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सबको रोजगार देने का मॉडल शहरों में नहीं, गांवों में छुपा है! अर्थव्यवस्था के ये संकेत कब समझेगी सरकार

Fri, 14 Aug 2020 07:03 PM IST
Harendra Chaudhary अमित शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली
अमित शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Harendra Chaudhary Updated Fri, 14 Aug 2020 07:03 PM IST
सार

एफएमसीजी उत्पादों की खपत, वाहनों की बिक्री के मामले में ग्रामीण भारत ने जगाई उम्मीद, विशेषज्ञों का अनुमान, अर्थव्यवस्था मजबूत करने में बड़ा सहयोग दे सकती है ग्रामीण आबादी...   

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Employment formula to everyone is hidden in the villages, not in the cities, agriculture based economy will rise
कृषि क्षेत्र - फोटो : PTI (फाइल फोटो)

विस्तार

सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (CMIE) के आंकड़े बताते हैं कि अपेक्षाकृत ज्यादा ग्रामीण आबादी और कृषि आधारित अर्थव्यवस्था वाले राज्यों में जुलाई के महीने में बेरोजगारी की दर कम रही, जबकि औद्योगिक विकास में आगे ज्यादातर राज्यों में बेरोजगारी की दर अपेक्षाकृत ज्यादा रही। इस दौरान ज्यादा कृषि प्रधान क्षेत्र वाले राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश में बेरोजगारी दर 5.5 फीसदी, मध्यप्रदेश में 3.6 फीसदी, महारष्ट्र में 4.4 फीसदी, असम में 3.2 फीसदी, कर्नाटक में 3.2 फीसदी और बिहार में 12.2 फीसदी रही। वहीं, दिल्ली में बेरोजारी दर 20.3 फीसदी, गोवा में 17.1 फीसदी और पुडुचेरी में 21.1 फीसदी रही।

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क्या संकेत दे रहे हैं ये आंकड़े

क्या हमारी पारंपरिक सोच से उलट ये आंकड़े यह संकेत दे रहे हैं कि कृषि आधारित अर्थव्यवस्था ज्यादा लोगों को रोजगार देने में सक्षम है? कृषि अर्थशास्त्री देवेंदर शर्मा कहते हैं कि यूरोपीय मॉडल के अंधानुकरण में हमने यह मान लिया है कि सबको रोजगार देने का रास्ता शहरीकरण और औद्योगीकरण के जरिए ही मिल सकता है। यही कारण है कि पूरी दुनिया में शहरीकरण को ही प्रमुखता दी गई और ज्यादा से ज्यादा शहर बसाये जाने लगे।

लेकिन यूरोप से लेकर विकासशील देशों तक का अब तक का अनुभव बताता है कि यह मॉडल सबको रोजगार देने में अक्षम साबित हुआ है। आज भी हम देख सकते हैं कि दुनिया के हर कोने में शहरी 
क्षेत्रों में ऊंचे स्तर की बेरोजगारी पाई जाती है, इसलिए इस मॉडल को अंतिम रूप से सफल नहीं कहा जा सकता।

देवेंदर शर्मा के मुताबिक़ ग्रामीण कृषि आधारित अर्थव्यवस्था निर्विवाद रूप से ज्यादा लोगों को रोजगार देने की क्षमता रखती है। इसमें लोग शहरों की तरह लाखों-करोड़ों के पैकेज भले ही न पाएं, लेकिन यह ज्यादा लोगों को स्थाई आजीविका उपलब्ध करवाती है। अगर इस मॉडल को सही तरीके से विकसित किया जाए, तो यह और अधिक सक्षम तरीके से लोगों को संभाल सकती है।

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फिर ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों को पलायन क्यों?

अगर ग्रामीण अर्थव्यवस्था ज्यादा लोगों को संभालने में सक्षम है, तो ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों की तरफ पलायन क्यों हो रहा है? इसका जवाब यह है कि सभी सरकारों में यूरोपीय मॉडल को अपनाते हुए शहरी अर्थव्यवस्था को विकसित करने पर जोर दिया। सड़क, अस्पताल, स्कूल सब कुछ प्रमुख रूप से यहीं पर बनाए गए।

इससे रोजगार के अवसर भी बढ़े और शहरी चमक-दमक भी। किसानी में लगातार हो रहे घाटे, घटते खेत के रकबे और शहरों की चमक ने हर तरफ से लोगों को गांव छोड़ने और शहर की ओर भागने को प्रेरित किया। यही कारण है कि गांवों में विकास भी नहीं हुआ और आज भी युवाओं को रोजगार के लिए शहर की तरफ ही देखना पड़ता है।

