Exclusive: कनाडा में बसे भारतीय अमर उजाला से बोले- भारत विरोधियों के सहयोग से राजनीति चमकाना चाहते हैं ट्रूडो
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
विस्तार
मैं भी सिख हूं, मैं ब्रिटिश कोलंबिया के सरे में उसी गुरुद्वारे के पास में रहता हूं, जहां पर निज्जर ने कई बार खालिस्तान के समर्थन में रेफरेंडम आयोजन किए। उसकी मौत के बाद अब उसके चेले यही माहौल बना रहे हैं। लेकिन यह चंद मुट्ठी भर खालिस्तानी समर्थक ना तो भारत की अस्मिता से छेड़छाड़ कर पाएंगे और ना ही अपने किसी एजेंडे में सफल हो पाएंगे। कुछ समय बाद कनाडा में चुनाव हैं। प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो की सियासी जमीन कमजोर होती जा रही है। इसलिए सिख समुदाय के एक तबके से जुड़े लोगों के सेंटीमेंट के साथ माहौल बिगाड़ने की राजनीति में ऐसे हालात बन गए हैं। जिस तरीके से भारत सरकार ने कनाडा में रहने वालों के लिए ट्रैवल एडवाइजरी जारी की है, उससे डर तो पैदा ही हुआ है। लेकिन ये गिने चुने खालिस्तानी समर्थक कनाडा सरकार की शहर पर लोगों में दहशत पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि हम लोग डरने वाले नहीं। कनाडा और भारत के बीच पैदा हुई तकरार के बाद अमर उजाला डॉट कॉम ने कनाडा के अलग-अलग राज्यों के शहरों में बसे भारतीय सिखों और अन्य समुदाय के लोगों समेत स्टूडेंट्स से बात की। सभी लोगों का कहना था कि इस वक्त जो माहौल बना है उसमें कनाडा में होने वाले चुनावों का बड़ा रोल है।
खालिस्तान रेफरेंडम में भी नहीं जुटे थे मुट्ठी भर लोग
ब्रिटिश कोलंबिया के सरे में रहने वाले सरदार जोगिंदर सिंह कहते हैं कि जिस जगह पर गुरु नानक गुरुद्वारा है उसके एक मील के दायरे में ही उनका घर है। हमारे आसपास दर्जनों सिख परिवार पंजाब से आकर बसे हुए हैं। जोगिंदर सिंह कहते हैं कि वह अपने परिवार के साथ इस गुरुद्वारे में अकसर जाते रहते थे। लेकिन बीते कुछ समय में जिस तरीके से इस गुरुद्वारे में भारत विरोधी साजिशें और बैठके होने लगीं, तो उनके परिवार ने और उन्होंने यहां से दूसरे गुरुद्वारे में जाना शुरू कर दिया। हालांकि उनका कहना है कि इस गुरुद्वारे में सिर्फ वही लोग आते थे, जो इस गुरुद्वारा कमेटी से जुड़े हुए थे। चूंकि इस गुरुद्वारा का प्रधान निज्जर था, इसलिए उसके समर्थक ही यहां पर ज्यादा आते थे। लेकिन हैरानी की बात तब नजर आई, जब निज्जर की हत्या के बाद निकाले गए प्रदर्शन में भारत विरोधी नारे लगने लगे। उसके बाद खालिस्तान के लिए जनमत संग्रह की अपील की गई। सरदार जोगिंदर सिंह कहते हैं कि इस जनमत संग्रह में, उन्हें जो पता चला वह यही था कि बुलाई गई सिख संगत में महज पांच फीसदी लोग भी नहीं पहुंचे थे।
कनाडा प्रधानमंत्री की इसलिए खिसक रही है सियासी जमीन
