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किसान आंदोलनः आज होने वाली नौवें दौर की वार्ता साबित हो सकती है निर्णायक

Fri, 15 Jan 2021 12:16 AM IST
संजीव कुमार झा हरि वर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली
हरि वर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: संजीव कुमार झा Updated Fri, 15 Jan 2021 12:16 AM IST
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Farmers Protest, negotiation formula with government is ready, less hope for solution
प्रदर्शन करते किसान (फाइल फोटो) - फोटो : PTI

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद सरकार और किसानों के बीच शुक्रवार को होने वाली नौवें दौर की वार्ता निर्णायक साबित हो सकती है। इस वार्ता का फार्मूला लगभग तय है लेकिन ठोस हल के आसार कम हैं। गुरुवार को भारतीय किसान यूनियन ‘मान’ के राष्ट्रीय अध्यक्ष भूपिंदर सिंह मान को सुप्रीम कोर्ट की बनाई गई चार सदस्यीय कमेटी से अपनी ही यूनियन के दबाव के बाद नाता तोड़ना पड़ा। किसान आंदोलन के लिए फिर शुक्रवार अहम है। 

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शुक्रवार को ही किसान आंदोलन के बहाने कांग्रेस अपनी राजनीतिक जमीन तलाशेगी। किसानों के समर्थन और कृषि कानूनों के विरोध में कांग्रेस का राजभवनों पर प्रदर्शन और किसान अधिकार दिवस प्रस्तावित है। नौवें दौर की वार्ता के बाद संयुक्त किसान मोर्चा ने अगले दिन 16 जनवरी को अपनी बैठक बुलाई है। इसमें सुप्रीम कोर्ट के फैसले, ताजा घटनाक्रम, सरकार से नौवें दौर की वार्ता की प्रगति के बाद 26 जनवरी के ट्रैक्टर मार्च व अगली रणनीति पर चर्चा होगी।
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वार्ता का फार्मूला
सुप्रीम कोर्ट के फैसले और उसकी बनाई गई चार सदस्यीय कमेटी से भाकियू मान के राष्ट्रीय अध्यक्ष भूपिंदर सिंह मान के अलग हो जाने के बाद शुक्रवार को होने वाली बैठक फिर कमेटी के इर्द-गिर्द घूम सकती है। सुप्रीम कोर्ट की बनी कमेटी पर अंसतोष जताने वाले आंदोलनकारी किसान संगठनों से कमेटी में उनकी नुमाइंदगी की पेशकश सरकार की ओर से की जा सकती है।
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सरकार चाहेगी कि कमेटी के लिए उनकी ओर से एक-दो नाम सुझाए जाएं, जिस पर सरकार वार्ता की प्रगति दर्शाकर सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी ले। यूं भी मान के इस कमेटी से अलग हो जाने के बाद किसान संगठन के प्रतिनिधित्व की राह खुल गई है। हालांकि, आंदोलनकारी किसान कमेटी या इसमें नुमाइंदगी की पेशकश को फिर खारिज कर सकते हैं। ऐसे में ठोस हल की उम्मीद कम है।

कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर भले सकारात्मक व खुले मन से वार्ता की उम्मीद जता रहे हों, लेकिन भाकियू डकौंदा के अध्यक्ष बूटा सिंह बुर्जगिल का मानना है कि सरकार इस बैठक में यही बता सकती है कि सुप्रीम कोर्ट ने जो कमेटी बनाई है, उसके पास अपना पक्ष रखें। कानून के बिंदुओं पर एतराज गिनाएं।

लोकतांत्रिक फैसले के लिहाज से भविष्य में कानूनों में संशोधन का भरोसा मिल सकता है। बूटा सिंह की दो टूक राय है कि कमेटी या कमेटी में नुमाइंदगी की पेशकश संयुक्त किसान मोर्चा को पहले से ही नामंजूर है। यह महज संयोग है कि 15 जनवरी को जब सरकार और किसानों के बीच वार्ता हो रही होगी तो कांग्रेस राज्यों में किसान अधिकार दिवस मनाकर अपनी सियासी जमीन तलाश रही होगी।

