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SCO: मोदी-जिनपिंग वार्ता के जरिये US को बड़ा संदेश देने की तैयारी में 20 देश, एससीओ बैठक पर दुनिया की निगाहें
Fri, 29 Aug 2025 06:32 AM IST
दीपक कुमार शर्मा
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
Published by: दीपक कुमार शर्मा
Updated Fri, 29 Aug 2025 06:32 AM IST
सार
अमेरिकी टैरिफ के मामले में भारत लगातार दबाव में नहीं आने का संदेश दे रहा है। खुद पीएम नरेंद्र मोदी ने कई बार कहा कि भारत दबाव में आने के बदले संकट का सामना करने के लिए तैयार है। भारत ने अब तक रूस से तेल के आयात में कटौती नहीं की है। इसके इतर टैरिफ के संकेत के बाद से भारत नए बाजार की तलाश में कई देशों के साथ अहम समझौते कर चुका है।
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विदेश सचिव विक्रम मिस्री
- फोटो : अमर उजाला प्रिंट
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विस्तार
अमेरिकी टैरिफ से बने असमंजस के माहौल में हो रही एससीओ की बैठक पर दुनिया भर की निगाहें हैं। इसमें मध्य, दक्षिण, मध्य पूर्व और दक्षिण पूर्व एशिया के 20 से अधिक देशों के शासनाध्यक्ष हिस्सा ले रहे हैं। इसके जरिये भारत की कोशिश खुद को बदले वैश्विक परिदृश्य में संतुलनकारी शक्ति के रूप में स्थापित करने की है।
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अमेरिकी टैरिफ के मामले में भारत लगातार दबाव में नहीं आने का संदेश दे रहा है। खुद पीएम नरेंद्र मोदी ने कई बार कहा कि भारत दबाव में आने के बदले संकट का सामना करने के लिए तैयार है। भारत ने अब तक रूस से तेल के आयात में कटौती नहीं की है। इसके इतर टैरिफ के संकेत के बाद से भारत नए बाजार की तलाश में कई देशों के साथ अहम समझौते कर चुका है। ऐसे में माना जा रहा है कि एससीओ की बैठक के जरिये भारत, चीन और रूस समेत 20 से अधिक देश अमेरिका को बड़ा संदेश दे सकते हैं।
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समझौता अब भी संभव : इस बीच, सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज (सीएसआईएस) में भारत एवं उभरते एशिया अर्थशास्त्र के वरिष्ठ सलाहकार रिचर्ड रोसो ने कहा कि अमेरिका-भारत के बीच समझौता अब भी संभव है क्योंकि दक्षिण एशियाई देश पर्याप्त रियायतें दे रह दे रहे हैं। विश्लेषक अर्नब मित्रा ने कहा, ग्रामीण मांग व जीएसटी सुधारों से भारत में बड़े पैमाने पर उपभोग में सुधार हो सकता है। अमेरिका में भारत की पूर्व राजदूत मीरा शंकर ने कहा, घरेलू राजनीतिक संवेदनशीलताओं के कारण भारत कृषि क्षेत्र को पूरी तरह नहीं खोल पाएगा।
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विश्लेषकों का कहना है, मोदी का चीन दौरा संकेत है कि भारत वाशिंगटन के साथ रक्षा संबंधों को प्रगाढ़ करते हुए और मास्को से सस्ता तेल खरीदते हुए भी संवाद के रास्ते खुले रखने को तैयार है। एक कदम पीछे चले तो भारत की स्थिति और स्पष्ट हो जाती है। अमेरिका उसका सबसे बड़ा ग्राहक तो है पर कठोर आलोचक भी। रूस रोशनी जलाए रखता है पर राजनीतिक कीमत पर। भारत अपने दृष्टिकोण को रणनीतिक स्वायत्तता कहता है। यह दशकों से कारगर रहा है, लेकिन आज संतुलन बनाने की यह प्रक्रिया पहले से कहीं ज्यादा दबाव में है।
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जापान दौरा नई पहल शुरू करने का अवसर : मिस्री
विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने जापान यात्रा के बारे में कहा कि यह संबंधों में अधिक लचीलापन लाने और चुनौतियों का सामना करने के लिए कई नई पहल शुरू करने का अवसर होगा। नई दिल्ली का कहना है कि वह टैरिफ के मुद्दे को वार्ता के जरिये सुलझाने में जुटा है। वहीं जापान के शीर्ष व्यापार वार्ताकार ने दोनों देशों के टैरिफ समझौते में आई रुकावट के कारण अमेरिका का दौरा रद्द कर दिया। मोदी का जापान दौरा इस लिहाज से भी काफी अहम है क्योंकि दोनों देश क्वाड समूह का हिस्सा हैं।
त्रिपक्षीय वार्ता पर भारत की हामी
