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पहली मुस्लिम महिला प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो, जानें स्पोर्ट्स कार चलाने से लेकर चादर ओढ़ने तक का सफर

Tue, 23 Jun 2020 01:09 PM IST
Tanuja Yadav बीबीसी
बीबीसी Published by: Tanuja Yadav Updated Tue, 23 Jun 2020 01:09 PM IST
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first Muslim woman prime minister Benazir Bhutto know everything about her
बेनजीर भुट्टो - फोटो : Pakistan Today

बीसवीं सदी में दुनिया में बहुत सी महिला प्रधानमंत्री हुई हैं। श्रीलंका की सिरीमाओ भंडारानायके, इसराइल की गोल्डा मेयर, भारत की इंदिरा गांधी और ब्रिटेन की मार्ग्रेट थैचर। बेनजीर भुट्टो कुछ मायनों में अलग थीं क्योंकि वो युवा होने के साथ-साथ आकर्षक और पढ़ी-लिखी भी थीं और किसी भी मुस्लिम देश की पहली महिला प्रधानमंत्री थीं।

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बेनजीर भुट्टो का शायद सबसे दिलचस्प वर्णन मशहूर इतिहासकार विलियम डैलरिंपल ने बेनज़ीर की मौत के बाद गार्डियन अखबार में छपे एक लेख 'पाकिस्तान्स फ्लॉड एंड फ्यूडल प्रिंसेज' में किया था। 
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डैलरिंपल ने लिखा था कि ऑक्सफर्ड में उनको जानने वाले अंग्रेज दोस्त उन्हें एक चंचल लड़की के रूप में याद करते हैं जो अपनी पीली एमजी स्पोर्ट्स कार खुद चलाकर लेक्चर अटेंड करने आया करती थीं। 
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जब वो राजनीति में आईं तो वो लगातार 12 घंटे तक कैबिनेट मीटिंग लेने और सिर्फ चार घंटे की नींद लेकर जिंदा रहने के लिए याद की गईं। ये वही बेनजीर थीं जिन्होंने पाकिस्तान लौटने पर अपने ऊपर हुए जानलेवा हमले के बाद भी अपना चुनाव प्रचार जारी रखा था।

भुट्टो बेनजीर को लाना चाहते थे राजनीति में

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Benazir Bhutto

डैलरिंपल बेनजीर को अपने पिता की तरह अक्खड़ भी बताते हैं। जिस तरह से वो चला करती थीं और राजसी ढंग से बात करते हुए 'हम' शब्द का इस्तेमाल करती थीं, उससे सामंतवाद की बू आती थी। 

जिन लोगों ने उनके साथ काम किया है, उनमें से एक उनके पहले कार्यकाल में सुरक्षा सलाहकार रहे इकबाल अखुंड हैं। उनका मानना है कि बेनजीर की शख्सियत की सबसे खास बात है उनका साहसी और जुझारू होना। बेनजीर का सबसे अच्छा रूप तभी सामने आता है जब वो संघर्ष कर रही हों। 

बेनजीर को कई नामों से पुकारा जाता था, कुछ लोगों के लिए वो बीबी थीं तो कुछ के लिए पिंकी, मिस साहिबा और मोहतरमा। बेनजीर पाकिस्तान विदेश सेवा में जाना चाहती थीं लेकिन उनके पिता ज़ुल्फिकार अली भुट्टो चाहते थे कि वो राजनीति में आएं।

बेनजीर अपनी आत्मकथा 'द डॉटर ऑफ द ईस्ट' में लिखती हैं कि जब मैं छह साल की थी तब से वो मुझे नेपोलियन की कहानियाँ सुनाया करते थे। आठ साल की उम्र में उन्होंने मुझे चाऊ एन लाई से मिलवाया था। 

नवंबर 1963 में जब मैं उनके साथ ट्रेन में सफर कर रही थी उन्होंने मुझे जगाकर कहा था, ये सोने का समय नहीं है. बहुत बड़ी ट्रेजेडी हो गई है। अमरीका के युवा राष्ट्रपति कैनेडी को गोली मार दी गई है। मैं उनके बगल में बैठी थी, जब वो कैनेडी के बारे में सारी ताजा खबरें ले रहे थे। वो व्हॉइट हाउस में कैनेडी से कई बार मिल चुके थे और उन्हें बहुत मानते थे।

भुट्टो से कूटनीति का पाठ

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बेनजीर भुट्टो - फोटो : File Photo

1971 में भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान जब भुट्टो संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान का पक्ष रखने न्यूयॉर्क गए थे तो बेनजीर भी उनके साथ गई थीं। तब भुट्टो ने उन्हें कूटनीति का ऐसा पाठ पढ़ाया जिसे वो जिंदगी भर नहीं भूलीं। 

