जानिए ! कैसे केंद्र सरकार ने किसानों के मुद्दे पर मोल ले ली आफत
- राजनाथ सिंह की अगुवाई में हुई चर्चा भी नहीं रोक पाई किसान आंदोलन
- आगे-आगे किसान संगठन और कांग्रेस
- पीछे-पीछे दूसरे राजनीतिक दल और सरकार
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
कभी-कभी सरकारों का अधिक आत्मविश्वास और सरकारी मिजाज धोखा दे देता है। किसानों के मामले में भी यही हुआ। सरकार के रणनीतिकार किसानों की चिंता को समझने की बजाय इसे विपक्ष और खासकर कांग्रेस द्वारा उन्हें भ्रमित करने का आरोप लगाकर लक्ष्य साधने की रणनीति में जुट गए, लेकिन उनकी यही रणनीति अब केंद्र सरकार के लिए बड़ा सिर दर्द बनने जा रही है। पूर्व कृषि मंत्री और वर्तमान रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को आगे करके चलने का दांव भी सफल नहीं हो पाया। अब स्थिति यह है कि आगे-आगे किसानों का आंदोलन और कांग्रेस चल रही है, पीछे-पीछे संगठन, दूसरे राजनीतिक दल और सरकार को आना पड़ रहा है।
पंजाब से चले किसान पानी की बौछार, सुरक्षा बलों और हरियाणा सरकार का गतिरोध झेलकर दिल्ली की सीमा पर आ डटे हैं। किसानों की योजना दिल्ली आने वाले दूसरे सभी रास्तों को घेरकर फल, फूल, सब्जी, दूध की आपूर्ति बाधित करने की है। अमर उजाला से विशेष बातचीत में एआईकेएससीसी के नेता सरदार वीएम सिंह ने पहले ही इस रणनीति का खुलासा कर दिया था।
किसान नेता चौधरी पुष्पेंद्र सिंह भी कहते हैं कि केंद्र सरकार की नासमझी में यह मामला बिगड़ गया है। सरकार ने किसानों को सही सम्मान नहीं दिया और मंत्रियों, नेताओं, हरियाणा के मुख्यमंत्री ने उनकी मांगों को राजनीति से प्रेरित बता दिया। सरकार किसानों को दुश्मन बताकर व्यवहार कर रही थी, लिहाजा अब मामला उल्टा पड़ना शुरू हो रहा है।
भारतीय किसान यूनियन (राजेवाल) के प्रधान बलवीर सिंह राजेवाल ने विशेष बातचीत में सरकार के निबटने के तरीके को किसानों का अपमान बताया है। राजेवाल ने कहा कि हमें जंतर-मंतर जाना था, हमारे साथ धोखा हुआ है। राजेवाल कहते हैं कि केंद्र सरकार हमारी समस्याओं को लेकर गंभीर नहीं है। वह हमें सुनने के बजाय टाल-मटोल करने में लगी है। हमारे साथ धोखा हुआ है।
कहां चूकी सरकार और उसके रणनीतिकार
किसान को मिल रहे जन समर्थन ने केंद्र सरकार की परेशानी बढ़ा दी है। पंजाब से न केवल भारी संख्या में किसान प्रदर्शन के लिए आगे आए, बल्कि दूसरे राज्यों से भी बड़ी संख्या में किसानों, किसान संगठनों ने उन्हें समर्थन देना शुरू कर दिया है। जबकि किसान मामले के जानकारों का कहना है कि केंद्र सरकार और भाजपा को ऐसी उम्मीद नहीं थी। सरदार वीएम सिंह, चौधरी पुष्पेंद्र सिंह, भारतीय किसान यूनियन (राजेवाल) के प्रधान बलवीर सिंह राजेवाल भी यही दोहराते हैं। माना जा रहा है कि सरकार और उसके रणनीतिकारों को लग रहा था कि किसानों के इस प्रदर्शन को राजनीति से प्रेरित, विपक्ष की शह पर किया गया अथवा विपक्ष द्वारा किसानों को भ्रमित कर खड़ा किया गया प्रदर्शन बताने से यह बड़ा रूप नहीं ले पाएगा। लेकिन ऐसा नहीं हो पाया।
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह अब दिखा रहे हैं विनम्रता
किसान नेताओं का कहना है कि वह पंजाब से चलने से पहले अपनी बात रख चुके थे। वीएम सिंह कहते हैं कि मैंने खुद 26-27 नवंबर को दिल्ली में किसानों के बड़े प्रदर्शन की चेतावनी दे दी थी, लेकिन सरकार ने इसे गंभीरता से नहीं लिया। अब केंद्रीय गृह मंत्री विनम्रता दिखा रहे हैं। चौधरी पुष्पेंद्र सिंह ने कहा कि अब गृह मंत्री ने सफाई दी है कि कभी भी प्रदर्शन को राजनीति से प्रेरित नहीं बताया। अब सरकार कह रही है कि वह किसानों से बातचीत के लिए तैयार है। यह तो पहले भी हो सकता था। पहले सरकार कोविड-19 का बहाना लेती रही और बाद में दिल्ली पहुंचने के रास्ते में अवरोध खड़े करने शुरू कर दिए। भारतीय किसान यूनियन (टिकैत) के नेता उमेश कहते हैं कि हरियाणा के मुख्यमंत्री किसानों पर लाठियां, पानी के बौछार की बारिश करा रहे हैं। पुलिस रास्ते को खोद रही है और मुख्यमंत्री किसानों के आंदोलन में असामाजिक तत्वों के होने की बात कह रहे हैं। क्या किसी सरकार की यह भाषा होनी चाहिए?
