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एक्सप्लेनर: अखिलेश ही नहीं, ये नेता भी सांसद रहते बन चुके यूपी के सीएम; एक तो मुख्यमंत्री रहते हारे थे उपचुनाव
Wed, 04 Nov 2026 07:00 PM IST
अमन तिवारी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: अमन तिवारी
Updated Wed, 04 Nov 2026 07:00 PM IST
सार
अखिलेश यादव ने 2027 में बिना विधानसभा चुनाव लड़े मुख्यमंत्री बनने की बात कही है। जानिए, उत्तर प्रदेश में अब तक कितने मुख्यमंत्री ऐसे रहे हैं, जिन्होंने बिना विधानसभा चुनाव लड़े या विधान परिषद के सदस्य रहते हुए मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।
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सौभाग्यशाली सांसद
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष और कन्नौज से सांसद अखिलेश यादव ने 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को लेकर कहा कि "हम पहले भी विधानसभा चुनाव लड़े बिना मुख्यमंत्री बने थे। इस बार भी वही करेंगे, हमारे लिए जो शुभ होगा हम वही करेंगे। हम सीएम तब बनते हैं जब चुनाव नहीं लड़ते।"
उनके इस बयान के बाद यह सवाल उठ रहा है कि क्या वास्तव में कोई व्यक्ति बिना विधानसभा चुनाव लड़े या विधान परिषद का सदस्य बने बिना मुख्यमंत्री बन सकता है? अखिलेश जिस 2012 का जिक्र कर रहे थे, उस वक्त क्या हुआ था? अखिलेश के अलावा क्या कोई और भी है ऐसा है जिसने लोकसभा या राज्यसभा का सांसद रहते हुए यूपी के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली? आइये जानते हैं...
सवाल: क्या कोई व्यक्ति विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य न होकर भी मुख्यमंत्री बन सकता है?
जी हां, किसी भी नेता को मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते समय विधानसभा का चुनाव लड़ना या विधायक/एमएलसी होना अनिवार्य नहीं है। भारतीय संविधान के अनुसार, कोई भी व्यक्ति मुख्यमंत्री पद की शपथ ले सकता है, भले ही वह उस समय राज्य विधानमंडल (विधानसभा या विधान परिषद) के किसी भी सदन का सदस्य न हो। हालांकि, संविधान के अनुच्छेद 164(4) के तहत मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के छह महीने के भीतर उस व्यक्ति को राज्य विधानमंडल के किसी एक सदन का सदस्य (विधानसभा का विधायक या विधान परिषद का एमएलसी) बनना अनिवार्य होता है। यदि वह छह महीने के भीतर सदस्य नहीं बन पाता है, तो उसे मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ता है।
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इसी संवैधानिक व्यवस्था के तहत पहले भी कई नेता सांसद रहते हुए सीधे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ले चुके हैं और बाद में उन्होंने विधान परिषद या विधानसभा के उपचुनाव के माध्यम से राज्य विधानमंडल की सदस्यता प्राप्त की।
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उनके इस बयान के बाद यह सवाल उठ रहा है कि क्या वास्तव में कोई व्यक्ति बिना विधानसभा चुनाव लड़े या विधान परिषद का सदस्य बने बिना मुख्यमंत्री बन सकता है? अखिलेश जिस 2012 का जिक्र कर रहे थे, उस वक्त क्या हुआ था? अखिलेश के अलावा क्या कोई और भी है ऐसा है जिसने लोकसभा या राज्यसभा का सांसद रहते हुए यूपी के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली? आइये जानते हैं...
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सवाल: क्या कोई व्यक्ति विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य न होकर भी मुख्यमंत्री बन सकता है?