इसी इलाके में रहने वाले व्यवसाई सनी बैंस कहते हैं कि गुरुद्वारे में आने वाले और इस इलाके में रहने वाले सिख समुदाय के लोग गुरु नानक गुरुद्वारे की समिति से सीधे तौर पर बिल्कुल ताल्लुक नहीं रखते हैं। इसके पीछे कारण बताते हुए सनी कहते हैं कि दरअसल यहां पर जिस तरीके से माहौल तैयार किया जा रहा था, वह कुछ सियासी लोगों के इशारों पर ही हो रहा था। वह कहते हैं कि इस वक्त जो हालात भारत और कनाडा के बीच में बने हैं, उसके पीछे का असली कारण कनाडा में होने वाले चुनाव ही हैं। सनी कहते हैं कि कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो की सियासी जमीन कई कारणों की वजह से बहुत कमजोर हो गई है। इसमें कनाडा में बढ़ती महंगाई दर, बेरोजगारी सुरक्षा और बैंकों के बढ़ते ब्याज से ध्यान हटाने के लिए ही ट्रूडो सरकार के कुछ मंत्रियों ने खालिस्तान के इस मुद्दे को हवा पानी देना शुरू कर दिया। उनका कहना है कि ऐसा नहीं है कि खालिस्तानी समर्थक कनाडा में नहीं हैं, लेकिन उनकी उतनी संख्या नहीं है जितने की खालिस्तानी समर्थक दुनिया भर में बता कर माहौल बनाते हैं।
छात्रों का काउंसलेट में मैंडेटरी रजिस्ट्रेशन
कनाडा के विनिपेग में रहने वाले मूलतः पंजाब के मोंगा निवासी हरजोत कहते हैं कि वह अभी डेढ़ साल पहले ही चंडीगढ़ से कनाडा पढ़ाई करने के लिए आए हैं। वह कहते हैं जिस तरीके से भारत और कनाडा के बीच में हालात पैदा हो गए हैं, उससे चंडीगढ़ में रह रहे हैं उनके घरवाले बहुत ज्यादा चिंतित हैं। क्योंकि भारत सरकार की ओर से जारी की गई एडवाइजरी में छात्रों के लिए भी विशेष हिदायत दी गई है। हरजोत कहते हैं कि उन्होंने कनाडा के इंडियन काउंसलेट में न सिर्फ अपना रजिस्ट्रेशन कराया है, बल्कि उनके साथ पढ़ाई कर रहे कई दोस्तों ने भी मैंडेटरी रजिस्ट्रेशन करने की प्रक्रिया के लिए आवेदन कर दिया है। हरजोत के साथ रहने वाले चंडीगढ़ के सैंडी बालूजा का कहना है कि वह यहां पढ़ाई करने आए हैं। कई बार दिन में काम करने के बाद वह प्रसाद के लिए गुरुद्वारे जाते हैं। उनका कहना है कि कनाडा की राजनीति से उन्हें तो कोई लेना-देना नहीं है, लेकिन वह यह जरूर मानते हैं कि इस तरीके से एडवाइजरी जारी की गई है उससे उनकी चिंता तो बढ़ ही गई है। इसलिए अब वह अपने पढ़ाई और काम करने वाले शेड्यूल में बदलाव भी कर रहे हैं।
पांच सौ से हजार वोटों से कुछ सीटों पर जीती थी ट्रूडो की पार्टी
कनाडा के ब्राम्पटन इलाके में रहने वाले सचिन और जगमीत बताते हैं कि वह बीते एक दशक से यहां रह रहे हैं। सचिन कहते हैं कि यहां पर खालिस्तान समर्थक पहले भी थे और अभी भी हैं। लेकिन उन्हें इस वक्त के ताजा हालात में जो महत्वपूर्ण बात नजर आ रही है उसमें सियासत ज्यादा दिख रही है। क्योंकि जस्टिन ट्रूडो की सरकार में शामिल कई नेता खालिस्तान के बड़े समर्थक हैं। जगमीत कहते हैं कि वह कनाडा की पॉलिटिक्स को भी बहुत करीब से समझते हैं। बीते चुनाव में जस्टिन ट्रूडो की फेडरल लिबरल पार्टी कई सीटों पर महज पांच सौ से एक हजार वोटों के अंतर से ही जीती थी। अब बदले हुए हालात में कनाडा में प्रधानमंत्री की सियासी पकड़ और जमीन बहुत कमजोर हो गई है। इसलिए फेडरल लिबरल पार्टी खालिस्तान समर्थकों का वोट हासिल करना चाहती है। जिन सीटों पर फेडरल लिबरल पार्टी कुछ वोटों की वजह से जीती थी, वहां पर वह खुद को मजबूत करके दोबारा सीटों पर कब्जा करना चाहते हैं, ताकि फिर सरकार बना सकें। वह कहते हैं कि लेकिन इसका फर्क अब इसलिए नहीं पड़ने वाला क्योंकि कनाडा के प्रधानमंत्री की मंशा भारत में माहौल खराब करने वालों को शह देकर अपनी राजनीति चमकाना ही है।