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Independence Day 2021: विदेशियों को भारत में पग-पग पर प्रतिरोध का करना पड़ा सामना
सार
- यूरोपीय शक्तियों के विरुद्ध भारतीय प्रतिरोध विश्व इतिहास में है अनूठा उदाहरण
- समारोहों की इस शृंखला के बीच जहां स्वतंत्र भारत की 75 वर्षों की यात्रा का होगा मूल्यांकन
- भारतीय शिक्षा व्यवस्था को नष्ट करने के प्रयासों को विफल करने के लिए कॉलेज और विश्वविद्यालय का रहा महत्वपूर्ण योगदान
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भारत का स्वतंत्रता दिवस
- फोटो : twitter
विस्तार
आज भारत औपनिवेशिक दासता से मुक्ति का पर्व मना रहा है। समारोहों की इस शृंखला के बीच जहां स्वतंत्र भारत की 75 वर्षों की यात्रा का मूल्यांकन होगा, वहीं इसे पाने के लिए चार शताब्दी से अधिक चले संघर्ष और बलिदान का स्मरण भी स्वाभाविक है। भारत में औपनिवेशिक दासता के विरुद्ध चला राष्ट्रीय आंदोलन ‘स्व’ के भाव से प्रेरित था, जिसका प्रकटीकरण स्वधर्म, स्वराज और स्वदेशी की त्रयी के रूप में पूरे देश को मथ रहा था।
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संतों और मनीषियों के सानिध्य से आध्यात्मिक चेतना अंतर्धारा के रूप में आंदोलन में निरंतर प्रवाहित थी। युगों-युगों से भारत की आत्मा में बसा ‘स्व’ का भाव अपनी संपूर्ण शक्ति के साथ प्रकट हुआ और इन विदेशी शक्तियों को पग-पग पर प्रतिरोध का सामना करना पड़ा।
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इन शक्तियों ने भारत की आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और शैक्षिक व्यवस्था को तहस-नहस किया, ग्राम स्वावलंबन को नष्ट कर डाला। विदेशियों के चौतरफा आक्रमण का भारत ने हर तरह से प्रतिकार किया।
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शिक्षा व्यवस्था नष्ट करने के प्रयास विफल
भारतीय शिक्षा व्यवस्था को नष्ट करने के प्रयासों को विफल करने के लिए काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, शांति निकेतन, गुजरात विद्यापीठ, एमडीटी हिन्दू कॉलेज तिरुनेलवेल्ली और गुरुकुल कांगड़ी जैसे संस्थान उठ खड़े हुए और छात्र-युवाओं में देशभक्ति का ज्वार जगाने लगे। प्रफुल्लचंद्र राय और जगदीश चंद्र बसु ने जहां अपनी प्रतिभा को भारत के उत्थान के लिये समर्पित कर दिया वहीं नंदलाल बोस, अवनींद्रनाथ ठाकुर और दादा साहब फाल्के और माखनलाल चतुर्वेदी सहित प्रायः सभी राष्ट्रीय नेता पत्रकारिता के माध्यम से जनजागरण में जुटे थे।
विश्व इतिहास में अनूठा उदाहरण
यूरोपीय शक्तियों के विरुद्ध भारतीय प्रतिरोध विश्व इतिहास में अनूठा उदाहरण है। यह बहुमुखी प्रयास था जिसमें एक ओर विदेशी आक्रमण का सशस्त्र प्रतिकार किया जा रहा था तो दूसरी ओर समाज को शक्तिशाली बनाने के लिए इसमें आई विकृतियों को दूरकर सामाजिक पुनर्रचना का काम जारी था। 1857 के समर इसका ही फलितार्थ था जिसमें लाखों लोगों ने बलिदान दिया।
सांस्कृतिक जड़ों को मजबूती
बंगाल में राजनारायण बोस द्वारा हिंदू मेलों का आयोजन, महाराष्ट्र में लोकमान्य तिलक द्वारा गणेशोत्सव और शिवाजी उत्सव जैसे सार्वजनिक कार्यक्रम जहां भारत की सांस्कृतिक जड़ों को सींच रहे थे वहीं ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले जैसे सुधारक महिला शिक्षा और समाज के वंचित वर्ग को सशक्त में जुटे थे।
हर क्षेत्र पर गांधी का प्रभाव
समाज जीवन का कोई क्षेत्र महात्मा गांधी के प्रभाव से अछूता नहीं था। वहीं, विदेशों में रह कर भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को धार देने का काम श्यामजी कृष्ण वर्मा, लाला हरदयाल और मैडम कामा के संरक्षण में प्रगति कर रहा था। लंदन का इंडिया हाउस भारत की स्वतंत्रता संबंधी गतिविधियों का केंद्र बन चुका था।
सबसे सफल लोकतंत्र भारत
स्वतंत्रता के पश्चात इन राज्यों के संघ के रूप में भारतीय गणतंत्र का उदय हुआ। भारत ने लोकतंत्र का मार्ग चुना। आज वह विश्व का सबसे बड़ा और सफल लोकतंत्र है। जिन लोगों ने भारत के सांस्कृतिक मूल्यों की रक्षा के लिए स्वतंत्रता के आन्दोलन में अपना योगदान किया, उन्होंने ही भारत के लिये संविधान की रचना का कर्तव्य भी निभाया।
(लेखक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह हैं।)