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Ranjan Gogoi: पूर्व सीजेआई गोगोई बोले- यौन उत्पीड़न मामले से निपटने वाली पीठ में न होता तो बेहतर होता
Wed, 08 Dec 2021 10:36 PM IST
गौरव पाण्डेय
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: गौरव पाण्डेय
Updated Wed, 08 Dec 2021 10:36 PM IST
सार
भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश की आत्मकथा 'जस्टिस फॉर दि जज' का बुधवार को उद्घाटन हुआ। इस दौरान गोगोई ने अपने खिलाफ यौन उत्पीड़न के मामले के साथ कई मुद्दों पर बात की और कहा कि अपनी गलतियां स्वीकार करने में कोई नुकसान नहीं है।
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पूर्व सीजेआई रंजन गोगोई और एसए बोबडे
- फोटो : पीटीआई
विस्तार
यौन उत्पीड़न के आरोपों का सामना करने वाले भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने बुधवार को स्वीकार किया कि उन्हें इस मामले से निपटने वाली पीठ का हिस्सा नहीं होना चाहिए था। जस्टिस गोगई ने कहा, 'मुझे उस पीठ का जज नहीं होना चाहिए था। अगर मैं पीठ का हिस्सा नहीं होता तो बेहतर होता। हम सभी गलतियां करते हैं। इसे स्वीकार करने में कोई बुराई नहीं है।'
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जस्टिस गोगोई ने अपनी आत्मकथा 'जस्टिस फॉर जज' के विमोचन के दौरान सवालों का जवाब देते हुए कहा कि यह सब इसलिए हुआ क्योंकि उनकी प्रतिष्ठा पर सवाल उठाया जा रहा था। अप्रैल 2019 में सुप्रीम कोर्ट की एक महिला कर्मचारी ने तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगई पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया था। जस्टिस गोगोई ने स्वत: संज्ञान लेकर मामला दर्ज करने के बाद इस मुद्दे से निपटने के लिए तीन न्यायाधीशों की पीठ की अध्यक्षता की थी।
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एक आंतरिक समिति द्वारा उन्हें बाद में क्लीन चिट के संबंध में जस्टिस गोगई ने कहा, 'यह केवल 'फुल कोर्ट' के विवेक पर है। सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन सभी जजों की सहमति पर समिति का गठन किया गया था। यह एक फैसले द्वारा निर्धारित किया गया है। आंतरिक कार्यवाही दांतहीन नहीं है। दोषी पाए जाने पर न्यायाधीश को पद छोड़ना होता है और राष्ट्रपति महाभियोग को मंजूरी देते हैं।
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जस्टिस गोगई ने कहा कि उनके उत्तराधिकारी जस्टिस एसए बोबडे, जो आंतरिक समिति का नेतृत्व कर रहे थे, उनके खिलाफ फैसला कर सकते थे और आसानी से सीजेआई के रूप में अतिरिक्त सात महीने पा सकते थे। महिला कर्मचारी की बाद में बहाली के बारे में जस्टिस गोगोई ने कहा कि उनके कार्यकाल के दौरान हुआ था। महिला ने मानवीय आधार पर उसके मामले पर विचार करने के लिए जस्टिस बोबडे को एक आवेदन दिया था। जस्टिस बोबडे ने उस महिला के साथ-साथ कथित तौर पर अनिल अंबानी का पक्ष लेने के लिए अदालत के आदेश को बदलने पर बर्खास्त किए गए दो अन्य कर्मचारियों को भी बहाल कर दिया था।
अपने राज्यसभा नामांकन के सवाल पर जस्टिस गोगोई ने कहा, 'मुझे क्या स्वीकार करना चाहिए था राज्यपाल या राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का अध्यक्ष। आर्थिक रूप से तब मैं बेहतर होता। मैंने राज्यसभा से एक पैसा भी नहीं लिया है।
जस्टिस गोगोई 17 नवंबर, 2019 को भारत के मुख्य न्यायाधीश पद से सेवानिवृत्त हुए थे। वह उत्तर-पूर्वी राज्य असम के पहले मुख्य न्यायाधीश थे। जस्टिस गोगई ने अयोध्या विवाद का फैसला करने वाली पांच-न्यायाधीशों की पीठ की अध्यक्षता की थी। उन्होंने उस पीठ की भी अध्यक्षता की थी जिसने राफेल सौदे की जांच की मांग वाली याचिकाओं को खारिज कर दिया था।
अयोध्या फैसले को लेकर लगे आरोपों का किया खंडन
उत्तर-पूर्वी राज्यों से आने वाले देश के पहले मुख्य न्यायाधीश ने यहां अन्य कई मुद्दों पर भी बात की। इनमें देश के 46वें मुख्य न्यायाधीश पर अपने कार्यकाल के दौरान विवादों का कारण बनने वाले मामले भी शामिल रहे। इसके साथ ही उन्होंने उस आरोप का जोरदार खंडन किया कि अयोध्या का फैसला उन्होंने राज्यसभा में नामांकन के एवज में दिया था। असम के डिब्रूगढ़ से आने वाले गोगोई तीन अक्तूबर 2018 को सीजेआई बनाए गए थे और 17 नवंबर 2019 को पदमुक्त हुए थे।
गोगोई ने किताब में कई विवादित मुद्दों पर भी की बात
इस किताब में गोगोई ने अपने जीवन और करियर के दौरान हुए नाटकीय घटनाक्रमों का वर्णन किया है। इसमें उनके सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बनने से पहले के 'कुख्यात' संवाददाता सम्मेलन, यौन उत्पीड़न के आरोप और टैब्लॉयड पत्रकारिता के असर से जुड़ी घटनाएं भी शामिल हैं। इसमें उन्होंने सीजेआई बनने के सफर, ऐतिहासिक मामलों और न्यायिक महत्वाकांक्षाओं के बारे में बात की है और देश की कानून व्यवस्था के बारे में जो सबक सीखे, इसके बारे में भी बात की गई है।
'अयोध्या पर फैसला एक जिम्मेदारी थी जो मैंने निभाई'
गोगोई ने अपनी इस आत्मकथा में कई अहम बैठकों, वार्ताओं और व्यक्तिगत लड़ाइयों का भी जिक्र किया है। इसमें उन्होंने राफेल लड़ाकू विमान, राहुल गांधी के खिलाफ शुरू की गई अवमानना की कार्यवाही, सबरीमाला, एनआरसी (राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर) और अयोध्या के फैसले को लेकर भी बात की है। अयोध्या फैसले पर उन्होंने कहा कि यह एक जिम्मेदारी थी जो मेरे पूर्ववर्ती ने मुझे दी थी और एक तारीख तय की थी। मेरे पास भागने या लड़ने के दो विकल्प थे, मैंने लड़ना चुना।