जी हां, किसी भी नेता को मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते समय विधानसभा का चुनाव लड़ना या विधायक/एमएलसी होना अनिवार्य नहीं है। भारतीय संविधान के अनुसार, कोई भी व्यक्ति मुख्यमंत्री पद की शपथ ले सकता है, भले ही वह उस समय राज्य विधानमंडल (विधानसभा या विधान परिषद) के किसी भी सदन का सदस्य न हो। हालांकि, संविधान के अनुच्छेद 164(4) के तहत मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के छह महीने के भीतर उस व्यक्ति को राज्य विधानमंडल के किसी एक सदन का सदस्य (विधानसभा का विधायक या विधान परिषद का एमएलसी) बनना अनिवार्य होता है। यदि वह छह महीने के भीतर सदस्य नहीं बन पाता है, तो उसे मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ता है।
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इसी संवैधानिक व्यवस्था के तहत पहले भी कई नेता सांसद रहते हुए सीधे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ले चुके हैं और बाद में उन्होंने विधान परिषद या विधानसभा के उपचुनाव के माध्यम से राज्य विधानमंडल की सदस्यता प्राप्त की।
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ये नेता भी सांसद रहते बन चुके यूपी के सीएम
- फोटो : अमर उजाला
सांसद रहते और बिना किसी सदन के सदस्य बने कौन से नेता बने मुख्यमंत्री?
उत्तर प्रदेश में कई ऐसे नेता रहे हैं, जो मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते वक्त राज्य की विधानसभा या विधान परिषद के सदस्य नहीं थे। इनमें कुछ लोकसभा और राज्यसभा के सांसद थे, जबकि कुछ ऐसे भी थे जो किसी भी सदन के सदस्य नहीं थे। संविधान के अनुसार, मुख्यमंत्री बनने के छह महीने के भीतर राज्य विधानमंडल का सदस्य बनना जरूरी होता है। इन नेताओं में त्रिभुवन नारायण सिंह, हेमवती नंदन बहुगुणा, राम नरेश यादव, विश्वनाथ प्रताप सिंह, मुलायम सिंह यादव, मायावती, अखिलेश यादव और योगी आदित्यनाथ जैसे नेता सांसद रहते हुए मुख्यमंत्री बने। वहीं राम प्रकाश गुप्ता ने किसी भी सदन का सदस्य नहीं रहते हुए मुख्यमंत्री पद संभाला।
सबसे पहले बात त्रिभुवन नारायण सिंह की
त्रिभुवन नारायण सिंह 18 अक्टूबर 1970 को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे। उस समय वे राज्यसभा के सांसद थे और उत्तर प्रदेश विधानमंडल के किसी भी सदन के सदस्य नहीं थे। उनकी नियुक्ति को लेकर संवैधानिक विवाद भी हुआ था। इस पर हर शरण वर्मा बनाम त्रिभुवन नारायण सिंह मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि कोई व्यक्ति विधायक न रहते हुए भी छह महीने तक मुख्यमंत्री रह सकता है। हालांकि, बाद में मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने गोरखपुर की मानीराम विधानसभा सीट से उपचुनाव लड़ा, लेकिन हार गए। इसके बाद उन्हें मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा।
उत्तर प्रदेश में कई ऐसे नेता रहे हैं, जो मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते वक्त राज्य की विधानसभा या विधान परिषद के सदस्य नहीं थे। इनमें कुछ लोकसभा और राज्यसभा के सांसद थे, जबकि कुछ ऐसे भी थे जो किसी भी सदन के सदस्य नहीं थे। संविधान के अनुसार, मुख्यमंत्री बनने के छह महीने के भीतर राज्य विधानमंडल का सदस्य बनना जरूरी होता है। इन नेताओं में त्रिभुवन नारायण सिंह, हेमवती नंदन बहुगुणा, राम नरेश यादव, विश्वनाथ प्रताप सिंह, मुलायम सिंह यादव, मायावती, अखिलेश यादव और योगी आदित्यनाथ जैसे नेता सांसद रहते हुए मुख्यमंत्री बने। वहीं राम प्रकाश गुप्ता ने किसी भी सदन का सदस्य नहीं रहते हुए मुख्यमंत्री पद संभाला।
सबसे पहले बात त्रिभुवन नारायण सिंह की
