कश्मीर देगा जवाब: घाटी के लोगों को पसंद नहीं हैं तालिबानी आतंकी, उनके लिए यहां छिपकर रहना आसान नहीं
कश्मीर और अफगानिस्तान को समझने वाले ब्रिगेडियर अनिल गुप्ता (रिटायर्ड) बताते हैं, कश्मीर में तालिबान के आतंकी सफल नहीं होंगे। उन्हें स्थानीय लोगों की मदद नहीं मिलेगी। कश्मीरी लोगों की नजर में अफगान आतंकी बलात्कारी होते हैं, इसलिए वे उन्हें पसंद नहीं करते...
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अफगानिस्तान में तालिबानी कब्जे को लेकर भारत की चिंता बढ़ रही है। तालिबान, भारत को लेकर ज्यादा सकारात्मक नहीं है। दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंध खत्म हो गए हैं, इसलिए इसे एक अच्छी शुरुआत नहीं कहा जा सकता। तालिबान के अफगानिस्तान में ही नहीं, बल्कि पाकिस्तान में भी आतंकियों को रिहा किया जा रहा है। भारत अभी इन सभी घटनाओं पर नजर रख रहा है। तालिबान को लेकर कोई भी विवादित टिप्पणी करने से भारत सरकार बच रही है। भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची ने कहा, तालिबान से बातचीत के बारे में बस इतना ही कहना चाहेंगे कि हम सभी स्टेकहोल्डर्स के संपर्क में हैं। इससे ज्यादा कुछ नहीं कहेंगे।
विदेश मंत्री एस. जयशंकर भी परिस्थितियों पर नजर रखने की बात कहते हैं। कश्मीर और अफगानिस्तान को समझने वाले ब्रिगेडियर अनिल गुप्ता (रिटायर्ड) बताते हैं, कश्मीर में तालिबान के आतंकी सफल नहीं होंगे। उन्हें स्थानीय लोगों की मदद नहीं मिलेगी। कश्मीरी लोगों की नजर में अफगान आतंकी बलात्कारी होते हैं, इसलिए वे उन्हें पसंद नहीं करते। पाकिस्तान के आतंकियों को तो वहां से मदद मिल जाती है, लेकिन तालिबानी आतंकियों के लिए कश्मीर घाटी में छिपकर रहना और हमले करना आसान नहीं होगा।
बता दें कि पाकिस्तान समर्थित अधिकांश आतंकी संगठन इस बात से खुश हैं कि अफगानिस्तान में अब तालिबान का कब्जा हो गया है। वे समझते हैं कि अब उन्हें कश्मीर घाटी में दिक्कतों का सामना नहीं करना पड़ेगा। हो सकता है कि कई आतंकी तंजीमें एक बैनर के तले आकर सुरक्षा बलों पर हमला करें। अभी तक जम्मू कश्मीर में हिजबुल मुजाहिदीन, लश्कर-ए-तैयबा, अल-बद्र, हरकत-उल-अंसार, हरकत-उल-जेहादी इस्लाम, जैश-ए-मोहम्मद और आईएस/जेके जैसे संगठन, भारतीय सुरक्षा बलों पर अटैक करते रहते हैं। भारतीय सेना भी लगातार आतंकियों का सफाया करती रही है।
खास बात ये है कि अभी तक घाटी में मौजूद ज्यादातर आतंकी संगठनों का संबंध पाकिस्तान से रहा है। यह अलग बात है कि वे पाकिस्तान के मार्फत ही अफगानिस्तान में ट्रेनिंग लेने के लिए जाते रहे हैं। कश्मीर में दो नए आतंकी संगठनों के नाम सामने आए हैं। इनमें एक है द रेजिस्टेंस फ्रंट (टीआरएफ) और दूसरा तहरीक-ए-मिल्लत-ए-इस्लामी (टीएमआई) है। सुरक्षा एजेंसियों के मुताबिक, इन संगठनों की हिजबुल मुजाहिदीन के साथ नहीं बनती। पिछले दिनों कश्मीरी पुलिस वालों और आम नागरिकों पर हमला करने के मामले में ये आतंकी संगठन आमने-सामने हो चुके हैं।
