एक्सप्लेनर: एमएलसी के पास कितनी ताकत होती है, कितनी है सैलरी; कौन-कौन सी मिलती हैं सुविधाएं?
एमएलसी यानी विधान परिषद सदस्य के पास कितनी ताकत होती है और हर महीने कितनी सैलरी मिलती है? वेतन-भत्तों से लेकर यात्रा और चिकित्सा सुविधाओं तक, जानिए पूर्व एमएलसी को कितनी पेंशन मिलती है और उनके परिवार को क्या लाभ मिलता है।
विस्तार
हाल ही में चार राज्यों में विधान परिषद की 28 सीटों पर चुनाव हुए। इसके बाद एमएलसी यानी विधान परिषद सदस्यों की भूमिका चर्चा में है।
ऐसे में सवाल उठता है कि एमएलसी कौन होते हैं? कैसे चुने जाते हैं? उनके अधिकार क्या हैं? उन्हें कितनी सैलरी, पेंशन और अन्य सुविधाएं मिलती हैं?
सबसे पहले जानते हैं कि विधान परिषद चुनाव के नतीजे क्या रहे?
- उत्तर प्रदेश: विधान परिषद की 11 सीटों पर हुए चुनाव में भाजपा ने छह सीटें जीतीं, जबकि समाजवादी पार्टी को पांच सीटों पर जीत मिली।
- बिहार: यहां आठ सीटों पर चुनाव हुआ। भाजपा और जनता दल यूनाइटेड यानी जेडीयू के गठबंधन को चार सीटें मिलीं। दरभंगा शिक्षक सीट पर जनसुराज के उम्मीदवार ने जीत दर्ज की। राष्ट्रीय जनता दल यानी आरजेडी को एक सीट मिली, जबकि दो सीटों पर निर्दलीय उम्मीदवार जीते।
- महाराष्ट्र: विधान परिषद की पांच सीटों में से विपक्षी महा विकास आघाड़ी यानी एमवीए ने तीन और सत्तारूढ़ महायुति ने दो सीटें जीतीं। नागपुर सीट पर कांग्रेस ने फिर जीत हासिल की। नागपुर मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस का गढ़ माना जाता है।
- कर्नाटक: यहां भाजपा और जनता दल (सेक्युलर) के गठबंधन ने चारों सीटें जीत लीं। राज्य की सत्ताधारी कांग्रेस एक भी सीट नहीं जीत पाई।
एमएलसी कौन होते हैं?
एमएलसी का पूरा नाम मेंबर ऑफ लेजिस्लेटिव काउंसिल है। हिंदी में इन्हें विधान परिषद सदस्य कहा जाता है। विधान परिषद राज्य विधानमंडल का उच्च सदन है। जिन राज्यों में विधान परिषद होती है, वहां राज्य विधानमंडल के दो सदन होते हैं। इनमें विधानसभा निचला सदन और विधान परिषद उच्च सदन होती है।
विधान परिषद बनाने का प्रावधान क्या है?
हर राज्य में विधान परिषद होना जरूरी नहीं है। किसी राज्य में विधान परिषद रहेगी या नहीं, यह राज्य विधानसभा की पहल और संसद की ओर से कानून बनाए जाने की प्रक्रिया पर निर्भर करता है।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 169 में किसी राज्य में विधान परिषद बनाने या समाप्त करने का प्रावधान है। इसके तहत राज्य विधानसभा को विशेष बहुमत से प्रस्ताव पारित करना होता है। इसके बाद संसद कानून बनाकर विधान परिषद के गठन या उसे समाप्त करने की व्यवस्था कर सकती है। भारत के छह राज्यों में विधान परिषद है। ये राज्य हैं उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना।
विधान परिषद में कितने सदस्य होते हैं?
संविधान के अनुसार, किसी राज्य की विधान परिषद में कम से कम 40 सदस्य होने चाहिए। इसकी अधिकतम सदस्य संख्या उस राज्य की विधानसभा के कुल सदस्यों की संख्या के एक-तिहाई तक हो सकती है। अलग-अलग राज्यों में विधान परिषद के सदस्यों की संख्या अलग होती है। विधान परिषद के सदस्यों का चुनाव अप्रत्यक्ष रूप से होता है। इसमें अलग-अलग वर्गों के प्रतिनिधियों को जगह दी जाती है।
- एक-तिहाई सदस्य: स्थानीय निकायों, जैसे जिला परिषद और नगरपालिकाओं के प्रतिनिधियों द्वारा चुने जाते हैं।
- एक-तिहाई सदस्य: राज्य विधानसभा के सदस्य चुनते हैं।
- एक-बारहवां हिस्सा: स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों से चुना जाता है।
- एक-बारहवां हिस्सा: माध्यमिक स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के शिक्षकों के निर्वाचन क्षेत्रों से चुना जाता है।
- एक-छठा हिस्सा: राज्यपाल नामित करते हैं। इनमें कला, विज्ञान, साहित्य, समाज सेवा और सहकारिता आंदोलन जैसे क्षेत्रों में विशेष योगदान देने वाले लोग शामिल हो सकते हैं।
इस तरह विधान परिषद में स्थानीय निकायों, स्नातकों, शिक्षकों और विभिन्न क्षेत्रों में योगदान देने वाले लोगों को प्रतिनिधित्व मिलता है।
एमएलसी बनने के लिए क्या योग्यता चाहिए?