त्रिभुवन नारायण सिंह 18 अक्टूबर 1970 को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे। उस समय वे राज्यसभा के सांसद थे और उत्तर प्रदेश विधानमंडल के किसी भी सदन के सदस्य नहीं थे। उनकी नियुक्ति को लेकर संवैधानिक विवाद भी हुआ था। इस पर हर शरण वर्मा बनाम त्रिभुवन नारायण सिंह मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि कोई व्यक्ति विधायक न रहते हुए भी छह महीने तक मुख्यमंत्री रह सकता है। हालांकि, बाद में मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने गोरखपुर की मानीराम विधानसभा सीट से उपचुनाव लड़ा, लेकिन हार गए। इसके बाद उन्हें मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा।
ये नेता भी सांसद रहते बन चुके यूपी के सीएम
- फोटो : अमर उजाला
हेमवती नंदन बहुगुणा बिना किसी सदन के सदस्य रहे बने मुख्यमंत्री
हेमवती नंदन बहुगुणा 8 नवंबर 1973 को पहली बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे। उस समय वे इलाहाबाद लोकसभा सीट से सांसद थे और केंद्र सरकार में संचार राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) की जिम्मेदारी संभाल रहे थे। मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते समय वे उत्तर प्रदेश विधानसभा या विधान परिषद के सदस्य नहीं थे। मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने लोकसभा की सदस्यता और केंद्रीय मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। उनका करीब चार महीने का पहला कार्यकाल बिना किसी सदन का सदस्य बने पूरा हुआ। इसके बाद मार्च 1974 के विधानसभा चुनाव में इलाहाबाद की बारां सीट से जीतकर विधायक बने और दूसरी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।
राम नरेश यादव भी बिना किसी सदन के सदस्य रहे बने मुख्यमंत्री
राम नरेश यादव ने 23 जून 1977 को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। उस समय वे आजमगढ़ लोकसभा सीट से जनता पार्टी के सांसद थे। मार्च 1977 के लोकसभा चुनाव में जीतकर वे पहली बार संसद पहुंचे थे। जनता पार्टी के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव जीतने के बाद उन्हें मुख्यमंत्री चुना गया। शपथ लेते समय वे राज्य विधानमंडल के किसी भी सदन के सदस्य नहीं थे। मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने लोकसभा की सदस्यता से इस्तीफा दिया और छह महीने के भीतर विधानसभा का सदस्य बनने के लिए एटा जिले की निधौली कलां सीट से उपचुनाव लड़ा। इस चुनाव में जीतकर वे विधायक बने।
हेमवती नंदन बहुगुणा 8 नवंबर 1973 को पहली बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे। उस समय वे इलाहाबाद लोकसभा सीट से सांसद थे और केंद्र सरकार में संचार राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) की जिम्मेदारी संभाल रहे थे। मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते समय वे उत्तर प्रदेश विधानसभा या विधान परिषद के सदस्य नहीं थे। मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने लोकसभा की सदस्यता और केंद्रीय मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। उनका करीब चार महीने का पहला कार्यकाल बिना किसी सदन का सदस्य बने पूरा हुआ। इसके बाद मार्च 1974 के विधानसभा चुनाव में इलाहाबाद की बारां सीट से जीतकर विधायक बने और दूसरी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।
राम नरेश यादव भी बिना किसी सदन के सदस्य रहे बने मुख्यमंत्री
राम नरेश यादव ने 23 जून 1977 को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। उस समय वे आजमगढ़ लोकसभा सीट से जनता पार्टी के सांसद थे। मार्च 1977 के लोकसभा चुनाव में जीतकर वे पहली बार संसद पहुंचे थे। जनता पार्टी के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव जीतने के बाद उन्हें मुख्यमंत्री चुना गया। शपथ लेते समय वे राज्य विधानमंडल के किसी भी सदन के सदस्य नहीं थे। मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने लोकसभा की सदस्यता से इस्तीफा दिया और छह महीने के भीतर विधानसभा का सदस्य बनने के लिए एटा जिले की निधौली कलां सीट से उपचुनाव लड़ा। इस चुनाव में जीतकर वे विधायक बने।
