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Climate Change: जलवायु परिवर्तन से लड़ाई सभी देशों की कानूनी जिम्मेदारी, भारत की मांग को मिला वैश्विक समर्थन
Fri, 25 Jul 2025 04:56 AM IST
शुभम कुमार
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: शुभम कुमार
Updated Fri, 25 Jul 2025 04:56 AM IST
सार
अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (आईसीजे) ने अपने एक फैसले में स्पष्ट किया है कि जलवायु परिवर्तन से निपटना सभी देशों की कानूनी जिम्मेदारी है। अदालत ने देशों से उच्चतम महत्वाकांक्षा के साथ जलवायु लक्ष्य अपनाने और उन्हें समय के साथ मजबूत करने की बात कही। यह फैसला भारत की लंबे समय से चली आ रही जलवायु न्याय और ऐतिहासिक जिम्मेदारी की मांगों को मजबूती देता है, लेकिन भारत को घरेलू स्तर पर ज्यादा ठोस कदम उठाने की भी चुनौती देता है।
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जलवायु परिवर्तन
- फोटो : Freepic
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विस्तार
अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (आईसीजे) ने कहा है कि जलवायु परिवर्तन से लड़ना सभी देशों की कानूनी जिम्मेदारी है। विशेषज्ञों के मुताबिक, यह फैसला भारत की लंबे समय से चली आ रही जलवायु न्याय और ऐतिहासिक जिम्मेदारी की मांगों को मजबूती देता है, लेकिन भारत को घरेलू स्तर पर ज्यादा ठोस कदम उठाने की भी चुनौती देता है। भारत को इस मुद्दे पर अब खुद को भी साबित करना होगा। संयुक्त राष्ट्र की शीर्ष अदालत ने साफ कहा कि देशों को उच्चतम संभव महत्वाकांक्षा के साथ जलवायु लक्ष्यों को अपनाना होगा और समय के साथ उन्हें बेहतर बनाना होगा। यह राय बताती है कि कानून के तहत जलवायु परिवर्तन से लोगों की रक्षा करना अब जरूरी है।
आईसीजे की सलाहकार राय विकासशील देशों के लिए मौका
आईसीजे की बुधवार रात जारी की गई सलाहकार राय में कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत देशों के बाध्यकारी कानूनी दायित्व हैं, जिसमें लोगों को इसके हानिकारक प्रभावों से बचाना भी शामिल है। भारत जैसे ऐतिहासिक रूप से कम उत्सर्जक रहे देश जो जलवायु आपदाओं का अधिक सामना कर रहे हैं उनके लिए यह राय अहम है। क्लाइमेट एक्शन नेटवर्क साउथ एशिया के वरिष्ठ सलाहकार शैलेन्द्र यशवंत ने कहा, भारत की समानता और न्याय की मांग को आईसीजे ने पहचाना है, पर इससे भारत से ज्यादा उम्मीदें भी जुड़ गई हैं।
उन्होंने कहा कि भारत का यह तर्क कि कम उत्सर्जन वाले देशों पर बराबर बोझ न डाला जाए, मान्य है, लेकिन इससे वह कमजोर जलवायु लक्ष्यों का बहाना नहीं बन सकता।अब हर देश के लक्ष्य वैश्विक निगरानी और कानूनी जांच के दायरे में हैं। भारत के पास अपनी रणनीति सुधारने और वित्तीय न्याय के लिए नेतृत्व करने का मौका है।
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ये भी पढ़ें:- UN: जलवायु संकट पर संयुक्त राष्ट्र सख्त, अंतरराष्ट्रीय अदालत ने कहा- इसे नजरअंदाज करना होगा कानून का उल्लंघन
एनडीसी पर निर्भर रहने का युग हुआ समाप्त
सतत संपदा जलवायु फाउंडेशन के संस्थापक निदेशक हरजीत सिंह ने कहा कि आईसीजे की सलाहकार राय एक अभूतपूर्व कानूनी बदलाव है जो वैश्विक जलवायु संघर्ष को मौलिक रूप से पुनर्परिभाषित करता है। उन्होंने कहा कि यह न्यायसंगत कार्रवाई और अद्वितीय अंतरराष्ट्रीय सहयोग की एक स्पष्ट मांग है। इससे यह स्पष्ट होता है कि अब केवल राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (एनडीसी) पर निर्भरता का दौर खत्म हुआ। आईसीजे ने जोर देकर कहा है कि देशों के दायित्व पेरिस समझौते से आगे तक फैले हुए हैं। बड़े प्रदूषक अब नहीं बच सकेंगे, क्योंकि आम अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत देशों पर जलवायु को नुकसान पहुंचाने से रोकने की जिम्मेदारी है।
भारत जैसे विकासशील देशों को ऐतिहासिक उत्सर्जकों से मांग का हक
पर्यावरण रक्षा कोष में भारत के मुख्य सलाहकार हिशाम मुंडोल कहते है, आईसीजे का यह फैसला बताता है कि जलवायु कार्रवाई अब केवल नैतिक या राजनीतिक नहीं, बल्कि कानूनी कर्तव्य है। उनके मुताबिक, इस राय से विकासशील देशों को यह कानूनी आधार मिलेगा कि वे ऐतिहासिक उत्सर्जकों यानी अमीर देशों से ग्रीन हॉउस गैसों के उत्सर्जन में ज्यादा कटौती और आर्थिक सहायता की मांग कर सकें। यह फैसला जलवायु न्याय और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की ज़रूरत को कानूनी मान्यता देता है। अब भारत जैसे देश तकनीकी और वित्तीय सहायता की कानूनी मांग कर सकते हैं, लेकिन साथ ही भारत को प्रामाणिक और संतुलित जलवायु नेतृत्व भी दिखाना होगा।
