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Jaishankar: विदेश मंत्री ने कहा, चीन सीमा पर बुनियादी ढांचे के लिए भारत का बजट 2014 के बाद तेजी से बढ़ा

Fri, 12 Apr 2024 10:02 PM IST
जलज मिश्रा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई Published by: जलज मिश्रा Updated Fri, 12 Apr 2024 10:02 PM IST
सार

राजनयिक के रूप में भगवान हनुमान को कैसे देखा जा सकता है, इस सवाल पर विदेश मंत्री ने कहा कि एक आदर्श राजनयिक पहले अपने स्वामी और देश का पक्ष प्रस्तुत करता है। इस दौरान वातावरण कभी-कभी अनुकूल होता है तो कभी नकारात्मक भी हो जाता है।

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Foreign Minister Jaishankar China and India are unique countries, we both are old civilizations
विदेश मंत्री एस जयशंकर। - फोटो : ANI

विस्तार

भारत और चीन बहुत अनोखे हैं। हम दोनों पुरानी सभ्यताएं हैं। यह कहना है कि भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर का। शुक्रवार को 'युवाओं के लिए अवसर और वैश्विक परिदृश्य में भागीदारी' कार्यक्रम के दौरान उन्होंने कहा कि चीन आज दूसरे नंबर की अर्थव्यवस्था बन गया है तो वहीं हम पांचवें स्थान पर हैं। आने वाले दो या तीन वर्षों में हम दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होंगे। यही वास्तविकता है। जयशंकर ने बताया कि 2014 में नरेंद्र मोदी के पहली बार प्रधानमंत्री बनने के बाद से चीन के साथ सीमा पर बुनियादी ढांचे के लिए भारत का बजट काफी बढ़ गया है। उन्होंने दावा किया कि भारत को 1962 के युद्ध से सबक लेना चाहिए था, लेकिन 2014 तक सीमा बुनियादी ढांचे के विकास में कोई प्रगति नहीं हुई। मोदी सरकार ने इसके लिए बजट 3,500 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 14,500 करोड़ रुपये किया।

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चीन के प्रति भारत की नीति से बहुत परेशान थे पटेल
युवाओं से बातचीत में जयशंकर ने कहा, चीन के साथ भारत की यथार्थवादी, जमीनी और व्यावहारिक नीति होनी चाहिए। चीन हमारा पड़ोसी है और चाहे चीन हो या कोई अन्य पड़ोसी, सीमा समझौता एक तरह की चुनौती है। अगर हम इतिहास से सबक नहीं लेंगे तो हम बार-बार गलतियां करते रहेंगे। जयशंकर ने कहा, चीन ने 1950 में तिब्बत पर कब्जा कर लिया था और तत्कालीन गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को पत्र लिखकर कहा था कि वह चीन के प्रति भारत की नीति से बहुत परेशान हैं। पटेल ने आगाह किया था कि भारत को चीन के आश्वासनों को बिना सोचे-समझे नहीं लेना चाहिए, लेकिन नेहरू ने उनकी चिंताओं को खारिज कर दिया। नेहरू ने तब कहा था कि चीन वास्तव में भारत के साथ दोस्ती चाहते हैं और दावा किया कि यह असंभव है कि चीन भारत पर हमला करने के लिए हिमालय पार करेगा। यही बड़ी गलती थी। जयशंकर ने कहा, पिछले कुछ वर्षों में चीन सीमा पर नई सुरंगें, सड़कें, पुल बनाए गए हैं। सेला सुरंग वहां बनाई गई जहां 1962 में चीनी पहुंच गए थे। जब तक हम सीमा के बुनियादी ढांचे में कोई प्रगति नहीं करते, हम सीमा पर चुनौती से कैसे निपट सकते हैं।

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राजनयिक के रूप में हनुमान जी की तुलना
राजनयिक के रूप में भगवान हनुमान को कैसे देखा जा सकता है, इस सवाल पर विदेश मंत्री ने कहा कि एक आदर्श राजनयिक पहले अपने स्वामी और देश का पक्ष प्रस्तुत करता है। इस दौरान वातावरण कभी-कभी अनुकूल होता है तो कभी नकारात्मक भी हो जाता है। दबाव के दौरान दूसरे देशों में अपना पक्ष कैसे रखें यही कूटनीति का सर्वोपरी बिंदु है। रामायण में भगवान बजरंगबलि लंका गए थे, उन्होंने वहां चुनौती भरी परिस्थिति में भी भगवान राम का पक्ष मजबूती से रखा।

दुनिया की सोच से भी विपरीत जाकर करने पड़ते हैं फैसले
केंद्रीय मंत्री जयशंकर द्वारा लिखी गई किताब व्हाय भारत मैटर्स पर चर्चा करते हुए उन्होंने कि मैंने अपनी किताब में लिखा है कि भारत दबाव में नहीं आता है। अगर हमें कोई निर्णय लेना होता है तो हम लेते हैं। हमें दुनिया की सोच के विपरीत भी जाना पड़ता है। हम उसके लिए भी तैयार हैं। इस दशक में भारत को लेकर अधिक परिवर्तन आया है। यह भारत की और अधिक है और इंडिया की और कम है।

 

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