राजनाथ सिंह को कहा था कि कुछ ईमानदारी से हो पाए तो आइएगा
एआईकेएससीसी के नेता वीएम ने कहा कि उन्होंने रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह से फोन पर कह दिया था कि यदि सरकार कुछ ईमानदारी के साथ पहल करना चाह रही है तभी वार्ता की वह पहल करें। उनका कहना है कि राजनाथ सिंह किसानों को समझते हैं। वह अच्छे नेता हैं। इसलिए उन्होंने उनको अपनी चिंता बता दी थी। वीएम सिंह कहते हैं कि केंद्र सरकार की यह रणनीति सही नहीं थी कि वह तीन दिसंबर को किसान संगठनों से बात करेगी। फिर इसमें पहले पंजाब के ही किसान संगठनों को बुलाया जाएगा। वह कहते हैं कि इस तरह से नहीं होता। इससे पूरे देश के किसानों में एक अलग तरह का रोष है।
किसानों के साथ-साथ कांग्रेस, पीछे-पीछे अन्य दल, संगठन, सरकार
केंद्र सरकार द्वारा खेती खलिहानी से जुड़े तीन विधेयक लाने के बाद कांग्रेस ने इसका विरोध किया था। संसद भवन से लेकर किसानों की चौपाल तक कांग्रेस पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी किसानों के साथ खड़े हैं। इसके विपरीत केंद्र सरकार और भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने इस मुद्दे को लेकर किसानों में भ्रम फैलाने और उन्हें भ्रमित करने की संज्ञा दे दी।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद तीन महीने पहले एमएसपी को लेकर किसानों की चिंता को विपक्ष द्वारा फैलाया भ्रम बताया था। भाजपा के किसान मोर्चा के प्रभारी राजकुमार चाहर ने भी अमर उजाला से बातचीत में इसे कांग्रेस महासचिव प्रियंका द्वारा फैलाया भ्रम बताया। पंजाब से प्रदर्शन के लिए निकले काफिले को भी राजनीति से प्रेरित होने की संज्ञा दी जाती रही। अब स्थिति यह है कि पूरे देश से किसानों के प्रदर्शन को समर्थन मिलने लगा है।
मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह, शिरोमणि अकाली दल (बादल) के नेता सुखबीर सिंह बादल, समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव, बसपा प्रमुख मायावती, शिवसेना के नेता संजय राउत, आम आदमी पार्टी के नेता संजय सिंह, दिल्ली सरकार के मंत्री समेत अन्य ने केंद्र सरकार से बिना देर किए किसानों की समस्या पर ध्यान देने, किसान नेताओं से बात करने की अपील की है।
सरकार कर रही है मंथन, वार्ता का बना रही है आधार
अमर उजाला ने पहले रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की भूमिका बढ़ने का संकेत दिया था। रविवार को भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, गृह मंत्री अमित शाह, कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने किसानों की मांगों और आगे की रणनीतियों पर विचार किया। समझा जा रहा है कि सोमवार 30 नवंबर को वरिष्ठ नेताओं ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मार्ग दर्शन में किसान नेताओं से बातचीत का प्रस्ताव भेजने का मन बनाया है। अभी तक केंद्र सरकार इस बारे में किसान नेताओं की तरफ से प्रस्ताव के आने का इंतजार कर रही थी, लेकिन अब सरकार ने खुद की रणनीति में थोड़ा बदलाव किया है। किसानों के बुराड़ी न जाने के प्रस्ताव ने भी केंद्र सरकार की परेशानी बढ़ाई है। लिहाजा नए सिरे से किसानों से संपर्क साधने की कोशिश हो सकती है।
किसानों के बीच में खराब संदेश बिगाड़ सकता है सरकार की छवि
रणनीतिकार किसानों के प्रदर्शन से प्रधानमंत्री मोदी, केंद्र सरकार और भाजपा की छवि पर पड़ने वाले असर को लेकर भी गंभीर हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2022 तक किसानों की लागत को घटाने और उनकी आय में डेढ़ गुना तक की वृद्धि सुनिश्चित करके उनकी आमदनी में दो गुना वृद्धि करने का भरोसा दिया है। हालांकि इससे पहले भी किसान केंद्र सरकार से अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन कर चुके हैं, लेकिन इस बार न केवल प्रदर्शन का दायरा बढ़ता जा रहा है, बल्कि किसानों को दूसरे संगठनों, देश की प्रगतिशील बिरादरी और सेलेब्रिटी का भी समर्थन मिलने लगा है। ऐसे में केंद्र सरकार किसानों के बीच सरकार को लेकर गलत संदेश नहीं जाने देना चाहती।