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क्या करना चाहिए

विशेषज्ञों के मुताबिक सातवें पे कमीशन को लाने के समय सरकार ने यह तर्क दिया था कि इससे 33 लाख केंद्रीय कर्मचारियों, 14 लाख सैन्य जवानों और 52 लाख पेंशन भोगियों (कुल मिलाकर लगभग एक करोड़ परिवार) को लाभ होगा। इससे उनके हाथ में पैसा जाएगा, उनकी क्रय शक्ति बढ़ेगी और उनके ज्यादा पैसा खर्च करने से अर्थव्यवस्था में तेजी आएगी।

अगर यही तर्क ग्रामीण अर्थ व्यवस्था पर लगाते हैं और किसानों के हाथों में ज्यादा पैसा जाता है तो (जहां आज भी न्यूनतम 60 फीसदी आबादी निवास करती है) इससे देश की बड़ी आबादी की क्रय शक्ति में वृद्धि होगी। इससे देश की अर्थव्यवस्था आगे बढ़ाने में मदद मिल सकती है।

इसके लिए केंद्र सरकार को किसानों के अनाज को एक न्यूनतम मूल्य पर बेचना उसका ‘कानूनी अधिकार’ बना देना चाहिए। इससे किसान किसी मंडी के भरोसे नहीं रहेंगे, बल्कि वे चाहे जहां चाहेंगे  अपना अनाज बेच सकेंगे। उन्हें न्यूनतम मूल्य मिलना सुनिश्चित किया जा सकेगा।

इसके साथ ही कृषि आधारित प्रसंस्करण उद्योगों और अन्य ढांचागत सेवाओं को विस्तार देकर ग्रामीण अर्थ व्यवस्था को मजबूत बनाया जा सकता है। इससे ग्रामीण क्षेत्रों से पलायन भी रुकेगा, शहरों की समस्या भी खत्म होगी और अन्तत: देश की अर्थव्यवस्था में मजबूती आएगी।

किसान नेताओं ने उठाई यह मांग

ऑल इंडिया किसान संघर्ष समन्वय समिति के राष्ट्रीय संयोजक सरदार वीएम सिंह कहते हैं सरकार चाहे कोई भी हो, उसकी विकास की योजना के केंद्र में हमेशा उद्योगपति ही रहते हैं। केंद्र की सभी योजनाएं उद्योगों को बढ़ाने के लिए लागू की जाती हैं। इससे कुछ बड़े उद्योगपतियों को लाभ होता है और कुछ लोगों को नौकरी मिलती है।

लेकिन अगर सरकार ग्रामीण कृषि अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की कोशिश करे, तो इससे 60 फीसदी से ज्यादा बड़ी आबादी को सीधा मजबूती मिलेगी। उन्हें उम्मीद है कि इससे देश की अर्थव्यवस्था ज्यादा मजबूत हो सकेगी। 

नौ अगस्त से राष्ट्रीय स्तर पर शुरू हुए आंदोलन में किसानों ने ‘कारर्पोरेट भगाओ, किसान बचाओ’ का नारा बुलंद किया है। इसमें नौ प्रमुख मांगे सरकार से की जा रही हैं। इनमें अनाज के लिए एमएसपी, कर्जमुक्ति, डीजल कीमतों में कमी, बिजली को प्राइवेट हाथों में देने से रोकना, मनरेगा दिनों की संख्या बढ़ाना और मनरेगा को किसानी से जोड़ना शमिल है। किसानों का मानना है कि इन मांगों के पूरा होने से उन्हें आर्थिक ताकत मिलेगी।

कोरोना काल में ग्रामीण भारत ने दिखाई ताकत

वित्त वर्ष 2020-21 की पहली तिमाही के आंकड़े बताते हैं कि कोरोना काल की मंदी के बावजूद बिस्कुट, नमकीन, शैम्पू, क्रीम जैसे एफएमसीजी उत्पाद ग्रामीण क्षेत्रों में ज्यादा तेजी से बिक रहे हैं। इस वर्ष इन उत्पादों के बाजार में पांच फीसदी की बढ़ोतरी होने का अनुमान है, जबकि इसी दौरान इनकी बिक्री ग्रामीण इलाकों में शहरों की अपेक्षा ज्यादा तेजी के साथ आगे बढ़ेगी। इसे देखते हुए ही डाबर जैसी कंपनी ने अपना आधार क्षेत्र 60 हजार नए गांवों तक बढ़ाने का निर्णय लिया है।

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