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पूर्व सीजेआई चंद्रचूड़ पर पूर्व जज कौल का आरोप: सरकार के प्रति जरूरत से ज्यादा नरम थे; कॉलेजियम पर दी ये नसीहत

Sun, 25 Oct 2026 06:22 PM IST
हिमांशु सिंह चंदेल न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली। Published by: हिमांशु सिंह चंदेल Updated Sun, 25 Oct 2026 06:22 PM IST
सार

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज संजय किशन कौल ने पूर्व मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ पर जजों की नियुक्ति के मामले में सरकार के प्रति जरूरत से ज्यादा नरम रहने का आरोप लगाया है। उन्होंने कॉलेजियम को सरकारी दबाव का विरोध करने की सलाह दी। पीएमएलए मामले को दूसरी पीठ में भेजने पर भी सवाल उठाए गए हैं। आखिर जजों की नियुक्ति से पहले सरकार की राय लेने और न्यायिक स्वतंत्रता के बीच क्या संबंध है? आइए, सबकुछ विस्तार से जानते हैं...

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Former Judge Kaul Accuses Ex-CJI Chandrachud of Being Too Deferential to Government Advises on Collegium
पूर्व सीजेआई चंद्रचूड़ के काम करने के तरीके से क्यों असहमत थे पूर्व जज कौल - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्ति और न्यायपालिका की स्वतंत्रता को लेकर पूर्व जजों के बीच मतभेद सामने आए हैं। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश संजय किशन कौल ने पूर्व मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ के काम करने के तरीके पर सवाल उठाए हैं। कौल का आरोप है कि जजों की नियुक्ति के मामले में चंद्रचूड़ सरकार के प्रति जरूरत से ज्यादा नरम थे। उन्होंने कहा कि कॉलेजियम को सरकार के दबाव का विरोध करना चाहिए, ताकि न्यायपालिका की स्वतंत्रता बनी रहे।

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जजों की नियुक्ति को लेकर कौल ने क्या आरोप लगाए?

  • पूर्व न्यायाधीश संजय किशन कौल ने अपनी आने वाली किताब विदाउट फियर ऑर फेवर में सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्ति से जुड़ी एक घटना का जिक्र किया है। उनके मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट में छह खाली पदों को भरने के लिए कॉलेजियम की बैठक होनी थी। इससे पहले पांच नामों पर सहमति बन चुकी थी।
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  • कौल का दावा है कि तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने आखिरी समय में छठे नाम का प्रस्ताव रखा और सरकार की राय जानने के लिए फोन करने पर विचार किया। कौल ने कहा कि उन्होंने इस नाम पर असहमति जताई थी और उन्हें लगता था कि कॉलेजियम के दूसरे सदस्य भी इसे स्वीकार नहीं करेंगे।
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क्या सरकार से पहले ही जजों के नामों पर चर्चा हो रही थी?
कौल ने कहा कि चंद्रचूड़ ने उन्हें अलग कमरे में बुलाकर सरकार की राय लेने के लिए फोन करने की बात कही थी। कौल के मुताबिक, उन्होंने इसका विरोध किया, क्योंकि उनके विचार में नियुक्तियों पर फैसला कॉलेजियम की औपचारिक बैठक में होना चाहिए। उन्होंने कहा कि चंद्रचूड़ चाहते थे कि वह छठे नाम पर सहमत हो जाएं, लेकिन कौल का मानना था कि कॉलेजियम के अन्य सदस्य भी उस नाम को स्वीकार नहीं करेंगे। कौल ने यह आशंका भी जताई कि संभव है कि कुछ नामों, यहां तक कि छठे नाम पर भी, सरकार से पहले ही किसी तरह की सहमति ली गई हो। उन्होंने कहा कि सरकार के साथ पहले से नामों पर चर्चा करने की प्रक्रिया पहले भी चलती रही और बाद में भी जारी रही।


कॉलेजियम को लेकर कौल ने क्या चेतावनी दी?
कौल ने कहा कि सरकार से सलाह लेने और नियुक्ति पर पहले से उसकी मंजूरी लेने में बड़ा अंतर है। उनके मुताबिक, कॉलेजियम की औपचारिक चर्चा से पहले सरकार की सहमति लेना न्यायिक स्वतंत्रता के लिए चिंता का विषय है। उन्होंने कहा कि कॉलेजियम को कार्यपालिका यानी सरकार के दबाव का विरोध करना चाहिए। कौल ने 2015 में राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (एनजेएसी) लाने के फैसले का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि उस समय न्यायपालिका और सरकार आमने-सामने बैठकर व्यवस्था पर चर्चा कर सकती थीं और उसमें जरूरी सुधार किए जा सकते थे। कौल दिसंबर 2023 में सेवानिवृत्त हुए थे और जून 2022 से चंद्रचूड़ के नेतृत्व वाले कॉलेजियम का हिस्सा रहे थे। उन्होंने कहा कि चंद्रचूड़ के साथ उनके मतभेदों की एक वजह सरकार के साथ नियुक्तियों को लेकर बातचीत करने का तरीका भी था।

कौल को चंद्रचूड़ के फैसले से भविष्य को लेकर क्या चिंता थी?
कौल के मुताबिक, चंद्रचूड़ का मानना था कि जजों की नियुक्ति से पहले सरकार के साथ नामों पर चर्चा करना पहले से चली आ रही प्रक्रिया है। लेकिन कौल इससे सहमत नहीं थे। उन्होंने कहा कि चंद्रचूड़ के पास मुख्य न्यायाधीश के रूप में करीब दो साल का कार्यकाल था और उनके पास अपने फैसले लेने की स्थिति में मजबूत भूमिका निभाने का अवसर था। कौल को चिंता थी कि यदि उस समय यह तरीका जारी रहा, तो बाद में आने वाले मुख्य न्यायाधीशों पर भी उसी प्रक्रिया को अपनाने का दबाव बनेगा। उनके मुताबिक, बाद के मुख्य न्यायाधीशों का कार्यकाल छोटा हो सकता है और सरकार भी नियुक्तियों से पहले सहमति लेने की प्रक्रिया को सामान्य मानने लगेगी। इसलिए उन्होंने चंद्रचूड़ से पहले ही हर नाम पर सरकार से चर्चा करने की प्रक्रिया को हतोत्साहित करने की कोशिश की।


मनी लॉन्ड्रिंग कानून के मामले में कौल ने क्या सवाल उठाए?
कौल ने एक अन्य मामले में भी आपत्ति जताई। यह मामला धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के कुछ पहलुओं पर दोबारा विचार करने से जुड़ा था। कौल ने कहा कि जिस मामले पर उनकी अध्यक्षता वाली पीठ ने विचार किया था, उसे दूसरी पीठ को सौंप दिया गया। उनके मुताबिक, किसी मामले को इस आशंका के आधार पर एक पीठ से दूसरी पीठ में नहीं भेजा जाना चाहिए कि फैसला क्या हो सकता है। उन्होंने इस बदलाव को लेकर उनसे सलाह नहीं लिए जाने पर भी सवाल उठाए। कांग्रेस ने कौल की आने वाली किताब में दर्ज इन घटनाओं का हवाला देते हुए रविवार को दावा किया कि ये न्यायपालिका की स्वतंत्रता को लेकर गंभीर सवाल खड़े करती हैं। पार्टी ने आरोप लगाया कि न्यायपालिका पर सत्ता में बैठे लोगों का दबाव नहीं होना चाहिए।

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