378 दिन का नफा-नुकसान: किसानों को क्या हासिल हुआ, क्या सरकार ने कुछ खोया? जानें सबकुछ
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विस्तार
दिल्ली की सीमाएं 378 दिन से जाम थीं। हालात ऐसे थे कि किसानों की मोर्चाबंदी सिर्फ दिल्ली की सीमाओं पर नहीं, बल्कि केंद्र सरकार के चारों तरफ हो चुकी थी। ऐसे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 19 नवंबर को गुरु नानक जयंती पर तीनों कृषि कानून वापस लेने का एलान किया तो यह मसला सुलझने के आसार बनने लगे, लेकिन किसानों ने एमएसपी समेत अन्य मांगों को पूरा करने की डिमांड रख दी। इसके बाद दोनों पक्षों में बातचीत के दौर शुरू हुए और महज 20 दिन बाद (9 दिसंबर) को किसानों ने आंदोलन वापसी का एलान कर दिया। अब सवाल उठता है कि इस आंदोलन से किसानों को क्या हासिल हुआ? क्या सरकार ने कुछ खोया? इस स्पेशल रिपोर्ट में जानते हैं आंदोलन के इन 378 दिनों का नफा-नुकसान...
ऐसे शुरू हुआ था किसानों का आंदोलन
साल 2020 के सितंबर महीने से कृषि कानून का विरोध कर रहे किसानों ने सख्त रुख अपनाया तो नवंबर की 26 तारीख को दिल्ली की ओर कूच कर दिया। शुरुआत में काफी लोग किसानों के समर्थन में थे, लेकिन 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस पर ट्रैक्टर रैली के दौरान हुए उपद्रव ने किसानों के प्रति लोगों की सहानुभूति कम कर दी। इसका नतीजा यह हुआ कि किसान आंदोलन को लगभग खत्म माना जाने लगा। हालांकि, गाजीपुर बॉर्डर पर किसान नेता राकेश टिकैत के आंसुओं ने आंदोलन में नई जान फूंक दी।
किसानों ने कायम की मिसाल
मोदी सरकार की बात करें तो वह अपने अडिग रवैये को लेकर हमेशा चर्चा में रही। बात चाहे तीन तलाक कानून की हो या नागरिकता संशोधन कानून की, हर मोर्चे पर उभरा आंदोलन किसी भी हालत में केंद्र सरकार के सामने टिक नहीं पाया। हालांकि, किसानों ने उस परिपाटी को बदल दिया। वे अंत तक अपनी मांगों पर डटे रहे और उन्हें मनवाकर ही माने।
इन मसलों पर भी किसानों को मिली थी जीत
अहम बात यह है कि किसानों ने सिर्फ कृषि कानूनों के मसले पर ही जीत हासिल नहीं की है, बल्कि वे अब तक जिन मुद्दों पर अड़े, अपनी मांगें मनवाकर ही माने। दरअसल, जनवरी 2015 के दौरान केंद्र सरकार भूमि अधिग्रहण कानून में बदलाव के लिए अध्यादेश लेकर आई थी, लेकिन यह किसानों को पसंद नहीं आया। देशभर के किसान सड़कों पर उतर आए और सरकार को अपने कदम पीछे खींचने पड़ गए। इसके अलावा 2017 में तमिलनाडु के किसानों की कर्जमाफी, 2018 की क्रांति यात्रा और इसी साल नवंबर में आयोजित महासभा में भी किसान अपनी बात मनवाने में कामयाब रहे थे।
क्या सरकार ने कुछ गंवाया?
कुछ राजनीतिक जानकारों का मानना है कि किसानों के मामले में सरकार को बार-बार अपने कदम पीछे खींचने को मजबूर होना पड़ा, जो उसकी छवि को नुकसान पहुंचा सकता है। हालांकि, कई राजनीतिक विश्लेषक यह भी मानते हैं कि किसानों के आंदोलन को खत्म करके सरकार ने मास्टरस्ट्रोक चल दिया है। पार्टी को इसका फायदा पंजाब और उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में मिल सकता है। दरअसल, सरकार के इस कदम ने कांग्रेस समेत तमाम विपक्षी दलों के हाथ से वह बड़ा मुद्दा छीन लिया, जिसके सहारे उन्हें चुनाव में बढ़त मिलने की उम्मीद थी। ऐसे में इस मसले में कदम पीछे खींचना भी मोदी सरकार के लिए फायदे का सौदा साबित हो सकता है, क्योंकि इससे आम जनता के मन में यह धारणा बनेगी कि सरकार की कोशिश हर मसले को सुलझाने की ही है।