भारत-रूस-चीन की त्रिपक्षीय वार्ता पीएम मोदी व जिनपिंग की द्विपक्षीय वार्ता पर निर्भर करेगी। सरकारी सूत्र के मुताबिक, बैठक में भारत चीन के प्रस्तावों का अध्ययन करेगा। भारत की निगाह एससीओ की बैठक में आतंकवाद के मामले में चीन के रुख पर भी होगी। चूंकि इस मुद्दे पर रूस लगातार चीन के साथ संपर्क में है। ऐसे में पीएम मोदी और पुतिन की द्विपक्षीय बैठक बेहद अहम होगी।
जापानी कंपनियां 68 अरब डाॅलर का निवेश करने को तैयार
जापानी कंपनियां अगले दशक में भारत में 68 अरब डॉलर तक निवेश करने के लिए तैयार हैं, जबकि सुजुकी मोटर ने अगले पांच से छह वर्षों में करीब 8 अरब डॉलर के निवेश का वादा किया है। मोदी ने भारत में सुजुकी संयंत्र का दौरा करने के बाद कहा था, दोनों देश आपसी साझेदार हैं। अधिकारियों ने बताया, महत्वपूर्ण खनिजों पर समझौतें व भारत में उच्च मूल्य वाले विनिर्माण में जापानी निवेश पर चर्चा होने की उम्मीद है।
त्रिमार्गी संतुलन साधने की भी कोशिश
भारत वर्तमान में ऐसे तीन दोस्तों अमेरिका, रूस और चीन के साथ संतुलन बिठाने की कोशिश कर रहा है, जिनके साथ उसके अलग-अलग संबंध हैं। इनमें से वाशिंगटन अधिक टैरिफ थोपकर संकट बढ़ा रहा है, तो मास्को सस्ते तेल से भारत के ऊर्जा बिलों को नियंत्रित कर रहा है और बीजिंग बिगड़े रिश्तों के बावजूद एससीओ शिखर सम्मेलन में पीएम मोदी का खुले दिल से स्वागत को तैयार है। वैश्विक मंच पर भारत का दांव-पेंच पहले कभी इतना जटिल नहीं लगा।
अमेरिका भारत का सबसे बड़ा निर्यात बाजार है। इसका वार्षिक मूल्य लगभग 87 अरब डॉलर है, जो उसके कुल व्यापार का लगभग पांचवां हिस्सा है। हीरे, वस्त्र और समुद्री खाद्य जैसे प्रमुख भारतीय क्षेत्र विशेष रूप से प्रभावित हैं। अमेरिकी टैरिफ के कदम से कई क्षेत्र जोखिम में आ गए हैं, जो लाखों लोगों को रोजगार देते हैं। यह विवाद ऐसे समय में आया है, जब दोनों देश रणनीतिक संबंधों को मजबूत कर रहे हैं। दोनों देश सेमीकंडक्टर, क्वाड, रक्षा समेत कई क्षेत्रों में सहयोग का विस्तार कर रहे हैं। एपल, माइक्रोसॉफ्ट और अमेजन सहित प्रमुख अमेरिकी कंपनियों ने भारत में अपने निवेश में वृद्धि की है। फिर भी, व्यापारिक तनाव संबंधों को जटिल बना रहे हैं। इससे यह सवाल उठा रहा है कि क्या वाशिंगटन भारत को सच्चा साझेदार मानता भी है या नहीं।
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सस्ते तेल के आयात से मुद्रास्फीति नियंत्रण में
भारत का दूसरा अहम दोस्त रूस है। भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता है। वहां रोज 50 लाख बैरल से ज्यादा तेल की खपत होती है, इसलिए सस्ती ऊर्जा कोई विलासिता नहीं, जरूरत है। 2021 में भारत के कच्चे तेल का मात्र 1% रूस से आता था। आज यह 35% से ज्यादा यानी लगभग 17.5 लाख बैरल रोज है। इससे 2022 की शुरुआत से दिल्ली को 17 अरब डॉलर से ज्यादा की बचत हो रही है। इसने मुद्रास्फीति को काबू में रखा और पीएम मोदी को घर में राहत दी। दूसरा मसला, भारत भू-राजनीतिक संतुलन बनाए रखने की कोशिश कर रहा है, वहीं पाकिस्तान से तनाव बढ़ने का खतरा है। रूस अहम सुरक्षा साझेदार है और भारत की रक्षा खरीद में केंद्रीय भूमिका निभाता है। इससे भारत के लिए उससे दूर हटना मुश्किल है।
चीन संग सबसे पेचीदा रिश्ते
चीन सबसे पेचीदा रिश्तों का प्रतीक है। मोदी सात साल से भी ज्यादा समय में अपनी पहली चीन यात्रा पर जा रहे हैं। यहां वह राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मिलेंगे और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ खड़े होंगे। बीजिंग का कहना है, यह एकजुटता का प्रदर्शन है, पर भारत-चीन में तनाव अभी भी बना है। गलवां संघर्ष के बाद भारत ने चीनी एप पर प्रतिबंध लगाए, विदेशी निवेश नियमों को कड़ा किया और प्रमुख क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा दिया है। फिर भी, दोनों देशों में व्यापार 118 अरब डॉलर तक पहुंच गया। इसमें भारत ने निर्यात की तुलना में आयात कहीं अधिक किया।