किसान आंदोलन में कमजोर कड़ी कौन? अमित शाह अगर एक को बुलाते तो भी जाते
अगर सरकार अपनी इज्जत बचाने के लिए कुछ कर रही है तो हम तैयार हैं। किसानों का मकसद सरकार की इज्जत उछालना नहीं है। हमें तो केवल अपनी मांग पूरी करानी है
अगर सरकार अपनी इज्जत बचाने के लिए कुछ कर रही है तो हम तैयार हैं। किसानों का मकसद सरकार की इज्जत उछालना नहीं है। हमें तो केवल अपनी मांग पूरी करानी है
विस्तार
संयुक्त किसान मोर्चे के आह्वान पर बुलाए गए 'भारत बंद' की अवधि खत्म होते ही केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने किसानों को बातचीत के लिए बुला लिया है। हालांकि किसान संगठनों के प्रतिनिधियों और केंद्रीय मंत्रियों के बीच पहले से तय बैठक बुधवार को होनी है। लेकिन किसान आंदोलन में कमजोर कड़ी कौन, क्या अब आंदोलन में फूट पड़ गई है, आदि सवालों का जवाब किसान संगठनों के प्रतिनिधि ने जरुर दिया, लेकिन एक घुमावदार अंदाज में। उन्होंने स्पष्ट कुछ नहीं कहा, लेकिन उन्हें यह अहसास था कि अब कुछ हालात हाथ से बाहर जाते दिख रहे हैं।
अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति (एआईकेएससीसी) के सदस्य अविक साहा ने बताया, हम जिद पर नहीं अड़ रहे। अगर अमित शाह एक किसान को बुलाते तो भी हम बातचीत के लिए पहुंचते। चाहे 30 किसान जाएं या एक, हमारा संकल्प और मांग, वही रहेगी। भारत बंद से सरकार की आंखें खुल गई हैं। आंदोलन में किसानों के अलावा जब दूसरे वर्ग शामिल होने लगे, तब जाकर केंद्र सरकार की नींद टूटी है।
अविक साहा ने बताया, किसानों के पास संकल्प है और सरकार के पास विकल्प है। शक्ति प्रदर्शन करना, किसान संगठनों का ऐसा कोई मकसद न तो पहले था और न ही आज है। अगर किसानों को आज अपना खेत छोड़कर आंदोलन के लिए उतरना पड़ रहा है तो उसके पीछे वजह है। ये न्याय, आजीविका और भावी पीढ़ी के हितों की लड़ाई है।
उन्होंने कहा, यह बात सही है कि किसान आंदोलन को तोड़ने के प्रयास तो बहुत पहले ही शुरू हो गए थे। सरकार ने आंदोलन में फूट डालने के सारे हथकंडे अपनाए हैं। कमजोर कड़ी कौन, अभी इस बाबत कुछ कहना जल्दबाजी होगी। अगर सरकार अपनी इज्जत बचाने के लिए कुछ कर रही है तो हम तैयार हैं। किसानों का मकसद सरकार की इज्जत उछालना नहीं है। हमें तो केवल अपनी मांग पूरी करानी है। अब ये केंद्र सरकार को देखना है कि वह कैसे तीनों कानूनों को वापस लेती है।
दूसरी ओर पंजाब किसान यूनियन के नेता आरएस मानसा का कहना है कि उन्हें रामलीला मैदान दे दिया जाए। किसान वहां बैठकर धरना प्रदर्शन करेंगे। इससे दिल्लीवालों को भी कोई दिक्कत नहीं होगी।
एआईकेएससीसी के संयोजक योगेंद्र यादव का कहना है कि केंद्रीय मंत्रियों के साथ चल रही बैठक में पंजाब से किसान संगठनों के तीस पदाधिकारी बैठक में शामिल होते थे, अब केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने केवल आठ लोगों को बुलाया है। पांच प्रतिनिधि देश के दूसरे हिस्सों से हैं। कुल 13 लोगों के साथ बातचीत होगी। ऐसा लगता है कि इस बैठक के बाद गृह मंत्री कोई प्रेस नोट जारी नहीं करेंगे।
यादव ने कहा, गृह मंत्री को पहले यह सोचना चाहिए कि उनका अहंकार बड़ा है या किसानों की समस्या। दिल्ली चलो आंदोलन दो माह पहले ही शुरू हो गया था, तब सरकार ने बातचीत का न्यौता नहीं दिया। लेकिन ये बात ध्यान रहे कि अब ये आंदोलन अगर मकसद पूरा हुए बिना ही खत्म हो गया तो बीस साल तक किसान खड़ा नहीं हो सकेगा। हर बात में बीच का रास्ता नहीं होता।
एआईकेएससीसी के संयोजक ने साफतौर पर कहा, अगर सरकार ने तीनों कानूनों को वापस नहीं लिया तो ये आंदोलन आगे बढ़ता रहेगा। आंदोलन में फूट डालने के सवाल पर यादव ने कहा, सरकार ने यह प्रयास तो पहले ही दिन से शुरू कर दिया था। अभी तक सभी किसान संगठन एक हैं और सरकार अपने मंसूबों में कामयाब नहीं होगी।