ये भी पढ़ें:- Gaza Conflict: गाजा युद्धविराम वार्ता से अमेरिका ने झाड़ा पल्ला, हमास पर लगाए आरोप; लोगों की भुखमरी बनी चुनौती
अतिरिक्त जिम्मेदारी का भारत ने किया था विरोध
भारत उन 50 से अधिक देशों में शामिल था जिन्होंने इस वर्ष की शुरुआत में हेग में आईसीजे को मौखिक और लिखित दलीलें दी थीं। भारत ने तर्क दिया था कि जलवायु परिवर्तन से निपटने की जिम्मेदारी को समान लेकिन विभेदित जिम्मेदारियों और संबंधित क्षमताओं (सीबीडीआर) के आधार पर देखा जाए। भारत ने साफ किया कि पेरिस समझौते और और जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन (यूएनएफसीसीसी) से बाहर कोई अतिरिक्त जिम्मेदारी अंतरराष्ट्रीय कानून की सहमति प्रक्रिया के खिलाफ होगी।
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आईसीजे की सलाहकार राय विकासशील देशों के लिए मौका
आईसीजे की बुधवार रात जारी की गई सलाहकार राय में कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत देशों के बाध्यकारी कानूनी दायित्व हैं, जिसमें लोगों को इसके हानिकारक प्रभावों से बचाना भी शामिल है। भारत जैसे ऐतिहासिक रूप से कम उत्सर्जक रहे देश जो जलवायु आपदाओं का अधिक सामना कर रहे हैं उनके लिए यह राय अहम है। क्लाइमेट एक्शन नेटवर्क साउथ एशिया के वरिष्ठ सलाहकार शैलेन्द्र यशवंत ने कहा, भारत की समानता और न्याय की मांग को आईसीजे ने पहचाना है, पर इससे भारत से ज्यादा उम्मीदें भी जुड़ गई हैं।
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उन्होंने कहा कि भारत का यह तर्क कि कम उत्सर्जन वाले देशों पर बराबर बोझ न डाला जाए, मान्य है, लेकिन इससे वह कमजोर जलवायु लक्ष्यों का बहाना नहीं बन सकता।अब हर देश के लक्ष्य वैश्विक निगरानी और कानूनी जांच के दायरे में हैं। भारत के पास अपनी रणनीति सुधारने और वित्तीय न्याय के लिए नेतृत्व करने का मौका है।
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एनडीसी पर निर्भर रहने का युग हुआ समाप्त
सतत संपदा जलवायु फाउंडेशन के संस्थापक निदेशक हरजीत सिंह ने कहा कि आईसीजे की सलाहकार राय एक अभूतपूर्व कानूनी बदलाव है जो वैश्विक जलवायु संघर्ष को मौलिक रूप से पुनर्परिभाषित करता है। उन्होंने कहा कि यह न्यायसंगत कार्रवाई और अद्वितीय अंतरराष्ट्रीय सहयोग की एक स्पष्ट मांग है। इससे यह स्पष्ट होता है कि अब केवल राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (एनडीसी) पर निर्भरता का दौर खत्म हुआ। आईसीजे ने जोर देकर कहा है कि देशों के दायित्व पेरिस समझौते से आगे तक फैले हुए हैं। बड़े प्रदूषक अब नहीं बच सकेंगे, क्योंकि आम अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत देशों पर जलवायु को नुकसान पहुंचाने से रोकने की जिम्मेदारी है।
भारत जैसे विकासशील देशों को ऐतिहासिक उत्सर्जकों से मांग का हक
पर्यावरण रक्षा कोष में भारत के मुख्य सलाहकार हिशाम मुंडोल कहते है, आईसीजे का यह फैसला बताता है कि जलवायु कार्रवाई अब केवल नैतिक या राजनीतिक नहीं, बल्कि कानूनी कर्तव्य है। उनके मुताबिक, इस राय से विकासशील देशों को यह कानूनी आधार मिलेगा कि वे ऐतिहासिक उत्सर्जकों यानी अमीर देशों से ग्रीन हॉउस गैसों के उत्सर्जन में ज्यादा कटौती और आर्थिक सहायता की मांग कर सकें। यह फैसला जलवायु न्याय और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की ज़रूरत को कानूनी मान्यता देता है। अब भारत जैसे देश तकनीकी और वित्तीय सहायता की कानूनी मांग कर सकते हैं, लेकिन साथ ही भारत को प्रामाणिक और संतुलित जलवायु नेतृत्व भी दिखाना होगा।
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अतिरिक्त जिम्मेदारी का भारत ने किया था विरोध
भारत उन 50 से अधिक देशों में शामिल था जिन्होंने इस वर्ष की शुरुआत में हेग में आईसीजे को मौखिक और लिखित दलीलें दी थीं। भारत ने तर्क दिया था कि जलवायु परिवर्तन से निपटने की जिम्मेदारी को समान लेकिन विभेदित जिम्मेदारियों और संबंधित क्षमताओं (सीबीडीआर) के आधार पर देखा जाए। भारत ने साफ किया कि पेरिस समझौते और और जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन (यूएनएफसीसीसी) से बाहर कोई अतिरिक्त जिम्मेदारी अंतरराष्ट्रीय कानून की सहमति प्रक्रिया के खिलाफ होगी।