टीआरएफ जैसे आतंकी संगठन का कहना था कि आम कश्मीरी लोगों और लोकल पुलिस वालों को मारकर वे घाटी में ज्यादा दिन तक नहीं चल सकते। इसके लिए उन्हें कॉमन प्रोग्राम पर चलना होगा। सुरक्षा एजेंसियों का कहना है कि 'टीआरएफ' पाकिस्तान समर्थित आतंकी संगठन लश्कर-ए-तयैबा का ही फ्रंटल ऑर्गेनाइजेशन है। काबुल पर तालिबान के कब्जे के बाद भाजपा के पूर्व महासचिव और आरएसएस की मौजूदा कार्यकारिणी के सदस्य राम माधव ने एक ट्वीट किया था। इसमें उन्होंने लिखा था कि पाकिस्तान का बनाया तालिबान भारत की सुरक्षा के लिए चुनौती बन सकता है। आईएसआई की ट्रेनिंग वाले 30 हजार से ज्यादा लड़ाकों को तालिबान कहीं और भी भेज सकता है।
जानकारों का कहना है कि भाजपा नेता का इशारा कश्मीर की तरफ रहा है। इसके बाद मध्यप्रदेश भाजपा के प्रभारी मुरलीधर राव भी ऐसा ही ट्वीट कर दिया। उन्होंने लिखा, सच तो यह है कि युद्ध तो अभी शुरू हुआ है। यह भारत के लिए खतरे की घंटी है। अगर कोई मानता है कि युद्ध खत्म हो गया है तो वह मूर्खता होगी। भारत को तैयार रहना होगा। सुरक्षा बलों के अनुसार, लश्कर-ए-तयैबा और कश्मीरी आतंकी संगठन हरकत उल अंसार के आतंकी अफगानिस्तान के ट्रेनिंग कैंपों में जाते रहे हैं।
ब्रिगेडियर अनिल गुप्ता (रिटायर्ड) बताते हैं, यह बात सही है कि तालिबान के आने के बाद अब आतंकी संगठनों को यह लग रहा है कि उन्हें भारी मदद मिल जाएगी। कम से कम जम्मू-कश्मीर में ऐसा नहीं होगा। इसके पीछे कई कारण हैं। पहला तो ये है कि आतंकी हमलों को लेकर भारतीय सुरक्षा बल पूरी तरह मुस्तैद हैं। घाटी में दशकों से चला आ रहा आतंकवाद अब अपने अंत की तरफ जा रहा है। साल 1993 के दौरान भी अफगान आतंकियों ने कश्मीर में दाखिल होने का प्रयास किया था। वे कामयाब नहीं हो सके, क्योंकि उन्हें स्थानीय सहयोग नहीं मिल पाया। कोई भी तंजीम हो, उसके आतंकी तभी तक जिंदा हैं, जब तक उन्हें स्थानीय सहयोग मिल रहा है। जिस दिन यह सपोर्ट खत्म हो जाता है, आतंकी संगठन भी वहां से चले जाते हैं या सुरक्षा बलों की गोली का निशाना बन जाते हैं।
पाकिस्तान के आतंकी संगठनों को कश्मीर घाटी में सपोर्ट मिलती रही है। वजह, वे महिलाओं और बच्चों के साथ कुछ गलत नहीं करते थे। नतीजा, उन्हें स्थानीय सहयोग मिल जाता था। दूसरी तरफ अफगान आतंकी जो कि अब तालिबान के कहने पर चलेंगे, उन्हें घाटी में कोई पसंद नहीं करता है। तालिबानी आतंकी, महिलाओं के साथ बलात्कार और बच्चों का यौन शोषण करते हैं, इस वजह से उन्हें घाटी में जगह नहीं मिलेगी।