विधान परिषद का सदस्य बनने के लिए व्यक्ति को कुछ जरूरी योग्यताएं पूरी करनी होती हैं।
- वह भारत के नागरिक हो।
- उनकी उम्र कम से कम 30 साल हो।
- उनके पास संसद द्वारा बनाए गए कानून के तहत निर्धारित अन्य योग्यताएं हों।
- वह संबंधित राज्य के किसी विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र के मतदाता हो।
- वह एक ही समय में सांसद और विधायक नहीं हो सकते।
एमएलसी का कार्यकाल कितने साल का होता है?
विधान परिषद एक स्थायी सदन है। इसे विधानसभा की तरह भंग नहीं किया जा सकता। इसके सदस्यों का कार्यकाल छह साल का होता है। हर दो साल में एक-तिहाई सदस्य सेवानिवृत्त होते हैं और खाली सीटों को भरने के लिए चुनाव कराए जाते हैं।
विधान परिषद की बैठकों की अध्यक्षता सभापति करते हैं। उनकी अनुपस्थिति में उपसभापति सदन की कार्यवाही चलाते हैं। सभापति और उपसभापति का चुनाव सदन के सदस्य अपने बीच से करते हैं।
विधान परिषद के अधिकार और काम क्या हैं?
एमएलसी राज्य में कानून बनाने की प्रक्रिया में हिस्सा लेते हैं। वे राज्य से जुड़े मुद्दों पर चर्चा कर सकते हैं और मंत्रियों से सवाल पूछ सकते हैं। हालांकि, विधान परिषद के अधिकार विधानसभा के समान नहीं हैं।
सामान्य विधेयक: राज्य सूची और समवर्ती सूची के विषयों से जुड़े सामान्य विधेयक विधान परिषद में पेश किए जा सकते हैं। परिषद इन पर चर्चा कर सकती है और विधायी प्रक्रिया में अपनी भूमिका निभाती है।
मनी बिल: मनी बिल विधान परिषद में पेश नहीं किया जा सकता। विधानसभा से पारित धन विधेयक विधान परिषद के पास भेजा जाता है। परिषद को इसे 14 दिनों के भीतर वापस करना होता है। अगर इस अवधि में इसे वापस नहीं किया जाता, तो इसे दोनों सदनों से पारित माना जाता है।
मंत्रियों से सवाल: एमएलसी मंत्रियों से अलग-अलग मुद्दों पर सवाल पूछ सकते हैं और उनके खिलाफ प्रस्ताव भी ला सकते हैं। हालांकि, विधान परिषद मंत्रिपरिषद के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पारित नहीं कर सकती।
संविधान संशोधन: संविधान संशोधन की प्रक्रिया में राज्य विधानमंडल की भूमिका संबंधित संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार तय होती है।
विधान परिषद की शक्तियां विधानसभा से कम हैं। मनी बिल के मामले में विधानसभा अधिक शक्तिशाली है। इसी वजह से विधान परिषद की उपयोगिता और अधिकारों पर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। इसकी तुलना संसद के उच्च सदन राज्यसभा से भी की जाती है, लेकिन दोनों सदनों की संवैधानिक शक्तियां एक जैसी नहीं हैं।
क्या एमएलसी मुख्यमंत्री या मंत्री बन सकता है?
हां, विधान परिषद का सदस्य मुख्यमंत्री या राज्य सरकार में मंत्री बन सकता है। इसके लिए विधानसभा का सदस्य होना अनिवार्य नहीं है। संविधान के तहत विधान परिषद के सदस्य को भी मुख्यमंत्री या मंत्री बनने का अधिकार है।
एमएलसी को कितना वेतन मिलता है?
एमएलसी का वेतन हर राज्य में एक जैसा नहीं होता। इसका निर्धारण संबंधित राज्य के कानूनों और नियमों के आधार पर होता है। इसलिए उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में एमएलसी को मिलने वाला वेतन और भत्ते अलग-अलग हो सकते हैं।
उत्तर प्रदेश में एमएलसी के वेतन, भत्ते और पेंशन से जुड़े प्रावधानों में 2025 में संशोधन किया गया। उत्तर प्रदेश राज्य विधानमंडल सदस्य व मंत्री सुख-सुविधा विधि (संशोधन) अधिनियम, 2025 के तहत ये बदलाव 1 अप्रैल 2025 से प्रभावी माने गए हैं।
उत्तर प्रदेश में एमएलसी को कितना वेतन और भत्ता मिलता है?
