EWS Reservation: जब सरकारी नौकरियां ही खत्म हो रहीं तो किसे मिलेगा ‘आरक्षण’, क्या हुआ रोजगार के अधिकार का?
EWS Reservation: युवा हल्लाबोल के राष्ट्रीय संयोजक अनुपम का कहना है कि जब नौकरी ही नहीं है तो आरक्षण किसे और कितना मिलेगा। ये सब हवाई बहस है। सरकार, आरक्षण को लेकर हवा में बॉक्सिंग कर रही है। असल सवाल ये है कि सरकारी क्षेत्र में रोजगार, दिन-प्रतिदिन कम होता जा रहा है...
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सुप्रीम कोर्ट ने 'ईडब्ल्यूएस' यानी आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए दस फीसदी आरक्षण व्यवस्था जारी रखने पर मुहर लगा दी है। रोजगार को लेकर कई आंदोलन कर चुके युवा हल्लाबोल के राष्ट्रीय संयोजक अनुपम ने कहा, देश में 'आरक्षण' अब केवल एक गुलाबी तस्वीर बनता जा रहा है। जब सरकारी नौकरियां ही नहीं बची हैं, तो ऐसे में आरक्षण की घोषणा का क्या मतलब। भारत में 'रोजगार का अधिकार' तक नहीं है। केंद्र और राज्य सरकारों में लगभग एक करोड़ पद रिक्त पड़े हैं। राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव, बेरोजगार युवाओं में आक्रोश पैदा कर रहा है।
नहीं भरती सभी रिक्तियां, खामियों से भरी जॉब प्रक्रिया
अनुपम ने बताया, सबसे बड़ा सवाल ये है कि देश में सरकारी क्षेत्र क्यों सिकुड़ता जा रहा है। किसी भी विभाग को देखें तो वहां पद खाली पड़े हैं। हैरानी की बात तो ये है कि जितने पदों को भरने के लिए रिक्तियां निकलती हैं, वे भी नहीं भरी जातीं। विज्ञापन के वक्त पदों की जो संख्या होती है, ज्वाइनिंग तक वह नहीं रहती। उसमें बड़ी कटौती कर दी जाती है। रेलवे, बैंक, एसएससीजीडी और दूसरे विभागों में नौकरियों पर नजर दौड़ाएं, तो जॉब की सही स्थिति मालूम होती है। कभी तो परीक्षा ही नहीं होती, अगर होती है तो उसमें कई वर्ष लग जाते हैं। इसके बाद खबर मिलती है कि पेपर आउट हो गया है। उसके बाद रिजल्ट नहीं आता। परिणाम आता है तो ज्वाइनिंग नहीं मिलती। कोर्ट केस अलग से होते हैं।
आरक्षण किसे और कितना मिलेगा, सब हवाई बहस है
एसएससीजीडी 2018 के हजारों अभ्यर्थियों का मेडिकल होने पर भी उन्हें ज्वाइनिंग नहीं मिल सकी। अनेक अभ्यर्थी ओवरएज हो गए, क्योंकि परीक्षा का परिणाम ही चौथे साल में आया था। अभ्यर्थियों को लंबा आंदोलन करना पड़ा, लेकिन सरकार ने उसे दबा दिया। युवा हल्लाबोल के राष्ट्रीय संयोजक अनुपम का कहना है कि जब नौकरी ही नहीं है तो आरक्षण किसे और कितना मिलेगा। ये सब हवाई बहस है। सरकार, आरक्षण को लेकर हवा में बॉक्सिंग कर रही है। असल सवाल ये है कि सरकारी क्षेत्र में रोजगार, दिन-प्रतिदिन कम होता जा रहा है। भारत में कुल रोजगार का चार फीसदी भी सरकारी क्षेत्र में नहीं है। चीन और अमेरिका सहित दूसरे देशों में सरकारी क्षेत्र का रोजगार प्रतिशत 10 फीसदी व उससे ज्यादा है। भारत में पहले से ही नौकरी कम है और ऊपर से एक करोड़ पद रिक्त हैं।
लागू करना होगा 'रोजगार का अधिकार'
अनुपम ने कहा, बेहतर होगा कि सरकारी क्षेत्र में रोजगार के अवसर बढ़ाए जाएं। उनमें कटौती न हो। पदों को भरने में लीपापोती न हो। युवाओं में असंतोष कम करना है तो सरकार को रोजगार के अवसर बढ़ाने होंगे। देश में भी 'रोजगार का अधिकार', इसे लागू करना होगा। जिस तरह से संविधान में 'राइट टू लाइफ' है, उसी तरह से 'रोजगार का अधिकार' दिया जाए। युवा हल्लाबोल ने 'भारत रोजगार संहिता' का आइडिया दिया है। किसी को न्यूनतम वेतन पर रोजगार मिल रहा है तो वह हजार किलोमीटर दूर है। ये गलत है। जब न्यूनतम वेतन पर ही रोजगार देना है तो पचास किलोमीटर के दायरे में दें।
