नैनीताल की जेल में एक साथ बंद थे बाप पूर्णानंद और बेटे नारायण दत्त तिवारी
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उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड के मुख्यमंत्री, विकास पुरुष के नाम से मशहूर और आंध्र प्रदेश के राज्यपाल पद से हटाए गए पंडित नारायण दत्त तिवारी ने लंबी बीमारी के बाद अंतिम सांस ले ली। नारायण दत्त के जीवन का हर पल बड़े-उतार चढ़ाव से गुजरा। यूनाइटेड प्राविंस (बाद में उ.प्र.) के नैनीताल जिले के बलूती गांव निवासी नारायण दत्त के पिता पूर्णानंद तिवारी अंग्रेजी हूकूमत में वन अधिकारी थे।
महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन से प्रेरणा लेकर उन्होंने नौकरी छोड़ दी, आजादी की लड़ाई में कूदे और गिरफ्तार करके नैनीताल जेल भेज दिए गए। पुत्र नारायण भी नक्शे कदम पर चले, 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में हिस्सा लिया, पोस्टर आदि बनाने में मदद की और जेल भेज दिए गए। यह अजीब इत्तेफाक था कि जब वह जेल पहुंचे तो उनके पिता भी उसी नैनीताल जेल में बंद थे।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय में किया था टॉप
इलाहाबाद विश्वविद्यालय के एमए(राजनीति विज्ञान) के छात्र नारायण दत्त टॉपर थे। एमए के बाद उन्होंने लॉ की पढ़ाई की। 1947 में विश्वविद्यालय छात्र संघ का चुनाव लड़ा और अध्यक्ष चुने गए। मेधा के धनी थे। 1951-52 में उ.प्र. गठन हुआ। वह नैनीताल (उत्तर) विधानसभा सीट से सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़े और कांग्रेस पार्टी की हवा के बाद भी विधायक चुन लिए गए।
इस तरह से वह उ.प्र. की पहली विधानसभा के सदस्य बन गए। 1963 में तिवारी ने कांग्रेसी हो गए। 1965 में काशीपुर विधानसभा सीट से चुनाव लड़े, जीते और प्रदेश सरकार में मंत्री बनाए गए। 1968 में तिवारी के प्रयास नेहरू युवा केन्द्र की स्थापना हुई।
1969 में वह युवक कांग्रेस के अध्यक्ष बने और 1976 में नारायण दत्त तिवारी उ.प्र. के मुख्यमंत्री बन गए। तिवारी उ.प्र. के तीन बार मुख्यमंत्री बने। वह पहले ऐसे नेता रहे जिन्हें उ.प्र. और उत्तराखंड का मुख्यमंत्री बने।
विकास पुरुष के नाम से थे मशहूर
नारायण दत्त तिवारी नब्बे के दशक तक उ.प्र. में विकास पुरुष के नाम से मशहूर थे। अपने समय में उद्योग धंधे, औद्योगिक क्षेत्र का विकास, सडक़, बिजली पानी का मॉडल तेजी से आगे बढ़ाया था। उत्तराखंड के पहले मुख्यमंत्री के तौर उन्होंने राज्य को अपने अनुभव से ढांचागत व्यवस्था दी थी। नारायण दत्त के बाद के मुख्यमंत्री भी उसे बहुत हद तक नहीं छेड़ पाए।
यहां तक कि संसाधनों के मामले में छत्तीसगढ़, झारखंड से कमतर उत्तराखंड शुरूआत में दोनों से अधिक तेजी से प्रगति करने वाला राज्य बन रहा था। तिवारी का मानना था कि पहाड़ पर बसे लोग नीचे उतरे तो रोजगार की तलाश में जहां गए, वहीं बस गए। पहाड़ पर नहीं लौटे। उन्होंने इसी को केंद्र में रखकर वहां रोजगार, उद्योगधंधे, औद्योगिक क्षेत्र की परिकल्पना की, ताकि पहाड़ का आदमी पहाड़ी क्षेत्र में रहे और नीचे उतरा आदमी अवसर देखकर लौट आए।
किस्मत ने दिया गच्चा
1990 के दशक तक किस्मत के धनी तिवारी को किस्मत ने ही गच्चा भी दिया। केंद्रीय मंत्रिमंडल में कई पोर्टफोलियो संभाल चुके और मधुरता के साथ हर चुनौती जीत वाले तिवारी पीएम मेटल थे। 1991 के लोकसभा चुनाव में नैनीताल सीट से मैदान में थे और यहां किस्मत ने धोखा दे दिया।
भाजपा के बलराज पासी ने यहां से महज 11419 मतों से जीत दर्ज करके न केवल तब के दिग्गज नेता नारायण दत्त तिवारी की बल्कि कांग्रेस और पूरे भारतीय राजनीति की ही किस्मत बदल दी। बतौर तिवारी यह चुनाव वह अभिनेता दिलीप कुमार के चलते हारे। दिलीप कुमार को वह प्रचार के लिए बहेड़ी ले गए थे। दिलीप कुमार ने तिवारी के पक्ष में प्रचार किया और वहां यह खबर तेजी से फैल गई कि मुसलमान(युसुफ खान उर्फ दिलीप कुमार) नारायण दत्त के लिए प्रचार कर रहा है।
यह वह समय था, जब अयोध्या में रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद अपने चरम पर था। पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह की किस्मत गई चमक गई। कहा जा रहा था कि नारायण दत्त तिवारी को ही कांग्रेस पार्टी की बागडोर मिलने की संभावना थी, लेकिन उनके चुनाव हार जाने के बाद पासा ही पलट गया। इसके बाद नारायण दत्त तिवारी राजनीति में ढंग से उठ नहीं पाए।
कांग्रेस(तिवारी) पार्टी भी बनाई, लेकिन सफल नहीं हुए। 2002 में उत्तराखंड के उ.प्र. से अलग होने पर वह राज्य के पहले मुख्यमंत्री बने। वह आंध्र प्रदेश के राज्यपाल भी बनाए गए, लेकिन 2009 में एक महिला के आपत्ति जनक हाल में राजभवन का वीडियो वॉरल होने के बाद जहां उनकी बदनामी हुई, वहीं पद से इस्तीफा देना पड़ा।
नई पत्नी मिली, नया बेटा भी
2008 में दिल्ली की हाईकोर्ट में एक मुकदमा भी चला। तब तिवारी आंध्र प्रदेश के राज्यपाल थे। 32 वर्षीय शेखर ने उन्हें अपना जैविक पिता बताते हुए मामला दायर किया। नारायण दत्त को अदालत के आदेश पर खून के नमूने देने पड़े और अंत में उज्वला शर्मा के पुत्र शेखर को अपना बेटा मानना पड़ा। उज्वला शर्मा से तिवारी ने विवाह किया और वह उज्वला तिवारी हो गईं। तिवारी के साथ अंतिम समय तक शेखर और उज्वला ही उनके साथ रहे।