किसान बोले, सरकार की योजनाओं से किसानों को नहीं मिला लाभ, प्राइवेट कंपनियां रहीं फायदे में
- किसान नेताओं ने कहा, केंद्र ने मान लिए हैं ज्यादातर सुझाव, लेकिन कानून का फ्रेमवर्क पुराना रखने की हो रही कोशिश
- नरेंद्र मोदी सरकार की छह साल की कोशिशों के जमीनी बदलाव से किसानों का इनकार, कुछ ने कहा- बेहतर जानकारी देते तो हो सकता था लाभ
विस्तार
पिछले 27 दिनों से चल रहे किसान आंदोलन का कोई हल क्यों नहीं निकल रहा है? केंद्र सरकार किसानों की बात नहीं सुन रही है, या किसान ही केंद्र सरकार की बात समझने को तैयार नहीं हैं? जब किसान नेताओं से ये सवाल पूछे तो उनका जवाब था कि केंद्र सरकार अब केवल अपनी इज्जत बचाने की कोशिश कर रही है। वह किसानों की ज्यादातर मांगें मानने को तैयार हो गई है, लेकिन कानून का वर्तमान फ्रेम बरकरार रखकर अपनी साख बचाने का प्रयास कर रही है।
किसानों के ये जवाब ऐसे समय में आए हैं जब केंद्र और किसानों के बीच एक और दौर की वार्ता की कोशिश चल रही है। किसानों का यह भी आरोप है कि मोदी सरकार ने जितनी भी योजनाएं लांच की हैं, उनका किसानों से ज्यादा लाभ कॉर्पोरेट कंपनियों को हुआ है।
आढ़ती किसान संघर्ष कमेटी, पंजाब के अध्यक्ष रविंदर सिंह चीमा ने अमर उजाला से कहा कि केंद्र सरकार और उनके बीच अब तक पांच दौर की वार्ता हो चुकी है। इसके अलावा गृहमंत्री अमित शाह और केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर से भी कई दौर की बातचीत हो चुकी है। इनमें सरकार हमारे सभी मुद्दों से सहमत दिखती है, लेकिन इसके बाद भी वह कानून का वर्तमान फ्रेम बरकरार रखना चाहती है। यह कानून से ज्यादा सरकार की साख और अहम का मामला लगता है। उन्होंने कहा कि सरकार को अहम नहीं रखना चाहिए क्योंकि अपने देश के किसानों की बात मानकर किसी सरकार की साख कम नहीं होती।
वहीं, किसानों के पास पीछे जाने का कोई विकल्प नहीं है। यह आंदोलन तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने की मांग से शुरू हुआ था और आज भी उसी पर कायम है। किसान अपनी मांगों से उसी कीमत पर वापस हटने को तैयार हैं जब सरकार तार्किक रूप से यह बता सके कि उसकी कोशिशों से किसानों की आय में प्रति माह कितने रुपये की वृद्धि हुई है। सरकार ऐसा कोई जवाब देने की स्थिति में नहीं हैं, लिहाजा वे सरकार की कोई बात सुनने को तैयार नहीं हैं।
किसानी के मॉडल पर है सबसे बड़ा वैचारिक मतभेद
ऑल इंडिया किसान संघर्ष समन्वय समिति के सदस्य डॉक्टर सुनीलम बताते हैं कि केंद्र सरकार और किसान नेताओं के कृषि मॉडल में जमीनी अंतर है। यही कारण है कि दोनों में समझौते की कोई राह नहीं निकल रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि कॉर्पोरेट कंपनियों के सुझाव पर तैयार किए गए केंद्र के कृषि मॉडल में किसान और कॉर्पोरेट कंपनियों में समझौता करके किसानी करने की बात कही जा रही है।
इससे खेत में उत्पन्न होने वाली फसल पर खुद खेत के मालिक का ही कोई अधिकार नहीं रह जाएगा। इसके बाद किसानों के पास नौकरी करने के अलावा कोई विकल्प नहीं होगा और वह इन्हीं कंपनियों का नौकर बनकर इन्हीं खेतों में काम करेगा। नकदी फसलों की खेती के लालच ने भी उसे कर्ज और आत्महत्या तक पहुंचाया है।