बेनजीर अपनी आत्मकथा में लिखती हैं कि हम पियरे होटल में ठहरे हुए थे। मेरे पिता ने मुझसे कहा जब मैं किसी से बात कर रहा हूँ तो तुरंत कमरे में आकर मुझे रोक दो। अगर सोवियत मेरे पास बैठे हों तो कहो चीनी फोन लाइन पर हैं। 

अगर मैं अमरीकियों से बात कर रहा हूं तो कहो कि रूसी और भारतीय आपसे बात करना चाहते हैं। कूटनीति का सबसे बड़ा पाठ है कि हमेशा दूसरे के मन में संशय पैदा करो और कभी भी अपने सारे पत्ते मेज पर न रखो।

बेनजीर की करण थापर से दोस्ती
भारत के मशहूर पत्रकार करण थापर बेनजीर भुट्टो को उन दिनों से जानते थे जब वो कैंब्रिज विश्वविद्यालय के उपाध्यक्ष और बेनजीर ऑक्सफर्ड विश्वविद्यालय की कोषाध्यक्ष हुआ करती थीं।

एक बार करण थापर ने बताया था कि एक बार बेनजीरर कैंब्रिज आई थीं और उन्होंने इस विषय पर वाद-विवाद कराने का प्रस्ताव रखा था कि शादी से पहले सेक्स करने में कोई बुराई नहीं है। किसी भी महिला के लिए जो पाकिस्तान जैसे देश की राजनीति में कुछ कर गुजरने की मंशा रखती हो, ये एक बोल्ड और बारीक विषय था। 

करण थापर वो समय अभी तक भूले नहीं हैं जब उन्होंने उस बैठक में बेनजीर की तफरीह लेने के इरादे से सबके सामने उनसे पूछा था कि मैडम जो आप कह रही हैं, क्या आप उसका अपनी निजी जिंदगी में पालन करने की हिम्मत रखती हैं?

ये सुनते ही वहां मौजूद लोगों ने जोर का ठहाका लगाया और तालियां बजानी शुरू कर दीं। बेनजीर ने तालियों के रुकने का इंतजार किया और अपने चेहरे से चश्मा उतारा और मेरी आँखों में आंखें डालकर बोलीं, जरूर लेकिन आपके साथ नहीं।

सेना ने अटकाए कई रोड़े

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Benazir Bhutto

राजनीति में बेनजीर का रास्ता कभी भी आसान नहीं रहा। क्रिस्टीना लैंब अपनी किताब 'वेटिंग फॉर अल्लाह: पाकिस्तान्स स्ट्रगल फॉर डेमोक्रेसी' में लिखती हैं कि जब जिया ने चुनाव की घोषणा की तो उस समय आईएसआई के प्रमुख हमीद गुल ने बेनजीर और उनकी माँ नुसरत के लिए 'गैंग्सटर्स इन बैंगिल' शब्द का प्रयोग किया था।

उनके खिलाफ दुष्प्रचार की मुहिम में विमान से हजारों पर्चे गिराए गए जिसमें बेनजीर को पेरिस के एक नाइट क्लब में नाचते हुए दिखाया गया। उनकी माँ नुसरत का राष्ट्रपति गेराल्ड फोर्ड के साथ डांस करते हुए एक चित्र भी उसी में था। इसका उद्देश्य पाकिस्तान के लोगों को ये बताना था कि बेटी और मां दोनों किस हद तक गैर-इस्लामी हो सकते हैं। 

जब वो प्रधानमंत्री बन भी गईं तो सेना ने उनके सामने मुश्किलें खड़ी करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। मुशाहिद हुसैन और अकमल हुसैन अपनी किताब 'पाकिस्तान: प्रॉब्लम्स ऑफ गवर्नेंस' में लिखते हैं कि जब बेनजीर प्रधानमंत्री बनीं तो उन्हें विदेश और वित्त मंत्री के लिए दो नाम दिए गए। 

उन्होंने साहबजादा याकूब खां को तो विदेश मंत्री के तौर पर स्वीकार कर लिया लेकिन वित्त मंत्री के तौर पर महबूबुल हक के नाम पर इसलिए राजी नहीं हुईं क्योंकि वो उनके पिता भुट्टो के विरोधी थे। 

उन्हीं दिनों प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव और अर्थशास्त्री वीए जाफरी को अमरीकी राजदूत रॉबर्ट ओकली ने खाने पर बुलाया। उसी समय उनके पास प्रधानमंत्री कार्यालय से फोन आया कि उन्हें वित्त मंत्रालय में सलाहकार के तौर पर शपथ दिलवाई जानी है। 

