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पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद का पसंदीदा दीघा आम संकट में

Thu, 20 Jul 2017 09:32 PM IST
बीबीसी हिंदी
बीबीसी हिंदी Updated Thu, 20 Jul 2017 09:32 PM IST
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Former President Rajendra Prasad's favorite lion in general crisis
भारत के पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद
ये मौसम फलों का राजा माना जाने वाले आम का है और भारत के राष्ट्रपति चुनाव का भी। दिलचस्प बात ये भी है कि भारत के पहले राष्ट्रपति डाक्टर राजेंद्र प्रसाद आम के बड़े शौकीनों में से थे। मालहद या लंगड़ा सबसे ज़्यादा पसंद की जाने वाली आम की वेराइटी में से एक है।
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इसकी एक ख़ास वेराइटी पटना के दीघा इलाके में उपजती है। और इलाके के नाम पर ही इसका नाम भी दीघा मालदह है। यह वेराइटी अपने मिठास, खास रंग, गंध, ज्यादा गूदा और पतली गुठली और छिलके के कारण मशहूर है। राजेंद्र प्रसाद को दीघा मालदह बहुत पसंद था।
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उनकी पोती डाक्टर तारा सिन्हा बताती हैं, "जब राजेंद्र बाबू दिल्ली में थे तो वे अक्सर दीघा मालदह को याद किया करते थे। जिस साल 1962 में वे पटना लौटे उस साल दीघा मालदा की बहुत अच्छी फसल हुई थी।" लेकिन अब यह वेराइटी खत्म होने के कगार पर है। दीघा इलाके में इसके अब केवल गिनती के पेड़ ही बचे हैं। और जो बचे भी हैं उन पर अब पहले जैसे फल नहीं लगते। तारा सिन्हा कहती हैं कि दीघा मालदह अब लुप्तप्राय होता जा रहा है।
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बिहार कॉलेज ऑफ़ इंजीनियरिंग के भूतपूर्व प्रिंसिपल प्रोफ़ेसर एचके सिन्हा अंबष्ठ दीघा मालदह के पुराने बगीचों को कुछ इस तरह याद करते हैं, "सदाकत आश्रम के आगे काफी दूर तक सड़क के दोनों ओर आम के बगीचे थे। हम लोग बागानों से कच्चे आम तोड़वा कर लाते थे और उसे घर में कागज पर या चावल की बोरियों में रखकर पकाते थे।"

Former President Rajendra Prasad's favorite lion in general crisis
दीघा का इलाका
चके सिन्हा ने एक दिलचस्प बात यह भी बताई की साठ के दशक में तब आम किलो के भाव नहीं गिनती से बेचे जाते थे। तब एक रुपए में बारह से चौदह आम तक मिल जाते थे। वहीं इस ख़ास आम के स्वाद को याद करते हुए वे कहते हैं कि आम मुंह में डालते ही कुछ बहुत अच्छी चीज़ का अहसास होता था।


तरुमित्र बिहार में पर्यावरण पर काम करने वाली प्रमुख संस्थाओं में से एक है. यह दीघा इलाके में ही स्थित है। तरुमित्र के संयोजक फादर रॉबर्ट एथिकल बताते हैं, "इलाके में तेजी से हुए भवन निर्माण के कारण दीघा मालदह के बागान और पेड़ बहुत ही कम हो गए हैं. और जो बचे भी हैं वे लगातार तेजी से सूख रहे हैं।"


रॉबर्ट दीघा इलाके के संत जेवियर्स कॉलेज अहाते में मौजूद बागान का उदाहरण देते हैं, "कभी वहां करीब पांच सौ के करीब पेड़ थे। लेकिन कुछ ही बर्षों के करीब चार सौ पेड़ सूख गए।" भागलपुर के सबौर स्थित बिहार कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक डाक्टर रेवती रमण सिंह और उनकी टीम ने दीघा इलाके के आम के पेड़ों का सर्वेक्षण किया है।


इस सर्वेक्षण के आधार पर वे बताते हैं, "हमने पाया कि स्टेम बोरर नामक कीड़ा इलाके के पेड़ों को बहुत नुकसान पहुंचा रहा है। यह पेड़ के मुख्य हिस्सों में घुसकर बुरादा बाहर निकालते हुए पेड़ों को नुकसान पहुंचा रहा है।" साथ ही रेवती रमण के मुताबिक इलाके में आम के पेड़ बहुत पुराने हो जाने के कारण भी सूख रहे हैं. गिर रहे हैं।

 

Former President Rajendra Prasad's favorite lion in general crisis
दीघा का इलाका
ऐसे में दीघा मालदह को बचाने के उपायो में स्टेम बोरर से बचाव, नए पेड़ लगाने के अलावा वे पेड़ों के जीर्णोद्धार का तरीका भी सुझाते है। डाक्टर रेवती कहते हैं, "पचास-साठ साल पुराने पेड़ों की विशेषज्ञों की निगरानी में वैज्ञानिक तरीके से कंटाई कर और उसके तने में रसायन डालकर उन्हें फिर से नया जीवन दिया जा सकता है।


ऐसे पेड़ तीन साल के अंदर फिर फल देने लगते हैं।" वहीं इस वेराइटी का वजूद बचाए रखने के बारे में फादर रॉबर्ट का कहना है, "ज़रूरत इस बात की भी है कि दीघा मालदह के पेड़ों को सूबे के दूसरे हिस्सों में भी बड़े पैमाने पर लगाया जाए।"


दूसरी ओर बिहार कृषि विश्वविद्यालय आम की एक किस्म हाइब्रिड 60-1 भी तैयार कर रहा है. यह मालदह और शीतल प्रसाद वेराइटी का क्रॉस है। प्रायोगिक तौर जो इसके फल मिले हैं वो दीघा मालदह जैसे हैं और कुछ मामलों में उससे बेहतर भी। अगर ये वेराइटी सफल हुई तो यह भी दीघा मालदह का एक विकल्प हो सकती है।


दीघा ठीक गंगा नदी के किनारे पर बसा इलाका है। दीघा मालदह के जो चंद बागान अब भी बचे हैं उनमें बिहार विद्यापीठ का बागान भी है। यह वही विद्यापीठ है जहां राजेंद्र प्रसाद ने अपने जीवन के अंतिम कुछ महीने गुजारे थे।
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