जबकि आज की वर्तमान स्थिति में किसान खेत का मालिक है। वह स्वयं ही यह निर्णय लेता है कि उसे खेत में क्या फसल उगानी है, उसे कब और कहां बेचना है और कितना स्वयं इस्तेमाल करना है और कितना उसे बाजार में देना है। परंपरागत खेती में किसान संपन्न भले ही न हो, लेकिन उसकी आत्महत्या की स्थिति भी नहीं आती। जबकि कॉर्पोरेट खेती में किसान खुद अपने ही खेतों से एक फल तोड़ने का भी अधिकारी नहीं होगा। किसानों और सरकार के बीच कृषि मॉडल पर यही मूलभूत वैचारिक अंतर है जिसके कारण इसका स्थाई समाधान नहीं मिल पा रहा है।
एमएसपी को वैधानिक बनाएं तो निकल सकता है रास्ता
भारतीय किसान संघ के दिल्ली प्रांत अध्यक्ष हरपाल सिंह डागर कहते हैं कि सरकार किसानों की सबसे ब़ड़ी जरूरत को कानूनी रूप देने को तैयार नहीं है। यही कारण है कि किसानों और उसके बीच कोई समाधान नहीं निकल रहा है। अगर सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य को वैधानिक बना दे तो तुरंत समाधान निकल सकता है।
अखिल भारतीय स्वामीनाथन संघर्ष समिति के अध्यक्ष विकल पचार ने कहा कि केंद्र सरकार के एक भी कानून ने आज तक किसानों को लाभ नहीं पहुंचाया है। अगर सरकार एपीएमसी मंडियों के साथ-साथ खुले बाजार में भी एमएसपी पर खरीद को कानूनी बनाए और न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम की खरीदी पर जेल भेजने का प्रावधान कर दे तो तुरंत समाधान निकल सकता है।
मोदी सरकार के उपाय कितने रहे कारगर
भाजपा नेता ममता उपाध्याय का कहना है कि केंद्र सरकार ने किसानों की भलाई के लिए कई कानूनी प्रावधान किए हैं। किसानों को सम्मान निधि के रूप में प्रति वर्ष 6000 रुपये देने की योजना भारत में पहली बार शुरू की गई। इसके अलावा कृषि मंत्रालय का बजट बढ़ाकर फसलों की खरीद में रिकॉर्ड वृद्धि की गई। सिंचाई, यूरिया और मृदा स्वास्थ्य के लिए योजनाएं शुरू की गईं।
लेकिन किसान नेता कहते हैं कि ये बदलाव प्रतीकात्मक साबित हुए हैं। फसल बीमा को सरकार ने बहुप्रचारित किया था, लेकिन इसका लाभ किसानों से ज्यादा बीमा कंपनियों को मिला। इसी प्रकार सम्माननिधि का लाभ केवल कुछ सीमांत किसानों को ही मिला है। हालांकि, हरपाल सिंह डागर कहते हैं कि योजनाओं का सही प्रचार न करने से उनका लाभ किसानों को नहीं मिल पाता। अगर योजनाओं का सही से प्रचार प्रसार किया जाता तो इसका किसानों को ज्यादा लाभ मिलता। सौर ऊर्जा से सिंचाई जैसी योजनाएं किसानों के लिए बहुत लाभकारी हैं, इसके लिए किसानों को भी आगे आना चाहिए।
किसानों की आय कैसे बढ़े
परंपरागत कृषि किसानों को आर्थिक दृष्टि से सशक्त नहीं बना सकी है। ऐसे में कृषि क्षेत्र में कॉर्पोरेट कंपनियों के लाने पर विचार क्यों नहीं होना चाहिए। इस पर सुनीलम का कहना है कि किसानों की आय बढ़ाने के लिए हर फसल की खरीद को एपीएमसी और खुले बाजार, हर प्रकार के बाजार में न्यूनतम समर्थन मूल्य मिलना अनिवार्य किया जाना चाहिए।