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पर्यावरण: तेल की खपत में 2030 तक जारी रहेगी बढ़ोतरी, शून्य कार्बन उत्सर्जन का लक्ष्य पाना हो सकता है मुश्किल

Fri, 15 Oct 2021 06:17 PM IST
Amit Sharma Digital अमित शर्मा
Updated Fri, 15 Oct 2021 06:17 PM IST
सार

ऊर्जा विशेषज्ञ नरेंद्र तनेजा ने अमर उजाला को बताया कि ये विकसित देशों के अध्ययन हैं, जिसे भारत जैसे विकासशील देश को हूबहू अपने यहां लागू करने से बचना चाहिए। पिछले 160 सालों से विश्व की अर्थव्यवस्था कोयले-तेल के आसपास घूम रही है। इसे अचानक से गैर-पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों में स्थानांतरित नहीं किया जा सकता...

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Environment: Oil consumption will continue to increase till 2030, difficult to achieve the target of zero carbon emissions
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : iStock

विस्तार

इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (International Energy Agency) की हालिया रिपोर्ट के अनुसार कोविड-19 में पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था दबाव में रही, लेकिन इसके बाद भी इसी बीच सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और इलेक्ट्रिक वाहनों का बाजार तेज प्रगति करता रहा। लेकिन इसके बाद भी यह प्रगति 2050 में शून्य कार्बन उत्सर्जन या वैश्विक तापमान में 1.5 डिग्री तक की कमी ला सकने के लक्ष्य से काफी दूर है।

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इस वैश्विक लक्ष्य को हासिल करने के लिए ग्लोबल तौर पर कोयले और पेट्रोकेमिकल्स पर आधारित ईंधनों यानी पेट्रोल, डीजल और गैस की खपत में कमी होनी चाहिए। लेकिन रिपोर्ट के निष्कर्ष बताते हैं कि जब नवीकृत गैर-पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों के इस्तेमाल में बेहतर बढ़ोतरी होने के बाद भी कोयले-जीवाश्म ईंधनों की खपत में भी वृद्धि होती रहेगी। अनुमान है कि तेल की खपत में 2021 में 55 लाख बैरल प्रतिदिन और 2022 में 33 लाख बैरल प्रतिदिन तक की बढ़ोतरी होगी। इससे वैश्विक तापमान में कमी लाने और शून्य कार्बन उत्सर्जन का लक्ष्य हासिल करना कठिन हो सकता है।
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ऊर्जा की खपत सीधे-सीधे लोगों की आजीविका से जुड़ गई है। लिहाजा जनसंख्या वृद्धि के साथ-साथ ऊर्जा की मांग में बढ़ोतरी होती रहेगी। अनुमान है कि 2050 तक दो अरब लोगों की जनसंख्या विश्व जनसंख्या में जुड़ने वाली है। भारत जैसे विकासशील देश सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और हाइड्रोपॉवर ऊर्जा में बढ़ोतरी के बाद भी बढ़ी हुई ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए कोयले-तेल आधारित स्रोतों का उपयोग करने के लिए बाध्य होंगे।
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2030 तक तेल की मांग बढ़कर 1030 लाख बैरल प्रतिदिन तक पहुंच सकती है। शून्य कार्बन उत्सर्जन के लिए तेल की खपत शून्य तक पहुंच जानी चाहिए। जबकि विभिन्न देशों द्वारा अपने लिए निर्धारित लक्ष्यों का भी यदि सरकारें पालन कर पाईं तो भी तेल की खपत को केवल 960 लाख बैरल प्रतिदिन के लगभग ही लाया जा सकेगा। यानी शून्य कारण उत्सर्जन का लक्ष्य अभी बहुत दूर की कौड़ी है।

‘भारत करे अपने विकास की चिंता’      

ऊर्जा विशेषज्ञ नरेंद्र तनेजा ने अमर उजाला को बताया कि ये विकसित देशों के अध्ययन हैं, जिसे भारत जैसे विकासशील देश को हूबहू अपने यहां लागू करने से बचना चाहिए। पिछले 160 सालों से विश्व की अर्थव्यवस्था कोयले-तेल के आसपास घूम रही है। इसे अचानक से गैर-पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों में स्थानांतरित नहीं किया जा सकता। ऐसा करने पर भारत को उसी तरह की ब्लैक आउट जैसी स्थिति का सामना करना पड़ सकता है जैसा आज चीन-ब्रिटेन को करना पड़ रहा है।

भारत की वर्तमान ऊर्जा की कुल मांग का 80 फीसदी कोयले-तेल आधारित संयंत्रों से आता है। देश के उपभोग की जा रही कुल बिजली में 70 फीसदी का उत्पादन कोयला आधारित बिजली घरों में किया जाता है। आबादी, रोजगार और विकास के कारण यह गति और तेज रफ्तार से बढ़ने वाली है। ऐसे में विश्व की चिंता किए बिना न्यूनतम अगले 30 सालों के लिए भारत को पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों में निवेश जारी रखना चाहिए।

गैर-पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों को बढ़ावा देने में भारत विश्व के अग्रणी देशों में शुमार है। एक समय शून्य कार्बन उत्सर्जन का लक्ष्य हासिल करने के लिए इसे लगातार बढ़ावा दिया जाना चाहिए, लेकिन यदि केवल इसी स्रोत पर भरोसा किया गया, तो इससे देश का विकास बाधित हो सकता है।

प्रदूषण के मानकों को प्राप्त करने के लिए भारत को तकनीकी बदलाव करने होंगे। जैसे इस समय देश में भारत स्टेज एमिशन स्टैंडर्ड यानी बीएस6 पेट्रोल की बिक्री की जा रही है। इससे वाहन आधारित प्रदूषण कम करने में मदद मिली है। इसी प्रकार इंजन में बदलाव, कारखानों से निकलने वाली राख के बेहतर प्रबंधन से प्रदूषण को बेहद कम स्तर पर लाया जा सकता है।

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