सौभाग्यशाली सांसद
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
सासंद विश्वनाथ प्रताप सिंह भी बने मुख्यमंत्री
विश्वनाथ प्रताप सिंह 9 जून 1980 को पहली बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे। उस समय वे इलाहाबाद लोकसभा सीट से कांग्रेस के सांसद थे। जनवरी 1980 के मध्यावधि लोकसभा चुनाव में जीतकर वे संसद पहुंचे थे। मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने लोकसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद 21 नवंबर 1980 को उत्तर प्रदेश विधान परिषद के सदस्य बने। बाद में जून 1981 में बांदा जिले की टिंडवारी विधानसभा सीट से उपचुनाव जीतकर विधायक भी बने।
नारायण दत्त तिवारी बिना किसी सदन के सदस्य रहे बने मुख्यमंत्री
नारायण दत्त तिवारी के मुख्यमंत्री बनने के अलग-अलग कार्यकाल में उनकी सदस्यता की स्थिति अलग रही। जनवरी 1976 में जब वे पहली बार मुख्यमंत्री बने, तब वे काशीपुर विधानसभा सीट से विधायक थे और राज्य सरकार में कैबिनेट मंत्री के रूप में काम कर चुके थे। अगस्त 1984 में दूसरी बार मुख्यमंत्री बनने के समय वे केंद्र सरकार में योजना मंत्री और योजना आयोग के उपाध्यक्ष थे। वे 1980 में नैनीताल से लोकसभा सांसद चुने गए थे। हालांकि मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने विधान परिषद की सदस्यता ली। जून 1988 में तीसरी बार मुख्यमंत्री बने तो वे केंद्र सरकार में वित्त मंत्री और राज्यसभा सांसद थे।
विश्वनाथ प्रताप सिंह 9 जून 1980 को पहली बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे। उस समय वे इलाहाबाद लोकसभा सीट से कांग्रेस के सांसद थे। जनवरी 1980 के मध्यावधि लोकसभा चुनाव में जीतकर वे संसद पहुंचे थे। मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने लोकसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद 21 नवंबर 1980 को उत्तर प्रदेश विधान परिषद के सदस्य बने। बाद में जून 1981 में बांदा जिले की टिंडवारी विधानसभा सीट से उपचुनाव जीतकर विधायक भी बने।
नारायण दत्त तिवारी बिना किसी सदन के सदस्य रहे बने मुख्यमंत्री
नारायण दत्त तिवारी के मुख्यमंत्री बनने के अलग-अलग कार्यकाल में उनकी सदस्यता की स्थिति अलग रही। जनवरी 1976 में जब वे पहली बार मुख्यमंत्री बने, तब वे काशीपुर विधानसभा सीट से विधायक थे और राज्य सरकार में कैबिनेट मंत्री के रूप में काम कर चुके थे। अगस्त 1984 में दूसरी बार मुख्यमंत्री बनने के समय वे केंद्र सरकार में योजना मंत्री और योजना आयोग के उपाध्यक्ष थे। वे 1980 में नैनीताल से लोकसभा सांसद चुने गए थे। हालांकि मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने विधान परिषद की सदस्यता ली। जून 1988 में तीसरी बार मुख्यमंत्री बने तो वे केंद्र सरकार में वित्त मंत्री और राज्यसभा सांसद थे।
सौभाग्यशाली सांसद
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
राम प्रकाश गुप्ता भी किसी सदन के सदस्य रहे बिना बने मुख्यमंत्री
राम प्रकाश गुप्ता 12 नवंबर 1999 को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे। उस समय वे राज्य की विधानसभा या विधान परिषद, किसी भी सदन के सदस्य नहीं थे। वे भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता और भारतीय जनसंघ के संस्थापकों में शामिल थे। इससे पहले वे 1967 में चौधरी चरण सिंह की सरकार में उपमुख्यमंत्री और 1977 से 1979 तक उद्योग मंत्री रह चुके थे। मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने विधान परिषद का रास्ता चुना और एमएलसी बने थे।
मुलायम सिंह यादव: 2003 में सांसद रहते बने मुख्यमंत्री
