तो पीएम बना दिया अब भुगतो। सारा हॉल ठहाकों से गूंज उठा और माहौल सहज हो गया।
एक बार प्रधानमंत्री निवास में एक सांस्कृतिक कार्यक्रम था। मैं दिल्ली आ चुका था और इनटीवी का कार्यकारी संपादक था। प्रसिद्ध पत्रकार और साहित्यकार कन्हैयालाल नंदन मेरे प्रधान संपादक थे। नंदन जी के साथ मैं उस कार्यक्रम में गया। उनके विशिष्टजन, मंत्रीगण मौजूद थे। नंदन जी अगली पंक्ति में थे और मैं दूसरी पंक्ति में बैठा था। जब पूरा कक्ष भर गया तब प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का आगमन हुआ।
उनके अंदर आते ही सारे लोग खड़े हो गए और अभिवादन करने लगे। लेकिन अटल जी सीधे नंदन जी के पास आए और दोनों हाथ जोड़कर बोले नंदन जी को मेरा नमस्कार है। नंदन जी ने फौरन झुक कर वाजपेयी के दोनों हाथ अपने हाथों में लेकर कहा मैं आपको नमन करता हूं। दोनों कुछ क्षण एक दूसरे का हाथ पकड़े खड़े रहे। पूरा हाल यह देख रहा था। यह था पुराने संबंधों के प्रति वाजपेयी का अटल प्रेम।
इसी तरह एक और यादगार किस्सा अटल जी के साथ। 1994-95 की बात होगी। गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर लाल किले के प्रांगण में हर वर्ष होने वाला मशहूर कवि सम्मेलन चल रहा था। मंच पर अटल बिहारी वाजपेयी, मुरली मनोहर जोशी और दिल्ली के तत्कालीन मुख्यमंत्री मदनलाल खुराना कवियों के साथ उपस्थित थे। वीर रस के जाने माने कवि हरिओम पंवार उस समय की अपनी चर्चित कविता जो उन्होंने अयोध्या के राम मंदिर आंदोलन को लेकर लिखी थी, पढ़ने लगे।
कविता में भाजपा और विहिप के मंदिर आंदोलन की जमकर खबर ली गई थी और राम की बाबर से तुलना करने, राम नाम के चुनावी इस्तेमाल और राजनीति में पंडो और इमामों के वर्चस्व पर कई कटाक्ष थे। कुछ देर बाद श्रोताओं में जिनमें ज्यादातर भाजपा के कार्यकर्ता थे, विरोध शुरू हो गया। कुछ बजरंग दल के कार्यकर्ता भी वहां मौजूद थे, वो कुछ ज्यादा ही उग्र होने लगे। पंवार भी जिद्दी और डटे रहने वाले कवि थे।
उन्होंने मंच से ही कहा कि बुलाया गया हूं इसलिए आया हूं और पूरी कविता सुनाकर जाऊंगा। साथ ही पंवार ने उलाहना देते हुए कहा कि जिस मंच पर अटल जी जैसे कवि स्वंय मौजूद हों वहां कवि और कविता का ऐसा विरोध कैसे हो सकता है। इतना सुनते ही अटल जी ने माइक संभाला और कहा कि हरिओम पंवार अपनी पूरी कविता सुनाएंगे और हम सब शांति से सुनेंगे। जिन्हें न सुनना हो वो बाहर जाने के लिए स्वतंत्र हैं। इनके बाद मैं भी कविता पढूंगा।
इतना सुनते ही पंडाल में खामोशी छा गई और हरिओम पंवार ने पूरी कविता सुनाई। उसके बाद अटल जी ने अपनी कविता पढ़ी आओ फिर से दिया जलाएं। आओ मिलकर दिया जलाएं। लेकिन कविता बहुत पहले लिखी गई थी, इसलिए दो तीन पंक्तियों के बाद वह भूलने लगे और बार-बार दोहराने लगे आओ फिर से दिया जलाएं। तब श्रोताओं में से किसी ने मजाक किया कि अटल जी अब तो कमल खिलाने की बात कहिये दिया तो जनसंघ के जमाने में जलता था। अटल जी समेत पूरा पंडाला ठहाके लगाकर हंस पड़ा। इसके बाद अटल जी जोश में आए और उन्होंने अपनी स्मृति पर जोर डालते हुए पूरी कविता पढ़ी।
इसी तरह के कई सारे संस्मरण अटल बिहारी वाजपेयी के साथ हैं। जिनका भी उनसे थोड़ा बहुत संपर्क और संवाद रहा है, एसा कोई भी नहीं होगा जिसके पास सुनाने के लिए अटल जी से जुड़ा कोई रोचक किस्सा न हो। उनके गुस्से में भी प्यार होता था और प्यार में दुलार और लाड़ होता था। यूं तो अटल जी पूरे भारत के थे पर उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश का उन पर विशेष हक था।
उनका जन्म आगरा के बटेश्वर क्षेत्र के एक गांव में हुआ, प्राथमिक शिक्षा ग्वालियर में हुई तो कानपुर में उच्च शिक्षा प्राप्त की और पहले गोंडा बलराम पुर से चुनाव लड़ने फिर वर्षों तक लखनऊ से लोकसभा में चुने जाने की वजह से उत्तर प्रदेश से उन्हें और उत्तर प्रदेश को उनसे बेहद प्यार हो गया था। सही मायनों में जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, चरण सिंह, विश्वनाथ प्रताप सिंह और चंद्रशेखर के बाद देश के सबसे बड़े सूबे ने एक बार फिर अपने एक सपूत को खो दिया। नम आंखों से भारत और उत्तर प्रदेश के इस सपूत की स्मृति को नमन।