शपथ ग्रहण समारोह के दौरान बेनजीर ने सबसे पूछा आप में से जाफरी साहब कौन हैं? वो उन्हें पहचानती तक नहीं थी। जाफरी ने खड़े होकर अपना परिचय दिया ताकि कम से कम वो उस शख्स की शक्ल तो देख लें जिनको उन्होंने अपने आर्थिक सलाहकार के रूप में नामांकित किया है।

नवाज़ शरीफ से कटुता

बेनजीर भुट्टो के उस समय पंजाब के मुख्यमंत्री नवाज शरीफ से भी रिश्ते बहुत खराब थे। पाकिस्तानी राजनयिक सैयदा आबिदा हुसैन अपनी किताब 'पावर फेल्योर द पॉलिटिकल ओडिसी ऑफ अ पाकिस्तानी वुमैन' में लिखती हैं कि बेनजीर नवाज शरीफ की सरकार को 'गंजों' की सरकार कहती थीं।

उनकी इस सूची में शामिल थे नवाज शरीफ, उनके भाई शहबाज, मंत्री सरताज अजीज, मुशाहिद हुसैन, सिद्दीक कन्जू, मजीद मलिक, शुजात हुसैन और शेख रशीद। बेनजीर का कहना था कि ये सभी लोग विग लगाते हैं। 

नवाज शरीफ के साथ उनके रिश्ते इतने खराब हो चले थे कि जब एक बार वो प्रधानमंत्री के तौर पर लाहौर गईं थीं तो नवाज शरीफ ने पंजाब के मुख्यमंत्री के तौर पर हवाई अड्डे जाकर उनकी अगवानी करना भी उचित नहीं समझा था। उन्होंने बेनज़ीर के मीनार-ए-पाकिस्तान पर सभा करने तक की अनुमति नहीं दी थी जबकि वो उस समय पाकिस्तान की प्रधानमंत्री थीं।

फारूख लेघारी से भी अनबन
बेनजीर के दूसरे कार्यकाल में जब उनकी पार्टी के ही फारूख लेघारी ने राष्ट्रपति चुनाव जीतने के बाद राष्ट्र को संबोधित करने की इच्छा प्रकट की तो बेनजीर ने ऐसा करवाने से साफ इनकार कर दिया।

रोआदेद खां अपनी किताब 'पाकिस्तान अ ड्रीम गॉन सार' में लिखते हैं कि बेनजीर का कहना था कि राष्ट्रपति का देश को संबोधित करना जरूरी नहीं है। ये सुनते ही सब लोग स्तब्ध रह गए। वहाँ मौजूद हर शख्स बेनजीर के इस रुख से बहुत शर्मिंदा हुआ। तभी लोगों को आभास हो गया था कि बेनजीर के कार्यकाल पूरा करने के संकेत बहुत कम हैं।

पांच नवंबर 1996 को फारूख लेघारी ने बेनजीर भुट्टो को करीब-करीब उन्हीं आरोपों के तहत बर्खास्त किया था जिन पर गुलाम इसहाक खां ने छह साल पहले उन्हें पद से हटाया था।

परंपरा और आधुनिकता का सम्मिश्रण

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संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान के स्थाई प्रतिनिधि रहे इकबाल अखुंड अपनी किताब 'ट्रायल एंड एरर द एडवेंट एंड एकलिप्स ऑफ बेनजीर भुट्टो में' लिखते हैं कि बेनजीर टाइम पत्रिका के कवर पर आईं। उनके पिता को ये सौभाग्य कभी नहीं मिला। 

बेनज़ीर ने कभी भी उर्दू और सिंधी की औपचारिक शिक्षा नहीं ली, हां अंग्रेज़ी पर उनकी पकड़ अच्छी थी। वो बिना तैयारी के अच्छा भाषण दे सकती थीं लेकिन जब भी वो कुछ लिखा हुआ पढ़ती थीं, ऐसा लगता था कि कोई स्कूल टीचर प्रौढ़ शिक्षा की क्लास ले रही हो। 

1986 में जब वो पाकिस्तान वापस आईं तो उनका हर जगह स्वागत किया गया। पेशावर की एक रैली में भीड़ ने उनका साथ देते हुए नारा लगाया जा, जा जिया! जिया जा!" दुनिया में बहुत कम महिलाएं ऐसी हुई हैं जो उसी सलीके और निपुणता से स्पोर्ट्स कार चला सकती थीं और पाकिस्तान के परंपरागत समाज के सामने चादर भी ओढ़ सकती थीं।

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