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किसान आंदोलनः ‘वार्ता’ और ‘विरोध’ की खिचड़ी ने बिगाड़ा ‘जायका’

Sun, 27 Dec 2020 01:05 AM IST
Amit Mandal हरि वर्मा, नई दिल्ली
हरि वर्मा, नई दिल्ली Published by: Amit Mandal Updated Sun, 27 Dec 2020 01:05 AM IST
सार

  • डेडलॉक के बीच सरकार को आंदोलनकारी किसानों का थ्री डी (डॉयलॉग, डेडलाइन, डेलिगेशन) का संदेश
  • संयुक्त किसान मोर्चा के जवाबी पत्र से समाधान के आसार कम, कड़वाहट दूर, खटास बाकी
  • फिर भी सरकार करेगी ‘बात’, औपचारिक घोषणा बाकी, कमेटी नहीं, 40 संगठनों के प्रतिनिधि होंगे
  • 29 दिसंबर को वार्ता का प्रस्ताव, तो 30 को केएमपी पर ट्रैक्टर-ट्रॉली रैली की घोषणा से मंशा साफ
  • दोनों पक्ष खुले मन से समाधान के लिए वार्ता कर हल निकाले तभी ‘सेलिब्रेशन’संभव 

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Farmers Protest: Talk and agitation going in together
किसानों का आंदोलन - फोटो : पीटीआई

विस्तार

नए कृषि सुधार कानूनों के खिलाफ आंदोलनकारी संयुक्त किसान मोर्चा ने वार्ता का प्रस्ताव देकर भले ही फिर से सरकार के पाले में गेंद डाल दी लेकिन ‘वार्ता’ और ‘विरोध’ की खिचड़ी से ‘खटास’ बढ़ गई है। अटल जयंती और क्रिसमस केक से कड़वाहट दूर करने की सरकार की कोशिश परवान चढ़ी लेकिन सशर्त वार्ता की पेशकश से जायका बिगड़ गया है।

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डॉयलॉग
संयुक्त किसान मोर्चा ने सरकार को 29 दिसंबर को 11 बजे बातचीत का प्रस्ताव भेजा है। सरकार बातचीत चाहती है, सो हामी भी भरेगी। फिर सभी वार्ता की मेज पर जुटेंगे। आंदोलकारियों का चार एजेंडा है। नए कानूनों की वापसी की प्रक्रिया, न्यूनतम समर्थन मूल्य की कानूनी गारंटी की प्रक्रिया, पराली और बिजली 2020 अधिनियम में राहत पर चर्चा। पराली और बिजली 2020 पर तो सरकार पहले ही नरमी के संकेत दे चुकी है। तीन कानूनों की वापसी का सवाल नहीं। न्यूनतम समर्थन मूल्य पर सरकार लिखित गारंटी को भी तैयार है। अब तर्क और दलीलों पर स्थिति निर्भर करेगी। ऐसे में डॉयलॉग से फिर डेडलॉक का अंदेशा बरकरार है।
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डेडलाइन 
संयुक्त किसान मोर्चा ने वार्ता की ‘डेडलाइन’ महज 24 घंटे रखी है। 29 दिसंबर को बातचीत और 30 दिसंबर को कुंडली-मानेसर-पलवल (केएमपी) हाई-वे पर ट्रैक्टर-ट्रॉली जाम का एलान। वार्ता और विरोध की साथ-साथ घोषणा से मंशा साफ है। डेडलॉक से डॉयलॉग के लिए कड़वाहट दूर लेकिन हल की पहल में खटास बरकरार। दिल्ली में इस आंदोलन को महीना भर हो चुका है। पांच दौर की बातचीत और अमित शाह के साथ चर्चा से जिन मुद्दों पर सहमति नहीं बनी, उन पर महज 24 घंटे में अब एक दौर की बातचीत से नतीजे की उम्मीद बेमानी है। किसान नेताओं ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर दुष्प्रचार का आरोप मढ़ा। सियासी विरोध के आरोपों को खारिज किया।
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‘डेडलाइन’ महज दबाव की रणनीति का हिस्सा नहीं। तीन दिन टोल फ्री अभियान में किसानों जमावड़ा बढ़ता जा रहा है। सिंघु-टिकरी बॉर्डर से शाहजहांपुर-राजस्थान मार्ग पर हजारों किसान जुटे हैं। एक निजी कंपनी के मोबाइल टॉवर के बिजली कनेक्शन काटे जा रहे हैं। कनेक्टिविटी प्रभावित हो रही है। राजस्थान हाई वे पर किसानों के इसी जमावड़े के बीच राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी के हनुमान बेनीवाल ने एनडीए से नाता तोड़ने की घोषणा की है।

डेलिगेशन
पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने कमेटी और सरकार ने डेलिगेशन पर जोर दिया था। हालांकि 29 दिसंबर को होने वाली वार्ता में सभी 40 किसान संगठनों के प्रतिनिधि होंगे। सरकार की ओर से इस पर आपत्ति भी नहीं होगी क्योंकि सरकार ने ही पत्र में इन 40 किसान संगठनों का जिक्र किया है। 35-40 प्रतिनिधि पहली वार्ता से ही हिस्सा रहे हैं। संयुक्त किसान मोर्चा का मानना है कि सात सदस्यों ने राष्ट्रीय स्तर पर आंदोलन की शुरुआत की थी लेकिन धीरे-धीरे देश के अन्य किसान संगठन जुटते गए। पहले दिन से जिन 40 शिष्टमंडल से बात हुई है, उन्हीं के साथ फिर वार्ता होगी। अकेले पांच-सात सदस्यीय कमेटी से वार्ता के पक्ष में नहीं।


सेलिब्रेशन
आंदोलनकारी किसानों ने दिल्ली-एनसीआरवासियों को नया साल सेलिब्रेट करने का न्योता दिया है। दूसरी ओर 30 दिसंबर से केएमपी हाईवे जाम का अल्टीमेटम भी। पिछले एक महीने से एनसीआर की सीमाओं पर आवाजाही प्रभावित है। नौकरीपेशा जूझ रहे हैं। दिल्ली से सटी हरियाणा, राजस्थान, यूपी की सीमाएं जाम हैं। ऐसे में यदि वार्ता खुले मन से नहीं की जाती, तो मुसीबत बढ़ेगी। लोगों ने लॉकडाउन और कोरोना संकट के चलते पहले ही बंद झेला है। अब इस आंदोलन के चलते फिर रेलगाड़ियां बेपटरी हैं। आर्थिक मोर्चे पर चुनौतियां हैं। आंकड़े रोजाना के नुकसान दर्शा रहे हैं। लोगों को कोरोना वैक्सीन का लाभ पहुंचाना है। ऐसे में किसान संगठनों के साथ-साथ सरकार से उम्मीद की जानी चाहिए कि दोनों थोड़ी नरमी बरतें। खुले मन से समाधान के लिए वार्ता हो। हल निकले तभी ‘सेलिब्रेशन’संभव है।

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