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Indo-China War: 1962 के भारत-चीन युद्ध के शहीद को नहीं मिली पहचान, चीनी सैनिकों पर भारी पड़े थे शेरे थापा

Mon, 14 Nov 2022 05:05 AM IST
देव कश्यप एजेंसी, ईटानगर।
एजेंसी, ईटानगर। Published by: देव कश्यप Updated Mon, 14 Nov 2022 05:05 AM IST
सार

आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार, भारतीय सेना की जम्मू-कश्मीर राइफल्स की दूसरी बटालियन के थापा ने नवंबर, 1962 में अरुणाचल प्रदेश के सुबनसिरी सेक्टर में हुई लड़ाई में अकेले 70 से अधिक चीनी सैनिकों को मार गिराया था और कई अन्य को घायल कर दिया था।

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Even after 60 years martyrs of 1962 Indo-China war yet to receive central government honour
1962 युद्ध के शहीद शेरे थापा की इस प्रतिमा का अनावरण अरुणाचल के सीएम पेमा खांडू ने जनवरी में किया था। - फोटो : फाइल फोटो।

विस्तार

भारतीय सेना के हवलदार शेरे थापा ने 1962 के युद्ध के दौरान अदम्य साहस का परिचय देते हुए चीनी सेना के हमले का डटकर मुकाबला किया था और चीनी सेना को आगे बढ़ने से रोके रखा था। बावजूद, केंद्र सरकार की ओर से युद्ध में उनके योगदान की मान्यता का अब भी इंतजार है। अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने इस वर्ष जनवरी में गुमनाम नायक थापा की एक प्रतिमा का अनावरण करने के बाद यह ट्वीट किया था।

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आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार, भारतीय सेना की जम्मू-कश्मीर राइफल्स की दूसरी बटालियन के थापा ने नवंबर, 1962 में अरुणाचल प्रदेश के सुबनसिरी सेक्टर में हुई लड़ाई में अकेले 70 से अधिक चीनी सैनिकों को मार गिराया था और कई अन्य को घायल कर दिया था। कर्नल के रूप में सेवानिवृत्त हुए थापा के कमांडिंग ऑफिसर-सेकेंड लेफ्टिनेंट अमर पाटिल ने कहा कि इतिहास के पन्नों में खोए इस शहीद को 60 वर्ष बाद भी पहचान नहीं मिली है। अरुणाचल प्रदेश की पूर्व संसदीय क्षेत्र से लोकसभा सांसद तपीर गाओ ने पिछले साल सितंबर में नई दिल्ली में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह से मुलाकात की थी और एक पत्र सौंपकर थापा को मरणोपरांत वीरता पुरस्कार प्रदान करने का अनुरोध किया था।
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1957 में भारतीय सेना का हिस्सा बने थे थापा
साल 1928 में नेपाल में जन्मे थापा ने 27 दिसंबर, 1945 से 31 दिसंबर, 1956 तक जेएके रेजिमेंट स्पेशल फोर्स में सेवाएं दी थीं और एक जनवरी, 1957 को भारतीय सेना का हिस्सा बने थे। बाद में सूबेदार शेर बहादुर के मातहत उन्हें पलटन हवलदार नियुक्त किया गया। सेवानिवृत्त कर्नल पाटिल ने कहा कि थापा को चीन-भारत सीमा से आने वाले रास्तों को कवर करने के लिए ऊपरी सुबनसिरी जिले में रियो ब्रिज के पास तमा चुंगचुंग रिज पर तैनात किया गया था। 18 नवंबर, 1962 को चीन की पीएलए के लगभग 200 सैनिकों ने रिज के रास्ते घुसपैठ की। हवलदार थापा पहाड़ों पर सीमा की निगरानी कर रहे थे। उन्होंने जवाबी हमले में कई चीनी सैनिकों को ढेर कर दिया। वह बिना कुछ खाए चीनी सैनिकों पर लगातार गोलीबारी करते रहे। लड़ाई के दौरान चीनी सैनिकों के शवों का अंबार लग गया था।

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  • जब चीन की ओर से गोलीबारी बंद हो गई तो थापा अपने बंकर से बाहर निकले। लेकिन तभी एक घायल चीनी सैनिक ने उन पर गोली चला दी, जिसमें थापा शहीद हो गए। खांडू ने जनवरी में लाइमकिंग और नाचो के बीच रियो ब्रिज के पास थापा के स्मारक के निकट उनकी प्रतिमा का अनावरण किया था, लेकिन केंद्र सरकार की तरफ उनकी शहादत को अभी तक मान्यता नहीं मिली है।
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