'रोजगार के अधिकार' के लिए होगा आंदोलन
देश में बढ़ रही बेरोजगारी से लोगों को निजात दिलाने के लिए एक बड़े आंदोलन की रुपरेखा तैयार की जा रही है। देश बचाओ अभियान के अंतर्गत गठित 'जन आयोग' द्वारा रोजगार एवं बेरोजगारी की स्थिति पर बीते दिनों एक रिपोर्ट पेश की गई है। जेएनयू के पूर्व प्रोफेसर एवं प्रख्यात समाजशास्त्री डॉ. आनंद कुमार, इस आंदोलन के समन्वयक हैं। इस रिपोर्ट को तैयार करने में प्रसिद्ध अर्थशास्त्री प्रो. अरुण कुमार, अधिवक्ता प्रशांत भूषण और युवा हल्लाबोल के संस्थापक अनुपम सहित कई लोगों ने अपना योगदान दिया है। रिपोर्ट के साथ ही एक ड्राफ्ट तैयार किया गया है, जिसमें 'रोजगार के अधिकार', को मौलिक अधिकारों में शामिल कराने के लिए संविधान में संशोधन करने की मांग की जाएगी। इसके लिए देश के विभिन्न हिस्सों में आंदोलन शुरू होगा। सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक व युवा संगठनों से बातचीत कर फाइनल ड्राफ्ट तैयार होगा। उस पर कानून बनाने के लिए केंद्र सरकार से आग्रह किया जाएगा।
15 से 29 साल वालों को घेरे रही बेरोजगारी
रिपोर्ट में कहा गया है कि देश में 15 से 29 साल की आयु वाले वर्ग को बेरोजगारी घेर रही है। जो अधिक शिक्षित हैं, उन्हें बेरोजगारी की चिंता ज्यादा सता रही है। युवा, सरकारी क्षेत्र से नौकरी की अधिक उम्मीद लगाए बैठे हैं। पब्लिक सेक्टर, जो केवल चार फीसदी रोजगार देता है, वह बेरोजगारी की समस्या को हल नहीं कर सकता। सरकारी क्षेत्र में लंबे समय तक खाली पड़े पद नहीं भरे जाते हैं। सांगठनिक क्षेत्र, मुश्किल से छह फीसदी वर्क फोर्स को रोजगार दे सकता है, लेकिन 94 फीसदी वाले असांगठनिक क्षेत्र की ओर किसी का ध्यान नहीं है। सांगठनिक क्षेत्र में लोगों को रोजगार देने की दर 3.32 से 2.47 फीसदी पर पहुंच गई है। देश में छह हजार बड़े व्यवसाय हैं। छह लाख लघु एवं मध्यम यूनिट हैं। छह करोड़ माइक्रो यूनिट हैं। अधिकांश रोजगार माइक्रो यूनिट में मिल रहा है। सरकार की अधिकांश नीतियां एमएसएमई सेक्टर के लिए बन रही हैं। यही सेक्टर, सरकार के पैकेज एवं दूसरी योजनाओं का लाभ उठाता है।
रोजगार के संकट में जाति को उत्तेजित कर रहे हैं 'नेता'
पिछले कुछ सालों में महाराष्ट्र, राजस्थान, हरियाणा और गुजरात में आरक्षण आंदोलन देखने को मिला है। आखिर ये आंदोलन क्यों हुए हैं। इन राज्यों में जिन लोगों ने आरक्षण की मांग की है, उनके पास पर्याप्त कृषि भूमि है। अनुपम बताते हैं कि इन राज्यों में आरक्षण की मांग को लेकर आंदोलन करने वाली जातियों के पास कृषि भूमि रही है। अब वहां इतनी आय नहीं हो रही कि वे ठीक से अपना गुजारा कर सकें। सवाल ये भी उठता है कि वह कौन है जिसने खेती बाड़ी को नुकसान पहुंचाया है। किसान ने तो कभी नहीं कहा कि वह खेती से दूर भागना चाहता है। खेती किसानी में कौन विपरित परिस्थितियां पैदा करने का प्रयास कर रहा है। अगर सरकार, किसानों की दिक्कतों को समय रहते समझ लेती तो हो सकता था कि ये आंदोलन न होते। इन्हीं राज्यों में जब कृषि क्षेत्र में सुधार नहीं हुआ तो वहां के जाति विशेष के नेताओं ने आरक्षण का राग अलाप दिया। आरक्षण के लिए आंदोलन शुरू हो गए। लोग मारे गए और करोड़ों रुपये की सरकारी संपत्ति भी स्वाह हो गई। प्राइवेट प्रॉपर्टी को भी नुकसान उठाना पड़ा। ये सब इसलिए हुआ, क्योंकि देश में रोजगार की कमी हो रही है। किसी को सरकारी पॉलिसी समझ नहीं आ रही। ऐसे में नेता अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए आसानी से किसी भी जाति को उत्तेजित कर सकते हैं।