उत्तर प्रदेश में एमएलसी को मूल वेतन के साथ निर्वाचन क्षेत्र और सचिवीय भत्ता (जरूरी प्रशासनिक कार्यों के खर्च) मिलता है। इसके अलावा, पात्रता और निर्धारित शर्तों के अनुसार दैनिक भत्ता, दौरा भत्ता और चिकित्सा राशि भी मिलती है।
- मूल वेतन: 35,000 रुपये प्रति माह।
- निर्वाचन क्षेत्र भत्ता: 75,000 रुपये प्रति माह।
- सचिवीय भत्ता: 30,000 रुपये प्रति माह।
- सदन या समिति की बैठक का दैनिक भत्ता: 2,500 रुपये प्रति पात्र दिन।
- जनसेवा के काम के लिए दौरा भत्ता: निर्धारित शर्तों के तहत 2,000 रुपये प्रति पात्र दिन।
- बाह्य रोगी चिकित्सा सुविधा के बदले राशि: 45,000 रुपये प्रति माह।
मूल वेतन, निर्वाचन क्षेत्र भत्ता और सचिवीय भत्ता जोड़ने पर एमएलस को हर महीने 1.40 लाख रुपये मिलते हैं। वेतन और दैनिक भत्तों में हर पांच साल में लागत-मुद्रास्फीति सूचकांक के आधार पर संशोधन का प्रावधान है।
एमएलसी को मिलने वाली अन्य सुविधाएं क्या हैं?
- रेल यात्रा कूपन: एक साल में अधिकतम पांच लाख रुपये तक के रेल कूपन दिए जा सकते हैं।
- पूर्व एमएलसी के रेल कूपन: पूर्व सदस्यों के लिए रेल कूपन की सालाना सीमा डेढ़ लाख रुपये है।
- हवाई यात्रा: निर्धारित शर्तों के तहत रेल कूपन के बदले हवाई यात्रा कूपन या किराये की प्रतिपूर्ति का विकल्प उपलब्ध हो सकता है।
- निजी वाहन का ईंधन: संशोधन में पुराने 25,000 रुपये के प्रावधान की जगह सदस्य द्वारा चुनी गई राशि का प्रावधान किया गया है।
- पूर्व एमएलसी के ईंधन खर्च का विकल्प: पूर्व सदस्यों के लिए ईंधन के बदले नकद राशि की सीमा सालाना एक लाख रुपये है।
- कूपन के बदले नकद भुगतान: इस्तेमाल नहीं किए गए रेल कूपन निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार लौटाने पर उनकी समतुल्य राशि नकद दी जा सकती है।
पूर्व एमएलसी को कितनी पेंशन मिलती है?
उत्तर प्रदेश में पूर्व एमएलसी को जीवनभर पेंशन मिलने का प्रावधान है। 2025 के संशोधन के बाद पेंशन की मूल राशि 35,000 रुपये प्रति माह कर दी गई है।
- मूल पेंशन: 35,000 रुपये प्रति माह।
- पहला पूरा छह साल का कार्यकाल: 2,000 रुपये प्रति माह अतिरिक्त पेंशन। इस तरह कुल पेंशन 37,000 रुपये प्रति माह हो जाती है।
- एक कार्यकाल से अधिक सेवा: एक कार्यकाल से अधिक की सेवा के प्रत्येक पूरे साल के लिए 2,000 रुपये प्रति माह अतिरिक्त पेंशन का प्रावधान है।
- छह महीने या उससे अधिक सेवा: अगर सदस्य ने छह महीने या उससे अधिक, लेकिन एक साल से कम सेवा की है, तो पेंशन की गणना के लिए एक साल की सेवा मानी जाती है।
- दूसरी पेंशन: अगर कोई व्यक्ति किसी अन्य पेंशन का भी पात्र है, तो कानून के अनुसार उसे एमएलसी की पेंशन के अतिरिक्त यह पेंशन भी मिल सकती है।
एमएलसी की मृत्यु के बाद परिवार को कितनी पेंशन मिलती है?
अगर किसी मौजूदा या पूर्व एमएलसी की मृत्यु हो जाती है, तो कानून की शर्तों के तहत उनके परिवार को पेंशन मिल सकती है।
- पात्र पति या पत्नी को परिवार पेंशन मिल सकती है।
- पति या पत्नी के न होने पर पात्र नाबालिग बच्चों या अविवाहित बेटियों को इसका लाभ मिल सकता है।
- परिवार पेंशन संबंधित सदस्य की मृत्यु के समय लागू पेंशन या 30,000 रुपये प्रति माह, इनमें से जो अधिक हो, उसके बराबर हो सकती है।
- अगर एक से अधिक व्यक्ति परिवार पेंशन के पात्र हैं, तो राशि उनके बीच बराबर हिस्सों में बांटी जाती है।