उत्तर प्रदेश में सांसद रहते हुए मुख्यमंत्री बनने का एक बड़ा उदाहरण मुलायम सिंह यादव का है। हालांकि, मुलायम इससे पहले भी दो बार प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके थे, लेकिन 2003 में जब उन्होंने तीसरी बार सरकार की कमान संभाली तो वह लोकसभा सांसद थे। 29 अगस्त 2003 को मुलायम सिंह यादव ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। उस समय वह संभल लोकसभा सीट से सांसद थे। मुलायम सिंह यादव ने जनवरी 2004 में गुन्नौर विधानसभा सीट से उपचुनाव लड़ा। यह सीट उनके लिए खाली कराई गई थी। फरवरी 2004 में घोषित नतीजे में उन्होंने बड़ी जीत दर्ज की।
राम प्रकाश गुप्ता 12 नवंबर 1999 को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे। उस समय वे राज्य की विधानसभा या विधान परिषद, किसी भी सदन के सदस्य नहीं थे। वे भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता और भारतीय जनसंघ के संस्थापकों में शामिल थे। इससे पहले वे 1967 में चौधरी चरण सिंह की सरकार में उपमुख्यमंत्री और 1977 से 1979 तक उद्योग मंत्री रह चुके थे। मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने विधान परिषद का रास्ता चुना और एमएलसी बने थे।
मुलायम सिंह यादव: 2003 में सांसद रहते बने मुख्यमंत्री
उत्तर प्रदेश में सांसद रहते हुए मुख्यमंत्री बनने का एक बड़ा उदाहरण मुलायम सिंह यादव का है। हालांकि, मुलायम इससे पहले भी दो बार प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके थे, लेकिन 2003 में जब उन्होंने तीसरी बार सरकार की कमान संभाली तो वह लोकसभा सांसद थे। 29 अगस्त 2003 को मुलायम सिंह यादव ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। उस समय वह संभल लोकसभा सीट से सांसद थे। मुलायम सिंह यादव ने जनवरी 2004 में गुन्नौर विधानसभा सीट से उपचुनाव लड़ा। यह सीट उनके लिए खाली कराई गई थी। फरवरी 2004 में घोषित नतीजे में उन्होंने बड़ी जीत दर्ज की।
सौभाग्यशाली सांसद
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
मायावती: दो बार सांसद रहते ली मुख्यमंत्री पद की शपथ
बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती उन नेताओं में शामिल हैं, जिन्होंने सांसद रहते हुए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। उनके राजनीतिक सफर में दो ऐसे मौके आए, जब वह राज्य की विधानसभा या विधान परिषद की सदस्य बनने से पहले ही मुख्यमंत्री बन गईं। पहली बार मायावती 3 जून 1995 को उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं। उस समय वह राज्यसभा की सदस्य थीं। अप्रैल 1995 में वह पहली बार राज्यसभा के लिए चुनी गई थीं। इसके बाद उन्होंने मुख्यमंत्री पद संभाला और 18 अक्टूबर 1995 तक इस पद पर रहीं। दूसरी बार 13 मई 2007 को मुख्यमंत्री बनीं। उस समय वह लोकसभा सांसद थीं। वह 2004 में अकबरपुर लोकसभा से जीती थीं। मुख्यमंत्री बनने के बाद जून 2007 में वह उत्तर प्रदेश विधान परिषद की सदस्य बनीं।
अखिलेश यादव: कन्नौज के सांसद रहते बने मुख्यमंत्री
समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव का उदाहरण मौजूदा राजनीतिक चर्चा से सीधे जुड़ा है। वह 2012 में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे, लेकिन उस समय उन्होंने विधानसभा चुनाव नहीं लड़ा था। वह 2009 में कन्नौज लोकसभा सीट से सांसद बने थे। 2012 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने बहुमत हासिल किया। पार्टी की जीत के बाद अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री बनाया गया। 15 मार्च 2012 को उन्होंने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।मुख्यमंत्री बनने के बाद अखिलेश यादव ने विधानसभा उपचुनाव लड़ने के बजाय विधान परिषद का रास्ता चुना। वह उत्तर प्रदेश विधान परिषद के सदस्य बने।