सुप्रीम कोर्ट की कमेटी को बाय-बाय ‘मान’ की मजबूरी

सुप्रीम कोर्ट की चार सदस्यीय कमेटी को बाय-बाय करने की भूपिंदर सिंह मान की मजबूरी की अंतर्कथा है। भूपिंदर सिंह मान के खिलाफ भाकियू मान में ही बगावत हो गई। संयुक्त मोर्चा में आंदोलन में सक्रिय भाकियू मान के नेता बलदेव सिंह मियांपुर ने भूपिंदर सिंह मान को ही दरकिनार कर दिया। बलदेव सिंह मियांपुर सरकार से वार्ता वाले 40 संगठनों में भी प्रतिनिधि हैं और इस आंदोलन को पंजाब से दिल्ली तक धार देने में भागीदार भी।

भाकियू मान की राष्ट्रीय अध्यक्ष की कुर्सी खिसकती देख आनन-फानन में भूपिंदर सिंह मान को बैकफुट पर आना पड़ा। मान ने पंजाब व किसानों के हित का हवाला देकर खुद को सुप्रीम कोर्ट की कमेटी से अलग करने का एलान किया। हालांकि, भाकियू मान में भूपिंदर सिंह मान का अब ‘सम्मान’ ही सवालों में है।

26 जनवरी के ट्रैक्टर मार्च की ‘चिंता’
सरकार और किसान संगठनों की चिंता 26 जनवरी के ट्रैक्टर मार्च को लेकर है। 15 जनवरी की वार्ता के अगले दिन संयुक्त किसान मोर्चा की बैठक है। इस बीच सरकार और आंदोलनकारी किसान दोनों नौवें दौर की वार्ता में एक-दूसरे का मन टटोल चुके होंगे। सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को ट्रैक्टर मार्च से जुड़ी याचिका पर सुनवाई से पहले सरकार की ओर से चिंता जताई जा सकती है। पिछली सुनवाई के दौरान सरकार की ओर से खलिस्तान की घुसपैठ का अंदेशा जताया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर सरकार से हलफनामा मांगा था। ऐसे में सोमवार की सुनवाई से पहले सरकार हलफनामा देकर अपनी ‘चिंता’ जाहिर कर सकती है।

वैसे, 26 जनवरी के ट्रैक्टर मार्च को लेकर किसान संगठन भी चिंतित हैं। टकराव टालने के लिए ट्रैक्टर मार्च के रुट व अन्य मुद्दों पर फैसला होना बाकी है। यह 16 की बैठक के बाद सामने आएगा। भाकियू के बलवीर सिंह राजेवाल ने आंदोलन में शामिल सभी जत्थेबंदियों को पत्र लिखकर फिलहाल उग्र बयानबाजी से बचने की नसीहत दी है।

गांधीवादी सत्याग्रह का ‘रास्ता’
सुप्रीम कोर्ट ने भी ‘चिंता’ जताते हुए पिछली सुनवाई के दौरान गांधीवादी सत्याग्रह का जिक्र कर शांतिपूर्ण आंदोलन की ओर इशारा किया था। ऐसे में आंदोलनकारी किसानों की ओर से राजपथ को किसान पथ बनाने से बचने पर विचार संभव है। आंदोलनस्थल पर ही राजपथ की झांकी दिखाकर गांधीवादी सत्याग्रह का ‘रास्ता’अख्तियार किया जा सकता है। गणतंत्र दिवस पर बॉर्डर के आंदोलनस्थलों पर बड़े एलईडी पर गणतंत्र दिवस की झांकी दिखाकर ‘खलिस्तान’ का जवाब ‘हिंदुस्तान’ से देने पर विचार किया जा सकता है।

गणतंत्र दिवस के दिन दोपहर बाद दिल्ली की बाहरी सीमाओं वाले एक्सप्रेस वे पर ट्रैक्टर परेड का भी विचार है। हालांकि, अंतिम निर्णय संयुक्त मोर्चा  की 16 जनवरी की बैठक में होगी। इसकी घोषणा आगे की जाएगी। किसान नेताओं का मानना है कि सरकार बदनाम करने की ताक में है, लेकिन कानून वापसी तक हमारा अहिंसक विरोध जारी रहेगा।

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