योगी आदित्यनाथ: गोरखपुर के सांसद से मुख्यमंत्री तक का सफर
यूपी के मौजूदा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी उन नेताओं में शामिल हैं, जिन्होंने लोकसभा सांसद रहते हुए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। 2017 के विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने बड़ी जीत दर्ज की थी। इसके बाद पार्टी ने योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाने का फैसला किया।
19 मार्च 2017 को योगी आदित्यनाथ ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। उस समय वह गोरखपुर लोकसभा सीट से सांसद थे और पांचवीं बार लोकसभा के सदस्य चुने गए थे। मुख्यमंत्री बनने के बाद योगी आदित्यनाथ ने भी विधान परिषद का रास्ता अपनाया। 18 सितंबर 2017 को वह उत्तर प्रदेश विधान परिषद के सदस्य बने। इसके बाद 2022 में उन्होंने पहली बार विधानसभा चुनाव लड़ा। वह गोरखपुर शहर विधानसभा सीट से चुनाव जीतकर विधायक बने और लगातार दूसरी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।
बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती उन नेताओं में शामिल हैं, जिन्होंने सांसद रहते हुए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। उनके राजनीतिक सफर में दो ऐसे मौके आए, जब वह राज्य की विधानसभा या विधान परिषद की सदस्य बनने से पहले ही मुख्यमंत्री बन गईं। पहली बार मायावती 3 जून 1995 को उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं। उस समय वह राज्यसभा की सदस्य थीं। अप्रैल 1995 में वह पहली बार राज्यसभा के लिए चुनी गई थीं। इसके बाद उन्होंने मुख्यमंत्री पद संभाला और 18 अक्टूबर 1995 तक इस पद पर रहीं। दूसरी बार 13 मई 2007 को मुख्यमंत्री बनीं। उस समय वह लोकसभा सांसद थीं। वह 2004 में अकबरपुर लोकसभा से जीती थीं। मुख्यमंत्री बनने के बाद जून 2007 में वह उत्तर प्रदेश विधान परिषद की सदस्य बनीं।
अखिलेश यादव: कन्नौज के सांसद रहते बने मुख्यमंत्री
समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव का उदाहरण मौजूदा राजनीतिक चर्चा से सीधे जुड़ा है। वह 2012 में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे, लेकिन उस समय उन्होंने विधानसभा चुनाव नहीं लड़ा था। वह 2009 में कन्नौज लोकसभा सीट से सांसद बने थे। 2012 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने बहुमत हासिल किया। पार्टी की जीत के बाद अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री बनाया गया। 15 मार्च 2012 को उन्होंने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।मुख्यमंत्री बनने के बाद अखिलेश यादव ने विधानसभा उपचुनाव लड़ने के बजाय विधान परिषद का रास्ता चुना। वह उत्तर प्रदेश विधान परिषद के सदस्य बने।
योगी आदित्यनाथ: गोरखपुर के सांसद से मुख्यमंत्री तक का सफर
यूपी के मौजूदा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी उन नेताओं में शामिल हैं, जिन्होंने लोकसभा सांसद रहते हुए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। 2017 के विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने बड़ी जीत दर्ज की थी। इसके बाद पार्टी ने योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाने का फैसला किया।
19 मार्च 2017 को योगी आदित्यनाथ ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। उस समय वह गोरखपुर लोकसभा सीट से सांसद थे और पांचवीं बार लोकसभा के सदस्य चुने गए थे। मुख्यमंत्री बनने के बाद योगी आदित्यनाथ ने भी विधान परिषद का रास्ता अपनाया। 18 सितंबर 2017 को वह उत्तर प्रदेश विधान परिषद के सदस्य बने। इसके बाद 2022 में उन्होंने पहली बार विधानसभा चुनाव लड़ा। वह गोरखपुर शहर विधानसभा सीट से चुनाव जीतकर विधायक बने और लगातार दूसरी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।